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राष्ट्रीयता, मीडिया और विज्ञान का भगवाकरण

"मैं अपने धर्म की शपथ लेता हूँ, मैं इसके लिए अपनी जान दे दूंगा. लेकिन यह मेरा व्यक्तिगत मामला है. राज्य का इससे कुछ लेना-देना नहीं. राज्य का काम धर्मनिरपेक्ष कल्याण, स्वास्थ्य , संचार, आदि मामलों का ख़याल रखना है, ना कि तुम्हारे और मेरे धर्म का." – महात्मा गाँधी

"मैं अपने धर्म की शपथ लेता हूँ, मैं इसके लिए अपनी जान दे दूंगा. लेकिन यह मेरा व्यक्तिगत मामला है. राज्य का इससे कुछ लेना-देना नहीं. राज्य का काम धर्मनिरपेक्ष कल्याण, स्वास्थ्य , संचार, आदि मामलों का ख़याल रखना है, ना कि तुम्हारे और मेरे धर्म का." – महात्मा गाँधी

भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है, ऐसा हमारे संविधान में कहा गया है. संक्षेप में कहे तो धर्मनिरपेक्षता का अर्थ होता है धर्म का राज्य से अलग होना. कई बार इस धर्मनिरपेक्षता शब्द का कोई अर्थ नहीं रह जाता है जब राष्ट्रीयता, मीडिया और विज्ञान के मामलों में देश के बहुसंख्यक धर्म का विशेष ख़याल रखा जाता है. आज से लगभग दस साल पहले भाजपा के शासन वाली सरकार में एनसीईआरटी के इतिहास के किताबों से छेड़छाड़ कर उनका भगवाकरण करने की कोशिश की गयी थी. जिसका देश भर के शिक्षाविदों और बुद्धिजीवियों ने विरोध किया था. इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय को भी हस्तक्षेप करना पड़ा था. समय के साथ दक्षिणपंथी समूहों और उनके “इतिहासकारों” और “बुद्धिजीवियों” द्वारा हिंदुत्व का प्रचार और भगवाकरण की कोशिशें बढ़ी हैं.  

भारत माता, जो एक हिन्दू देवी दुर्गा का प्रतिरूप लगती है, को दक्षिणपंथी समूहों ने एक “राष्ट्रीय” प्रतीक के रूप में लगभग स्थापित कर लिया है. भारत माता गौरवर्णा है. भारत माता का रंग-रूप से लेकर उनका पहनावा तक एक हिन्दू देवी की तरह है, जो आधे से अधिक भारतीय महिलाओं के रंग-रूप और पहनावे से मेल नहीं खाता. वह दुर्गा की तरह शेर पर सवार है. दिलचस्प बात यह है कि देश का एक प्रमुख दक्षिणपंथी संगठन भारत माता की इस छवि को अपने प्रतीक के रूप में इस्तेमाल करता आया है. भारत माता की जय के नारे हिन्दू संगठनों के कार्यक्रमों से लेकर भारतीय सेना में समान रूप से गूँजते है.

मीडिया का जितना कवरेज हिन्दू धर्म के पर्व-त्योहारों को मिलता है, उतना कवरेज दूसरे धर्मों के पर्व-त्योहारों को शायद ही नसीब होता है. हिन्दू पर्व-त्योहारों के समय प्रमुख हिंदी अखबार अपने ‘मास्टहेड’ को उन पर्व-त्योहारों के रंग से रंग देते हैं. त्योहार विशेष पृष्ठों और खबरों से अखबारों को भर दिया जाता है. इलेक्ट्रॉनिक मीडिया भी बहुसंख्यक धर्म के त्योहारों में पूरी तरह डूब जाती है. वैसे भारतीय मीडिया सालभर हिन्दू धर्मग्रंथों के पात्रों और मिथकों को उद्धृत करती रहती है. भीम जैसे धार्मिक पात्रों को लेकर कार्टून-शो बनाए जाते हैं. हिंदी फिल्मों के नायक भी अधिकतर हिन्दू पात्र ही होते हैं, भले ही उस पात्र को निभाने वाले अभिनेता किसी दूसरे धर्म के हो. हाल ही में इतिहास से छेड़छाड़ का एक और उदाहरण देखने को मिला. टीवी पर शुरू हुए एक नए “ऐतिहासिक” कार्यक्रम में जानबूझकर अकबर को एक मुस्लिम आक्रान्ता और खलनायक के रूप में दिखाने की कोशिश की गयी है. यह अकबर जैसे उदारवादी और धर्मनिरपेक्ष शासक का गलत चित्रण कर नयी पीढ़ी को भ्रमित करने की कोशिश है.

दूसरी तरफ हमारे शासक वर्ग ने (खासकर भाजपा के शासन-काल के दौरान) विज्ञान, स्वदेशी तकनीक और आविष्कारों को हिन्दू धर्म के प्रचार-प्रसार का साधन बना दिया. भारत में विकसित तकनीकों और मिसाइलों का नामकरण हिन्दू मिथकों और पात्रों के नाम पर किया जाने लगा.  “अग्नि”, “इंद्र”, “त्रिशूल”, “वज्र”, “पुष्पक” आदि इसके उदाहरण हैं. दिलचस्प बात यह है कि हिन्दू मिथकों के नाम पर रखे गए इन मिसाइलों के विकास और निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले ‘मिसाइलमैन’ डॉ कलाम एक अल्पसंख्यक समुदाय से है.

इतना ही नहीं, खेल के क्षेत्र में मिलने वाले पुरस्कारों के नाम “अर्जुन”, “द्रोणाचार्य” आदि भी हिन्दू धर्मग्रंथों से लिए गए हैं.  मध्यप्रदेश में “गो-रक्षा कानून” जैसे अनूठे कानून लागू है. अब वहाँ निचली कक्षा के बच्चों को स्कूलों, मिशिनिरियों और मदरसों में गीता पढ़ाये जाने की कोशिश की जा रही है. यहाँ यह सवाल उठाना बेकार है कि यह कृपा सिर्फ हिन्दू धर्मग्रंथों पर ही क्यूँ की जा रही है? ईसाई और मुस्लिम धर्म के धर्मग्रंथों पर यह कृपा क्यूँ नहीं की जा रही? जब नरेन्द्र मोदी खुद के हिन्दू राष्ट्रवादी होने की घोषणा करते है तो हम भारतीयों को आश्चर्य नहीं होता क्योंकि यह देश तो पहले ही आधे हिन्दू-राष्ट्र में बदल चुका है. सावरकर और गोलवलकर के “हिन्दू-राष्ट्र” की संकल्पना को यथार्थ में बदलने की पूरी कोशिश की जा रही है.

दुर्भाग्य है कि बुद्धजीवियों और वैज्ञानिकों का एक वर्ग आधे-अधूरे और बेबुनियाद तथ्यों के आधार पर हिन्दू मिथकों को स्थापित करने और हिंदूत्व का प्रचार-प्रसार करने का प्रयास कर रहा है. हाल ही में मीडिया और विज्ञान के भगवाकरण का एक बेमिसाल उदाहरण देखने को मिला. दिनांक 29-07-2013, सोमवार के दैनिक भास्कर, झारखंड संस्करण में पृष्ठ संख्या 12 को ‘सोमवारी’ विशेष पृष्ठ बना दिया गया था[1]. दूसरे पृष्ठों पर भी श्रावण महीने में शिव अराधना और सोमवारी से जुड़ी ख़बरें हैं, लेकिन इस विशेष पृष्ठ पर “विशेषज्ञ” शिव और शिव-अराधना के महत्व का बखान कर रहे हैं. एक विशेषज्ञ जहाँ शिव की उपासना विधि बता रहे है वहीँ दूसरी तरफ एक दूसरे विशेषज्ञ यह दावा कर रहे है कि “शिवजी की उपासना से अपमृत्यु योग से मिल सकता है छुटकारा”. इस तरह के विशेष पृष्ठ और विशेषज्ञ विश्लेषण दूसरे धर्मो के त्योहारों के लिए नहीं दिखते हैं.

सबसे दिलचस्प लेख तो इस पृष्ठ के निचले भाग पर “एक वैज्ञानिक विश्लेषण” के रूप में है. शायद अखबार ने दूसरे लेखों की अवैज्ञानिकता को संतुलित करने के लिए इस “वैज्ञानिक विश्लेषण” को जगह दी है, हालांकि यह लेख भी दूसरे लेखों की ही तरह अवैज्ञानिक है. इस लेख का शीर्षक है “न्यूक्लियर रिएक्टर की बनावट है शिवलिंग के जैसा”. आश्चर्य नहीं कि इस तरह के बेसिरपैर की खबरों के कारण हिंदी मीडिया की यह दुर्गति हुई है. अंग्रेजी के शब्द “न्यूक्लियर रिएक्टर” के लिए हिंदी में दो प्रचलित शब्द है “नाभिकीय संयत्र” या “परमाणु संयंत्र”, जो कि इतने कठिन शब्द भी नहीं हैं कि इनका प्रयोग हिंदी के अखबार ना कर पाए. फिर भी अखबार “न्यूक्लियर रिएक्टर” शब्द का प्रयोग कर शायद खुद को “आधुनिक” दिखाने की कोशिश कर रहा है. इस लेख को लिखने वाले रांची के एक जाने माने भूवैज्ञानिक डॉ. नीतीश प्रियदर्शी है. उन्होंने शिवलिंग और परमाणु संयंत्र में समानता स्थापित करने के लिए अजीबोगरीब तथ्य दिए हैं. जैसे कि परमाणु संयंत्र और शिवलिंग की सरंचना बेलन की तरह होती है. यह साबित करने के लिए लेखक ने भाभा परमाणु संयंत्र का उदाहरण दिया है. लेकिन लेखक यह बताना भूल गए कि विश्व के लगभग सभी परमाणु संयंत्रों की बनावट बेलन की तरह ही होती है. इससे यह साबित नहीं हो जाता कि परमाणु संयंत्रों का शिवलिंग से कोई  रिश्ता है. अगर ऐसा होता तो परमाणु संयंत्र का आविष्कार विदेश की जगह भारत में किसी शिवभक्त ने किया होता. ऐसे कामचलाऊ विश्लेषण को वैज्ञानिक विश्लेषण बोल कर आप खुद अपनी फ़जीहत करवा रहे है. लेखक आगे कहते है कि नाभिकीय संयंत्र में भी जल का प्रयोग किया जाता है और शिवलिंग पर भी जल प्रवाहित की जाती है. नाभिकीय संयंत्र में जल का प्रयोग नाभिकीय छड़ों को ठंडा करने के लिए किया जाता है. वहीँ शिवलिंग पर जल के अलावा दूध भी डाला जाता है, लेकिन ये सब शिवलिंग को ठंडा करने के लिए तो नहीं किया जाता. लेखक महोदय भी ऐसा कोई दावा करते नज़र नहीं आते.

यह लेख बेबुनियाद तथ्यों और सुनी-सुनाई बातों पर आधारित है, जिसका एक ही उद्देश्य है- हिन्दू धर्म और इसके “इतिहास” की श्रेष्ठता को साबित करना. लेखक "स्यामंतक" नाम के किसी “रेडियोएक्टिव” पत्थर का जिक्र भी करते है जो सोमनाथ मंदिर में हुआ करता था. लेखक ने यह बताने की जरुरत नहीं समझी कि उस “रेडियोएक्टिव” पत्थर के संपर्क में आने वाले लोग कैंसर का शिकार होकर मरे थे या नहीं?

डॉ. नीतीश प्रियदर्शी के ब्लॉग पर और भी दिलचस्प चीजें मिलती हैं. इस लेख के अखबार में छपने के दिन ही डॉ. नीतीश प्रियदर्शी अपने ब्लॉग पर एक स्लाइड शो डालते है. प्राचीन “भारतीय” संस्कृति में नाभिकीय हथियारों के प्रयोग पर उनके शोध पर आधारित लगभग तेरह मिनट की इस स्लाइड शो का नाम है “डीड इंडिया हैव द एटॉमिक पॉवर इन एन्शिएन्ट डेज?” (क्या भारत के पास प्राचीन काल में परमाणु शक्ति थी?)[2]. अपने शोध से वह यह निष्कर्ष निकालते हैं कि महाभारत के युद्ध में नाभिकीय हथियारों का प्रयोग हुआ था. वह अपने इस इस स्लाइड शो की शुरुआत कणाद द्वारा अणु के अस्तित्व को लेकर खोज से करते है. इस स्लाइड शो में वह हिन्दू धर्मग्रंथों से ऐसे हथियारों के उदाहरण देते है जिसका नाभिकीय हथियारों से कोई संबन्ध नहीं दिखता. जैसे राम द्वारा शिव का बाण तोड़ा जाना, मोहनास्त्र, आग्नेयास्त्र, ब्रह्मास्त्र, पाशुपतास्त्र, इंद्र का वज्र, आदि. इस स्लाइड शो में पौराणिक कथाओं के नागास्त्र, जिसके प्रयोग से नागों की बारिश होती थी, के जैविक हथियार होने की संभावना व्यक्त की गयी है. डॉ. नीतीश प्रियदर्शी यहाँ हिन्दू संस्कृति की महानता और श्रेष्ठता सिद्ध करने के चक्कर में कुछ जरुरी सवालों का जवाब देना भूल जाते हैं. क्या इन अस्त्रों में नाभिकीय पदार्थों का प्रयोग हुआ था? सिर्फ कुछ मन्त्रों के सहारे आप नाभिकीय अस्त्र कैसे बना सकते है? अगर महाभारत के युद्ध में नाभिकीय हथियारों का प्रयोग हुआ भी था तो पांडव और दूसरे लोग जीवित कैसे बच गए? अगर कोई जीवित बचा भी तो विकिरण का प्रभाव आनेवाली पीढ़ियों पर रहता, कई तरह की अनुवांशिक बीमारियाँ और विकृतियाँ होती. जिस कुरुक्षेत्र में इन नाभिकीय हथियारों का इस्तेमाल हुआ था, वह जगह रहने लायक नहीं रहती, विकिरण का प्रभाव हजारों सालों तक रहता है. इन ग्रंथों में परमाणु हथियार या परमाणु संयंत्र बनाने की विधि लिखी होनी चाहिए थी. अपने इस शोध में डॉ. नीतीश प्रियदर्शी ने हड़प्पा और मोहनजोदड़ो की संस्कृति को भी नहीं छोड़ा है जिनका हिन्दू सभ्यता-संस्कृति से कोई रिश्ता नहीं है. इस स्लाइड शो के अंत में डॉ. नीतीश प्रियदर्शी अपने इस शोध की जिम्मेदारियों से खुद को बचाते हुए नज़र आते है. वह बड़ी चालाकी से यह कह कर निकल जाते है कि इस शोध से उन्होंने कुछ साबित करने की कोशिश नहीं की है, यह शोध उन्होंने कुछ इंटरनेट वेबसाइटों और किताबों की मदद से किया है. हालांकि वह उन इंटरनेट वेबसाइटों और किताबों का कोई संदर्भ नहीं देते है. डॉ. नीतीश प्रियदर्शी इन धर्मग्रंथों का वैज्ञानिक और तार्किक विश्लेषण करने की जगह इनका महिमामंडन करते दिखते है.

डॉ. नीतीश प्रियदर्शी अपने एक दूसरे हालिया “शोध” में झारखंड के आदिवासी गाँवों में राम-लक्ष्मण के “पद-चिन्ह” खोज रहे है, जिसकी खबर झारखंड के एक अंग्रेजी अखबार ने छापी है. [3] उनके इस “शोध” का तरीका भी हिन्दू धर्मग्रन्थों के अध्ययन तक सीमित है.  इस “शोध” में वह गाँव में प्रचलित महाभारत और रामायण से जुड़ी किवदंतियों का जिक्र भी करते है. यहाँ पेंच यह है कि आदिवासियों के खुद के आदि-धर्म हैं, उनका हिन्दू धर्म से कोई लेना-देना नहीं तो फिर ये महाभारत और रामायण की किवदंतियाँ कहाँ से आई? इस बाबत जब डॉ. नीतीश प्रियदर्शी से सवाल किया गया तो उन्होंने कहा कि वह भूवैज्ञानिक है और वहाँ पत्थरों और “पद-चिन्हों” पर शोध करने गए थे, उन्होंने गाँववालों से ज्यादा बातचीत नहीं की.

“अल्पसंख्यक तुष्टिकरण” जैसे जुमलों को उछालने वाले यह आसानी से भूल जाते हैं कि इस देश में बहुसंख्यक धर्म का तुष्टिकरण कैसे कई स्तरों पर होता रहता है. इस मामले में मीडिया, बुद्दिजीवी, प्रशासन तो अपनी भूमिका निभाते ही हैं, यहाँ तक कि अदालतें भी कई बार हिन्दू मिथकों के आधार पर फैसलें सुनाती है.

लेखक अतुल आनंद ने रांची से जनसंचार में स्नातक किया है और अभी वह टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान, मुंबई से मीडिया में स्नातकोत्तर कर रहे है.

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