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सुख-दुख...

राणा यशवंत का नाम और बदलाव की चाह ने महुआ न्‍यूजलाइन पहुंचा दिया था

 

नवंबर 2011 में जनसंदेश छोड़कर महुआ न्यूज़लाइन ज्वाइन करने से पहले मैं थोड़ा असमंजस में था। ढाई साल से जनसंदेश में काम कर रहा था, नौकरी सुरक्षित थी और थोड़े ही समय पहले इंक्रीमेंट भी हुआ था। इसके अलावा मीडिया से जुड़े कई शुभचिंतक महुआ को डूबता जहाज बताते हुए यूपी चैनल ना ज्वाइन करने की सलाह दे रहे थे। लेकिन राणा यशवंत जी का नाम और संस्थान बदलने की चाह ने मुझे महुआ न्यूज़लाइन पहुंचा दिया। 

 

नवंबर 2011 में जनसंदेश छोड़कर महुआ न्यूज़लाइन ज्वाइन करने से पहले मैं थोड़ा असमंजस में था। ढाई साल से जनसंदेश में काम कर रहा था, नौकरी सुरक्षित थी और थोड़े ही समय पहले इंक्रीमेंट भी हुआ था। इसके अलावा मीडिया से जुड़े कई शुभचिंतक महुआ को डूबता जहाज बताते हुए यूपी चैनल ना ज्वाइन करने की सलाह दे रहे थे। लेकिन राणा यशवंत जी का नाम और संस्थान बदलने की चाह ने मुझे महुआ न्यूज़लाइन पहुंचा दिया। 
 
ज़्वाइन करने के दूसरे ही महीने सैलरी का चेक बाउंस हुआ तो लगा, कि ग़लती हो गई। यूपी इलेक्शन नज़दीक था…चैनल की पूरी टीम जान लगाकर काम कर रही थी। लेकिन सैलरी का लेट आना और चेक का बाउंस होना ख़तरे का इशारा था। मेरे समेत ज़्यादातर लोग नई नौकरी की तलाश में थे… इसी बीच दूसरे संस्थान से ऑफ़र मिला और तुरंत ज्वाइन करने के लिए बोला गया… लेकिन बीच इलेक्शन नौकरी छोड़कर मैं किसी को धोखा नहीं देना चाहता था… नई ज़्वाइनिंग कुछ दिन के लिए टाल दी… इलेक्शन जैसे ही ख़त्म हुए चाचा की तबीयत ख़राब होने की वजह से मैं निजी तौर पर परेशान रहा… बाद में लाख कोशिशों के बावजूद उन्हें बचाया भी ना जा सका। उसी दौरान मैने महुआ न्यूज़लाइन को टाटा बोलकर श्री न्यूज़ ज़्वाइन कर लिया।
 
ये फ़ैसला भी थोड़ा मुश्किल था… लोगों ने सलाह दी, कि कुछ भी हो महुआ ब्रांड है… और श्री न्यूज़ नया चैनल… डूब जाएगा, तो क्या करोगे… लेकिन मुझे ख़ुदा पर भरोसा था… एक बार फिर मैने दिल की ही सुनी। न्यूज़लाइन के बुरे हश्र के बाद लगा, कि फ़ैसला कितना सही था। लेकिन उन सभी साथियों के लिए बेहद अफ़सोस है, जिनकी नौकरी एक झटके में ख़त्म हो गई।
 
बात केवल एक संस्थान की नहीं है। कोहराम मचा है, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पेशेवरों में… ख़ासकर उन पत्रकारों में जो छोटे और मीडियॉकर ऑर्गनाइजेशन में काम करते हैं। महुआ न्यूज़लाइन के 120 पत्रकार, सीएनईबी के 150, फ़ोकस और हमार के 105 और जनसंदेश की छंटनी में शहीद हुए 30 पत्रकारों को जोड़ें, तो कुल जमा 405 पत्रकार साथियों पर पिछले कुछ महीने में गाज गिरी है। सोचकर देखिए इनमें से ज़्यादातर के पास अभी भी जॉब नहीं है। क्या करेंगे, कहां जाएंगे, बेशक़ नौकरी तो मिलेगी, आज नहीं तो कल, लेकिन जब तक हाथ में नया ऑफ़र लेटर नहीं आ जाता, ज़िंदगी तनाव में ही गुज़रेगी।
 
प्रबंधन के दबाव में जनसंदेश में अगर छंटनी हुई, तो वहां हक़ किसी का नहीं मारा गया… उस चैनल में सैलरी हमेशा पहली तारीख़ को आती है, तो किसी की भी पेंडिंग नहीं थी और निकाले गए लोगों को बिना किसी आंदोलन के नोटिस पीरियड की सैलरी दी गई… भले ही उस महीने वो ऑफ़िस आए या नहीं आए। महुआ न्यूज़लाइन के पत्रकारों ने लड़कर अपना वाजिब हक़ लिया… लेकिन सीएनईबी के लोगों को तो सीधे सलाम कर दिया गया। फ़ोकस और हमार वाले भी आंदोलन कर रहे हैं, देर-सवेर उन्हें भी बकाया मिलने की उम्मीद है।
 
ख़ैर… महुआ न्यूज़लाइन के साथियों ने हक़ की आवाज़ बुलंद की इसके लिए वो बधाई के पात्र हैं। बुज़ुर्ग शायर मेराज़ फ़ैज़ाबादी का एक शेर याद आ रहा है-

 
“ज़िंदगी भीख है, तो ना मिलना बेहतर
और अगर हक़ है, तो इतनी शराफ़त से ना मांग”
 
न्यूज़लाइन के लोगों ने दृढ़ता, साहस और वीरता के साथ पूरे गर्व से अपना हक़ हासिल किया है। इसके लिए अनुराग त्रिपाठी सर, उमेश सर और बाक़ी सभी साथियों की लड़ाई क़ाबिलेतारीफ़ है। गलत राह पर जाते प्रबंधन को झुका कर आप सभी ने वाकई मिसाल क़ायम की है।
 
शोऐब अहमद ख़ान
 
प्रोड्यूसर-श्री न्यूज़
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