Om Thanvi : नक्सली / माओवादी हमले को लेकर रायपुर में स्थानीय स्तर पर जो रिपोर्टिंग हुई, उसमें बहुत-सी पतंगबाजी से आगे कुछ नहीं थी। कहीं कोई स्रोत नहीं। फिर भी जानकारी इस तरह, जैसे गोलीबारी के वक्त रिपोर्टर किसी पेड़ पर बैठा घटनास्थल को निहार रहा था। एक खबर का अंश देखिए — "गोलीबारी में घायल हो गए विद्याचरण शुक्ल को लेकर नक्सलियों को अपने कमांडर से डांट भी खानी पड़ गई।" इसी तरह और भी कई बातें, जिनका कहीं कोई स्रोत नहीं मिलेगा।
सबसे बुरी बात लगी क्षत-विक्षत तस्वीरों का रंगीन प्रदर्शन। तस्वीरों को लेकर पत्रकारिता में एक मर्यादा बरती जाती रही है, खासकर खून-खराबे की तस्वीरों के मामले में। उन्हें ज्यादा महत्त्व देकर नहीं छापा जाता, आकार और कई दफा तस्वीर को भी धुंधला दिया जाता है। माओवादियों की हिंसा से किसे सहानुभूति हो सकती है (खूनखराबे के बीच चीयर्स के समानार्थी ढूंढ़ने वाले सम्प्रदाय को छोड़कर); लेकिन रायपुर का अखबारी हाल देखकर लगा जैसे मौत के नाच में भी बिरादरान बाजार का खयाल रखते हों। पत्रकारिता में मानवीय संवेदन क्या ऐसी नाजुक घड़ियों में भी हवा होने लगा?
जाने-माने पत्रकार और जनसत्ता अखबार के संपादक ओम थानवी के फेसबुक वॉल से.





