यशवंतजी, राज्यसभा टीवी वर्चस्व की भेंट चढ़ता नजर आ रहा है. बात यहां तक पहुंच गई है कि संसदीय परम्पराओं के प्रचार-प्रसार के लिए शुरू किए गए इस चैनल में संसदीय गरिमा का ही पालन नहीं किया जा रहा है. लोग एक दूसरे से भिड़ने को तैयार बैठे हैं. पिछले एक महीने में ही आउटपुट में मारपीट और गाली-ग्लौज की आधा दर्जन घटनाएं सामने आई हैं. सारा मामला वर्चस्व को लेकर है.
आउटपुट के वरिष्ठ से ही लगभग सारे स्टाफ की गाली-ग्लौज हो चुकी है. दो लोगों के बीच मारपीट होते-होते रह गई. अब हालात यह है कि अकेले आउटपुट के झगड़ों की वजह से सारे चैनल में क्लेश है. आउटपुट मंडली में भी ज्यादातर को काम का ज्ञान ना के बराबर है. यहां की स्क्रिप्ट की हालत देखकर कोर्ठ बता सकता है कि यह लोग काबिलियत के बल पर नौकरी पाए हैं या जुगाड़ के बल पर. हालांकि कुछ ऐसे भी लोग हैं जो ठीक से स्क्रिप्ट लिखने और समाचार का ज्ञान रखते हैं.
सबसे बड़ी बात तो यह है कि सरकारी चैनल होने के नाते आउटपुट के उपद्रवियों पर नकेल कसने का कोई तंत्र चैनल में नहीं है. नौकरी जाने का डर नहीं है. जिसके चलते क्लेश और अधिक बढ़ जाता है. अगर चैनल में यही हाल रहा तो राज्यसभा टीवी से मजेदार समाचारों का सिलसिला शुरू हो जाएगा, मगर ये समाचार राज्य सभा के नहीं बल्कि खुद राज्यसभा टीवी के लोगों के होंगे. उम्मीद करता हूं कि वरिष्ठ लोग इस मामले पर ध्यान देंगे.
एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.





