: दोनों दलों के बड़े नेताओं और उनके रिश्तेदारों ने कौडि़यों के भाव में हथिया रखी हैं जमीनें : हाल के विधान सभा चुनावों में कांग्रेस का उत्तर प्रदेश, पंजाब व गोवा में जो हाल हुआ है, उससे लगता है कि दिल्ली में बैठी कांगेस को उत्तराखंड की मुश्किल जीत भी हजम नहीं हो पा रही है और वह अपने हवाई नेताओं के बहकावे में आकर वहां भी आत्महत्या करने पर आमादा है.
अलग राज्य बनने के छोटे से (मात्र 11 साल) कार्यकाल में दिल्ली में बैठे दोनों ही दलों के नेताओं व उनके रिश्तेदारों ने जिस प्रकार अपने-अपने मुख्यमंत्रियों के माध्यम से उत्तराखंड की बेशकीमती जमीनों को कौडियों के मोल में लूटा है, उसकी अगर सूची जारी की जाए तो इन नेताओं को राज्य में अपना मुंह दिखना मुश्किल हो जाएगा और मात्र यही एक मुद्दा दोनों दलों को राज्य में जमीन सुंघाने के लिए काफी होगा. उत्तर प्रदेश में अपनी हार की समीक्षा के अगले ही दिन जिस प्रकार उत्तराखंड में नेता का चयन किया गया, वह निर्णय राजनीतिक समीक्षकों के लिए हैरत करने वाला है. इस पूरे प्रकरण में जिस तरह पार्टी के जमीनी नेताओं की उपेक्षा हुई है, उससे लगता है कि कांग्रेस राज्य में आत्महत्या की ओर बढ़ रही है. यह भी लगता है कि इस पूरे प्रकरण में राहुल व सोनिया गांधी को अँधेरे में रखा गया है और रखा जा रहा है.
उधर, उत्तराखंड में तीसरे मोर्चे की उम्मीद पाले नेता इस फिराक में हैं कि हरीश रावत जैसे कदावर नेता कांग्रेस से बाहर निकलकर तीसरे मोर्चे की अगुवाई करें और उत्तराखंड की तमाम राजनीतिक ताकतें उनके नेतृत्व में लामबंद हों. उनके साथ इस मुहिम में कांग्रेस व भाजपा में उपेक्षा झेल रहे नेता भी जुड़ सकते हैं. उत्तराखंड का दुर्भाग्य रहा है कि उसे हिमाचल प्रदेश की तरह डा. वाईएस परमार व राजा वीरभद्र सिंह जैसे खुद्दार व कदावर नेता नहीं मिले, जो राज्य के हित में जमीनी हकीकत से दूर दिल्ली में बैठे पार्टी हुक्मरानों को आँख दिखा सकें और अपनी शर्तों के साथ राज्य हित में शासन कर सकें.
लेखक विजेंद्र रावत उत्तराखंड के वरिष्ठ पत्रकार हैं.






