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राष्ट्रभाषा तो है नहीं, राष्ट्र कवि की फ़रियाद!

Dayanand Pandey : एक हैं मोहम्मद अनस। आजकल फ़ेसबुक पर राष्ट्र कवि कौन हो की एक नकली बहस के बहाने अपने को सुखी करने में डटे पड़े हैं। हिंदी-उर्दू का खांचा भी खींच बैठे हैं। मैथिली शरण गुप्त, दिनकर और सोहन लाल द्विवेदी को लानत भेजते हुए अपना दुख भी जता रहे हैं कि हाय फ़िराक को क्यों नहीं राष्ट्र कवि बनाया गया? हमारे मित्र हैं शंभूनाथ शुक्ल। वह भी मोहम्मद अनस के सुर में सुर मिला गए हैं पर वह शहरयार को राष्ट्र कवि बनाने की पैरवी कर रहे हैं। अभी यह लोग हिंदी को छोड़ कर उर्दू के कवियों को राष्ट्र कवि बना कर अपनी धर्मनिरपेक्षता कहिए या भावना कहिए व्यक्त कर रहे हैं।

Dayanand Pandey : एक हैं मोहम्मद अनस। आजकल फ़ेसबुक पर राष्ट्र कवि कौन हो की एक नकली बहस के बहाने अपने को सुखी करने में डटे पड़े हैं। हिंदी-उर्दू का खांचा भी खींच बैठे हैं। मैथिली शरण गुप्त, दिनकर और सोहन लाल द्विवेदी को लानत भेजते हुए अपना दुख भी जता रहे हैं कि हाय फ़िराक को क्यों नहीं राष्ट्र कवि बनाया गया? हमारे मित्र हैं शंभूनाथ शुक्ल। वह भी मोहम्मद अनस के सुर में सुर मिला गए हैं पर वह शहरयार को राष्ट्र कवि बनाने की पैरवी कर रहे हैं। अभी यह लोग हिंदी को छोड़ कर उर्दू के कवियों को राष्ट्र कवि बना कर अपनी धर्मनिरपेक्षता कहिए या भावना कहिए व्यक्त कर रहे हैं।

हो सकता है कि कल को किसी और भाषा के लोग भी सामने आएं। पर दिक्कत यह है कि एक राष्ट्र गान है जन गण मन जिसे बांगला के रवींद्रनाथ टैगोर ने लिखा है। इस को ले कर तो कई सारे विवाद हैं ही, एक राष्ट्रीय गीत भी है वंदे मातरम ! इस को भी बांगला के बंकिम बाबू ने लिखा है। और इस को ले कर भी मुस्लिम वर्ग के लोगों में ऐतराज है। पर हमारे मित्र लोग इन बातों से भी कतरा कर फ़िराक, शहरयार की कुर्सी दौड़ में उलझ गए हैं। इन मित्रों को कोई जीवित कवि भी नहीं मिल रहा जिसे यह लोग राष्ट्र कवि के सिंहासन पर बिठा सकें।

इन मित्रों को इस बात की कतई परवाह नहीं है कि अपने देश में हर चीज़ राष्ट्रीय है। फूल से ले कर झंडा तक। पर देश में आज़ादी के इतने बरस बाद भी जो एक चीज़ राष्ट्रीय नहीं है अपने देश के पास वह है राष्ट्रीय भाषा। और मित्र लोग हैं कि राष्ट्र कवि के झमेले में जूझ रहे हैं। शायद इसी को कहते हैं कि सूत न कपास, जुलाहों में लट्ठमलट्ठ ! मित्रों बौद्धिक ही सही, फ़रियाद ही जो करनी है, बहस ही जो करनी है तो पहले एक राष्ट्रभाषा के लिए कीजिए। फिर राष्ट्र कवि का एजेंडा लाइएगा। लेकिन यह उर्दू और हिंदी का झमेला बंद कीजिए। फ़िलहाल तो मुनव्वर राना का एक शेर सुनिए और खुश हो जाइए :

लिपट जाता हूं मां से और मौसी मुसकुराती है
मैं उर्दू में गज़ल कहता हूं हिंदी मुसकुराती है।

साहित्यकार और पत्रकार दयानंद पांडेय के फेसबुक वॉल से.

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