पूर्व के दिनों में भड़ास पर एक खबर आयी थी कि सहाराश्री ने सहारा मीडिया में फैली गंदगी एवं भाई-भतीजावाद को समाप्त करने की जिम्मेवारी जयब्रत राय (राष्ट्रीय सहारा के प्रबंध संपादक) को सौंपी है। अपने मन में पड़ी ‘भड़ास’ को मैं उनके लिए लिख रहा हूं जिसे पढ़कर वो पटना स्थित ‘राष्ट्रीय सहारा’ में व्याप्त गंदगी को समाप्त करते हुए अच्छे एवं काम करनेवालों के साथ न्याय करें। हो सकता है भड़ास के माध्यम से अपनी बात रखने के कारण मुझे न्याय नहीं मिले लेकिन मैं इसकी परवाह नहीं करता हूं। इस रिपोर्ट के प्रकाशित होने के बाद ‘राष्ट्रीय सहारा’ पटना यूनिट में व्याप्त गंदगी को अगर प्रबंधन समाप्त कर दे और वह बिहार में दिन काटने के बजाय हिन्दुस्तान, जागरण एवं प्रभात खबर के साथ प्रतिस्पर्द्धा में शामिल हो जाये तो यही मेरे लिए काफी है।
28 अगस्त 2008 को मैं तत्कालीन समाचार संपादक सरोज सिंह एवं माननीय प्रसार सलाहकार आदरणीय के. पी. सिंह की अनुमति से समस्तीपुर जिले में ब्यूरो प्रभारी के रूप में काम करना प्रारंभ किया। मेरे काम शुरू करने के समय जिले के 20 प्रखंड में से मात्र 3-4 प्रखंडों में ही संवाददाता कार्यरत थे। 2-3 दिनों तक मेरे कार्य को देखते हुए मुझे अन्य प्रखंडों में रिर्पोटरों को चुनकर अच्छी टीम बनाने की जिम्मेवारी सौंपी गई जिसे मैंने 2 दिनों में पूरा करते हुए समस्तीपुर पेज को बेहतर तरीके से भरने लगा। परिणामस्वरूप तत्काल पूरे जिले में 750 सर्कुलेशन वाला अखबार 1400-1500 बिकने लगा। इसके लिए रोजाना पटना से दिन में कई बार मेरी हौसलाफजाई करते हुए धन्यवाद दिया जाने लगा।
समस्तीपुर में ‘राष्ट्रीय सहारा’ का ऑफिस रहते हुए अखबार का सारा काम साईबर कैफे से संचालित करना पड़ रहा था, क्योंकि पटना से ऐसा ही करने को बोला गया था। कार्यालय एवं अन्य संसाधनों की सुविधा पूर्व से कार्यरत ब्यूरो चीफ को दी गई थी और मुझे कहा गया था कि साईबर कैफे एवं संचार सुविधा में हुए खर्च महीने के अंत में बिल प्रस्तुत करने पर प्रेस द्वारा भुगतान किया जायेगा। एक तरह से समस्तीपुर कार्यालय के समानान्तर दूसरा कार्यालय समाचार संपादक एवं ब्यूरो को-आर्डिनेटर की अनुमति से अस्तित्व में आ गया। माड़वारी बाजार स्थित ‘राष्ट्रीय सहारा’ कार्यालय के बदले पुरानी पोस्ट ऑफिस चौक स्थित एक साईबर कैफे के केबिन में जिला मुख्यालय की 95 प्रतिशत प्रेस विज्ञप्तियां पहुंचने लगी। बिहार सरकार के सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग द्वारा भी साईबर कैफे स्थित अघोशित कार्यालय में प्रेस विज्ञप्तियां भेजी जाने लगी जहां से मैं प्रेस विज्ञप्ति एवं जिले के अन्य सारे रिर्पोटरों से प्राप्त समाचारों को कंपोज कर पटना मुख्यालय को दिया करता था।
तीन महीने में जब समस्तीपुर में ‘राष्ट्रीय सहारा’ की गाड़ी सरपट दौड़ने लगी तो मुझे पटना बुलाकर तत्कालीन ब्यूरो को-आर्डिनेटर सुरेश राय से मिलने को कहा गया। श्री राय से जब मैं मिला तो उन्होंने मेरी जमकर तारीफ करते हुए तीन महीने का बिल (समाचार प्रेषण में हुए खर्च का) देने को कहा। उनके निर्देशानुसार जब मैं बिल देने पहुंचा तो वहां ब्यूरो को-आर्डिनेटर से लेकर समाचार संपादक तक के तेवर बदले हुए थे। मुझे बिना कारण बताये न्यूज भेजने से मना कर दिया गया और मेरे द्वारा दिये गये बिल के बारे में बताया गया कि उपर के अधिकारियों द्वारा उसे निरस्त कर दिया गया है।
‘राष्ट्रीय सहारा’ ने मुझे बेहतर प्रदर्शन के बाद भी बिना किसी वजह के हटा दिया था जिसे मैं आज तक ईगो से जोड़े हुए हूं। जरूरत पड़ी तो सहारा मीडिया के अभिभावक आदरणीय जे. बी. राय तक से गुहार लगाउंगा। कोई भी नेतृत्वकर्त्ता यह नहीं चाहेगा कि उसके संस्थान में बेहतर काम करनेवालों के साथ गलत व्यवहार किया जाय। कुछ और भी बातें और प्रमाण है जिसे मैं यहां नहीं लिखना चाहता हूं लेकिन जे. बी. राय के स्तर से यदि इस मामले की जांच जो वरीय अधिकारी करेंगे उनके समक्ष जरूर रखूंगा। क्योंकि समस्तीपुर जिले में अखबार संबंधी कुछ बिन्दुओं पर बात करने के लिए पटना यूनिट हेड प्रदीप सिन्हा से समय मांगा तो उन्होने मिलने से इनकार कर दिया।
ऐसा उन्होंने इसलिए किया क्योंकि मेरे साथ तत्कालीन टीम द्वारा जो कुछ भी किया गया श्री सिन्हा भी मार्केटिंग मैनेजर के रूप में उस टीम में शामिल थे। हलांकि श्री सिन्हा उस समय अखबार के हित में नजर आते थे और मेरे मामले की सच्चाई से अवगत थे और इसके लिए उपर के अधिकारियों को जिम्मेवार ठहराते थे। पर एक यूनिट हेड के रूप में आज श्री सिन्हा की कार्यप्रणाली अखबार के हित के लिए बिलकुल ही अच्छी नहीं है। बड़े पद पर जाने के बाद वो हमेशा चापलूस एवं चाटुकार टाईप लोगों से घिरे रहते हैं जिससे वो धरातल पर अपने अखबार की वास्तविकता से बिल्कुल ही अंजान बने हुए हैं। कोई जरूरी नहीं था कि उनसे मिलने पर मैं जो कहता वे उसे मान लेते लेकिन यूनिट हेड होने के नाते 100 किमी की दूरी तय कर मिलने आये व्यक्त्ति को दो मिनट का भी समय देना मुनासिब नहीं समझते हुए मिलने तक से इनकार कर जाना सहारा इंडिया परिवार की सभ्यता और संस्कृति से बिल्कुल ही भिन्न है।
इस प्रकरण में सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि मुझे बिना कारण के हटानेवाले समाचार संपादक सरोज सिंह जब ‘राष्ट्रीय सहारा’ को छोड़कर ‘चौथी दुनिया’ में गये तो सबसे पहले मुझे ढ़ूंढ़कर निकाला और मेरी नियुक्ति ‘चौथी दुनिया’ में करवाई। अगर मैं गलत रहता तो मुझे हटानेवाले मुझे दूसरे संस्थान में अपनी टीम में मुझे स्थान नहीं देते। बाद में 3 सालों तक मैं सरोज सिंह के साथ मिलकर ‘चौथी दुनिया’ के लिए काम किया लेकिन बाद में एक अति महत्वपूर्ण समाचार को स्वार्थवश रद्दी की टोकड़ी में फेंक दिये जाने के कारण मैंने अप्रैल 2012 में सरोज सिंह एवं ‘चौथी दुनिया’ को अलविदा कह दिया।
दो साल से भी ज्यादा लंबे समय से समस्तीपुर जिला में राष्ट्रीय सहारा अखबार घिस-पिट कर चल रहा है। समस्तीपुर के पेज पर जिले की इक्का दुक्का खबरे ही देखने को मिलती है और पूरा पेज दूसरे जिले के समाचार से भरा जाता है। पूरे जिले में (20 प्रखंडों में) मात्र 450 प्रतियों का ही सर्कुलेशन है। पटना यूनिट द्वारा समस्तीपुर की बदहाल व्यवस्था को इसलिए दुरूस्त नहीं किया जा रहा है क्योंकि यहां के ऑफिस खर्च, ब्यूरो का मानदेय, प्रखंड स्तरीय रिर्पोटरों के भत्ते आदि पर बननेवाले बिल का बड़ा हिस्सा पटना के लोग हड़प जा रहे हैं, ऐसा वर्त्तमान ब्यरो चीफ हरेराम चौधरी का कहना है (मोबाईल पर मेरे साथ हुई बातचीत में/बातचीत का विवरण रिकार्ड है) क्योंकि उन्हें पिछले 30 माह से किसी प्रकार का भी भुगतान नहीं मिल रहा है। पटना यूनिट के एक साथी ने बताया कि यहां के लोग समस्तीपुर में किसी कमजोर रिपोर्टर को खोज रहे हैं जिसे ब्यूरो चीफ बनाकर उसके नाम पर आवंटित होनेवाली राशि का आपस में बंदरबांट कर सके। अच्छा काम करनेवालों को पटना मुख्यालय में भी शंटिंग में रखा गया है और चमचागिरी, मक्खनबाजी एवं गणेश परिक्रमा करने वालों की पौ बारह है।
खबर है कि ‘राष्ट्रीय सहारा’ समस्तीपुर जिले में फेरबदल करने के मूड में है। ऐसे में मैं आदरणीय सहारा श्री एवं माननीय जे. बी. राय से अनुरोध करूंगा कि मेरे द्वारा उठाये गये मामले (कुछ अंदर की बातें भी है जिसे यहां सार्वजनिक नहीं किया जा सकता है) की जांच कराते हुए मेरे साथ न्याय करने की कृपा की जाय।
विकास कुमार
मो.- 9570349744
लेखक राष्ट्रीय सहारा, पटना यूनिट में कार्यरत रह चुके हैं.






