उत्तर प्रदेश का चुनावी महाभारत अपने चरम पर है. कांग्रेस की तरफ से महासचिव राहुल गाँधी ने खुद कमान सम्हाल रखी है और उनके हरेक लफ्ज़ और कार्य पर टीका-टिप्पणी हो रही है. जनता मज़ा लूट रही है और मीडिया वालों की तो चांदी है. जब उत्तर प्रदेश में इतना सब कुछ हो रहा है तो खबर को सेंकने, तानने और परोसने में किस बात की कोताही? भारत में चुनाव वैसे भी किसी पंचवर्षीय जश्न के कम थोड़े ही है और जब बात उत्तर प्रदेश की हो तो फिर क्या कहना! कल शाम से ही राहुल बाबा ने अपने चुनावी सभा के दौरान मंच से कागज़ का एक टुकड़ा क्या फाड़ दिया, मानो पूरे प्रदेश ही राजनीति में भूचाल सा आ गया. इस खबर को इतने-तेल मसाले के साथ परोसा गया मानो राहुल बाबा ने अपने ही हाथों उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की किस्मत ही फाड़ डाली.
वैसे भी राहुल गाँधी ने ज़रा सी कोई हरकत कर दी तो पूरा विपक्ष लामबंद हो जाता है और फिर हाय तौबा से लेकर पता नहीं क्या-क्या नुक्ताचीनी का बाज़ार गरम हो जाता है. मीडिया वाले चातक चिरई की तरह मुंह बाए खड़े रहते हैं और बीच में ही सब कुछ रोक लेते हैं. अरे भैया हुआ क्या? जवान आदमी हैं. मुलायम सिंह के वादों की फेहरिस्त को ही फाड़ा ना. सिर्फ इतना कहकर वो कागज़ फाड़ दिया कि उत्तर प्रदेश का आम आदमी ऐसे वादों की लिस्ट से तंग आ गया है और वैसे भी मौलाना मुलायम अक्सर अपने वादे से मुकर जाते हैं. कल शाम से हर टेलीविजन चैनल पर यही राम कहानी हर आधे घंटे के बाद बदस्तूर दोहराई जा रही है और हर गली-नुक्कड़ पर भी लोग-बाग़ इस बात का चटखारे लेकर नकल किये जा रहे हैं. अरे भाई. इतने बड़े देश में कोई और भी खबर है क्या? मगर बात राहुल बाबा की हो और उस पर बवाल ना मचे यह कैसे हो सकता है. पहले मुलायम सिंह जी कूद पड़े और कहा कि राहुल ऐसी हरकत नासमझी और नादानी में कर रहे हैं. मगर अखिलेश यादव एक और कदम आगे बढ़ गए और कहा कि आज मंच से एक पर्चा फाड़ दिया तो कल वो मंच से नीचे भी कूद पड़ेंगे.
दूसरी तरफ राजनाथ सिंह ने इसे गैर जिम्मेदाराना हरकत करार देते हुए कहा कि राहुल देश की राजनीति के लायक अब तक नहीं हुए हैं. बस क्या था. कांग्रेस वाले कहाँ चुप रहते. आखिर सवाल राहुल भैया का था. देश में और कुछ भी हो जाए तो कुछ ग़म नहीं. मगर राहुल गाँधी के खिलाफ एक लफ्ज़ कोई कांग्रेसी सुनसे को तैयार नहीं. सबसे पहले बहन प्रियंका ने बयान जारी करते हुए कहा कि राहुल ने समाजवादी पार्टी का घोषणा पत्र नहीं बल्कि एक पर्चा फाड़ा था. फिर प्रमोद तिवारी जी की बारी थी. उन्होंने अपने ही अंदाज़ में बयान दे डाला कि सारा विपक्ष राहुल के नाम से ही घबराता है. राहुल गाँधी अगर किसी ग़रीब के घर में भी चले जाएँ तो उनको ये नागवार गुज़रती है. वैसे भी समाजवादी पार्टी का घोषणा पत्र या पर्चा रद्दी के ही बराबर है और राहुल जी को तो उसे एक कूड़े दान में फ़ेंक देना चाहिए था. बीच में राजा दिग्विजय सिंह ने एक अलग तान छेड़ दी. पता नहीं तीसरे दौर के चुनाव के पहले ही उन्होंने ये क्यों कह दिया कि अगर उत्तर प्रदेश में कांग्रेस हारी तो इसके लिये वो जिम्मेदार होंगे. अमां राजा साहब, ऐसी क्या ज़ल्दी थी? कही ऐसा तो नहीं कि उनको ये बात मालूम पड़ गयी हो कि चुनाव परिणाम के बाद राहुल बाबा के सब हितैषी उनकी ही गिरेबान पकड़ने पर उतारु हो जायेंगे?
वैसे भी दिग्विजय सिंह का अंदाज़े बयां और उनकी साफगोई उनके ही रकीबों को हर वक़्त नागवार गुज़रती है. कोई कहता है कि वो हमेश दोधारी तलवार चलाते हैं तो कोई कहता है कि उनकी अगुवाई में कांग्रेस पार्टी का हश्र उत्तर प्रदेश में वही होने वाला है जो २०१० में पार्टी के साथ बिहार में हुआ था. अगर खबरचियों की माने तो ये कहा जा सकता है कि अब तक कांग्रेस पार्टी को लेकर आम कार्यकर्ताओं में भी खासा उत्साह नहीं है. ये दिगर बात है कि पूरा गाँधी खानदान अपने लाव लश्कर से साथ इस बार मैदान में उतरा है और वो हर हाल में माया की माया नगरी में सेंध लगाने की मुहिम में है. लेकिन आकाश के तारों और ज़मीन के धुरंधरों की चाल शायद कुछ अलग तरह का संकेत दे रही हैं. उत्तर प्रदेश की ज़मीनी हकीकत अब तक यही बता रही है कि बहुजन समाज पार्टी का पलड़ा अब भी भारी है और वो हर हाल में १६० से ज्यादा सीटें ले जाएगी. दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी भी लगभग बसपा के आस-पास की परिधि में है. कांग्रेसी नेता लोग भले की कितनी गाली दें मगर सच्चाई यही है कि उत्तर प्रदेश में मुसलमान मतदाता आज भी मुलायम के साथ जुड़ा है और उसका फायदा समाजवादी पार्टी को मिलेगा ही. भारतीय जनता पार्टी ने पिछले चुनाव में ५० सीटें हासिल की थी. इस बार उसका आंकड़ा करीब ७० से ८० के बीच होगा.
ऐसे में सब की निगाहें राहुल गाँधी के हर बोल और हर हरकत पर होगी. राहुल गाँधी भले ही उत्तर प्रदेश को खेत में गन्ने की तरह कदा करना चाहे. उनकी नीयत या उनके इरादे में कोई खोट नहीं है. मगर असली मुद्दा ये है कि उनकी पार्टी की जड़ अब उत्तर प्रदेश में कहाँ महफूज़ बची है. दिग्विजय सिंह जी ने जितनी कवायद करनी थी, वो कर चुके. मगर पार्टी के लिए जनाधार को बढ़ाने में सफल नहीं हुए. दरअसल ऐसे कई सवाल हैं जिसपर कांग्रेस पार्टी ने संजीदगी से सोचा ही नहीं. एक, दिल्ली में बैठे लोग अब भी यही सोचते हैं कि कई कांग्रेस पार्टी की अस्मत बचने का जिम्मा गाँधी परिवार के हाथ मे है. बाकी लोग मौज करें. कांग्रेस पार्टी इसी मुगालते में पिछले बिहार विधान सभा चुनाव में अपनी इज्ज़त गंवा बैठी. सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी के साथ मनमोहन सिंह भी ताल ठोंक कर चुनावी मैदान में कूद पड़े. मगर अंजाम क्या हुआ. २४३ सीटों में से कांग्रेस को सिर्फ ४ सीटें ही मिल पाई जो बिहार में आजादी से लेकर अब तक का सबसे ख़राब रिकार्ड है.
दो, कांग्रेस के नेता लोग अब तक अपने ही पांव पर कुल्हाड़ी मारते रहे हैं. उत्तर प्रदेश में बाटला हाउस काण्ड को बार-बार दोहराने की क्या ज़रूरत थी? कहीं दिग्विजय सिंह ने तो कहीं सलमान खुर्शीद ने उसको जेब से बहार निकाल कर गुलाल की तरह सब के ऊपर फेंक दिया. मगर वो इस बात को भूल गए कि आज का मुसलमान मतदाता अब काफी होशियार हो गया है और कांग्रेस पार्टी को जिताने और हराने से ज्यादा उसको अपनी जान-माल के हिफाज़त की फ़िक्र है. लिहाज़ा वो उसी प्रत्याशी तो वोट देगा जो उसकी जान माल की हिफाज़त करे. तीन, आज कांग्रेस के नेता उत्तर प्रदेश में मुसलामानों के लिये अलग आरक्षण की बात करते हैं. सलमान खुर्शीद ने यही किया ये सोचकर कि शायद उत्तर प्रदेश की जनता फिर झांसे में आ जाये. क्या सच ये नहीं की पिछले ६३ सालों में कांग्रेस की सरकार ने इसके बारे में सोचा ही नहीं. तभी एक मौलाना ने बड़े ही तल्ख़ अंदाज़ में फरमाया कि भाई हम क्या करें, हमने तो कांग्रेस हाईकमान से मुसलमान माँगा था, उन्होंने सलमान को भेज दिया. सलमान मियां पत्नी मोह में पड़कर चुनाव आयोग पर ही बरस पड़े और अपने साथ-साथ अपनी पार्टी का भी किरकिरी करवा दिया.
चार, मायावती ने अदालत की फटकार सुनने के बाद भी राज्य में स्थानीय निकायों का चुनाव नहीं होने दिया और कांग्रेस या भारतीय जनता पार्टी उसके कुछ नहीं बिगाड़ सकी क्योंकि मायावती ये बहुत अच्छी तरह से जान गयी हैं कि विधान सभा चुनाव में पंचायत के लोगों का साथ होना कितना ज़रूरी है. आज भी ६० फीसदी पंचायत उसके साथ है और यही उसकी ताकत है. जब कांग्रेस पार्टी के पास वो ताकत है ही नहीं तो फिर मुंगेरी लाल के सपने देखने से क्या फायदा? जब तक ठोस जनाधार और स्थनीय स्तर पर लोग नहीं जुड़ेंगे तब तक कांग्रेस पार्टी का ये सपना शायद कागज़ के पन्नों तक सीमित रहेगा. ये बात राहुल बाबा और बाकी कांग्रेस के लोग जितनी ज़ल्दी समझ पायें, तो बेहतर है. पांच, अमूमन सटीक तौर पर बात करने वाले सलमान खुर्शीद को चुनाव आयोग ने भी आड़े हाथों लिया और केंद्र सरकार की भी मिट्टी पलीद कर दी. मामला राष्ट्रपति भवन तक पहुँच गया और फिर कांग्रेस पार्टी की ही फजीहत हुई. इसके अलावा कई कांग्रेस के नेतागण विपक्ष पर टूट पड़ने के बदले अपने घर में ही महाभारत शुरू कर देते हैं. मिसाल के तौर पर कांग्रेस के सांसद पीएल पुनिया और केंद्र सरकार में मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा के बीच में घमासान पर बाकी लोग मज़े ले रहे हैं. और कांग्रेस आला कमान तमाशा देख रही है.
ऐसे में भी अगर कांग्रेस पार्टी को लगता है कि राहुल गाँधी अकेले ही सबकी नैया पार कर देंगे तो ये एक करिश्मा ही होगा. कांग्रेस पार्टी अपनी सीटों के आंकड़े में बढ़ोत्तरी तो कर पायेगी मगर क्या वो मायवती की लंका ढाह पाएगी ये कहना निहायत ही मुश्किल है. ख़ुफ़िया तंत्र के अनुसार कांग्रेस को ३७ से ४० सीटें ही मिल पायेगी. अगर ये सच है तो कांग्रेस के लिए और खासकर गाँधी परिवार के लिये ये बुरी खबर है. राजनीति के पंडित और मौलवी ने तो अब से ही कहना शुरू कर दिया है कि राहुल गाँधी उत्तर प्रदेश के
महाभारत के चक्रव्यूह में कहीं अभिमन्यु की तरह फँस तो नहीं गए है? और उसी क्रम में उन्होंने कल लखनऊ की चुनावी सभा में अपने हाथों कांग्रेस पार्टी की किस्मत ही तो नहीं फाड़ डाली?
लेखक अजय एन झा वरिष्ठ पत्रकार और समालोचक हैं. ये हिंदुस्तान टाइम्स, आजतक, डीडी न्यूज, बीबीसी, एनडीटीवी एवं लोकसभा टीवी के साथ वरिष्ठ पदों पर काम किया है. अजय से संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है.






