(लखनऊ के प्रतिबद्ध वामपंथी सामाजिक कार्यकर्ता सत्येन्द्र कुमार और कई अन्य साथियों ने राहुल फाउंडेशन का कच्चा चिट्ठा जनता के बीच लाने के लिए पिछले करीब एक दशक से बहुत मेहनत की है। सत्येन्द्र जी ने इनका पर्दाफाश करने लिए एक पुस्तिका भी लिखी है।
इस संगठन पर अब तक इससे निकले या निकाले गए साथियों ने क्या-क्या सवाल उठाए हैं, इसे जानने और लिखित दस्तावेज के लिए इच्छुक लोग साथी सत्येन्द्र कुमार से ([email protected]) संपर्क कर सकते हैं। अब इनकी यह मेहनत रंग लाने लगी है। यही वजह है कि राहुल फाउंडेशन इनके ऊपर बौखलाया हुआ है। इसी बौखलाहट में उसने सत्येन्द्र कुमार से निपट लेने की धमकी दी है। पेश है सत्येन्द्र कुमार का पत्र..
31 मई सुबह 6 बजे का वक्त था। लखनऊ की राहुल फाउंडेशन नामक संस्था और इसके मालिक-मालिकिन शशि-कात्यायनी गैंग से जुड़ा एक आदमी रामबाबू जनचेतना वैन, टाटा 709/ लेकर आया और हमारे दरवाजे पर खड़ी कर गया! जाते-जाते उसने मुझे धमकी दी-‘सत्येन्द्र कुमार तुमने आज तक जो कुछ भी हम लोगों (राहुल फाउंडेशन) के खिलाफ किया है, उसका फल भुगतने के लिये तैयार रहो। देखते हैं कौन तुम्हारा साथ देता है!’
इस जनचेतना वैन को हमने ही अपने पैसों से खरीदा था और सोचा था कि इससे सामाजिक बदलाव का काम आगे बढ़ेगा! इससे पहले भी हम अपनी काफी संपत्ति इस काम के लिए दे चुके थे और अब बचा-खुचा 11.50 लाख रुपया इस वैन में लगा दिया था। हमने तो यही सोचा था कि हमारी इस कुबार्नी से समाजिक परिवर्तन के काम को आगे बढ़ाने में मदद मिलेगी। हमने कभी नहीं सोचा था कि इससे एक अपराधिक गैंग खड़ा हो जाएगा। इस आपराधिक गिरोह द्वारा इस तरह अचानक वैन वापस करना हैरानी में डालने वाली बात है। आखिर उसने क्यों मुझे इस वैन को वापस कर दिया। वह भी मेरी उस बेटी शालिनी की मौत के तुरंत बाद, जिसे इमोशनल ब्लैकमेल करके इस गिरोह ने अपने गैंग में शामिल कर रखा था और मेरे खिलाफ उसे भड़का रखा था। हमने तो वैन वापस भी नहीं मांगी थी! आखिर ऐसा क्या हो गया कि इस गैंग को यह कदम उठाना पड़ा।
फिर याद आया-अपराधी हमेशा कायर होते हैं। वैन अभी भी हमारे नाम पर ही है। अब बेटी की मौत के बाद कायरों ने सोचा कि वैन को पचा जाना मुश्किल होगा, तो चुपचाप उसे वापस कर देने में ही भलाई समझी। लेकिन, चोर और अपराधी अपनी आदत भला कैसे छोड़ सकते हैं! वैन तो वापस कर दी, लेकिन उसमें लगा लाखों का कीमती सामान उड़ा लिया! हाल यह है कि बस ढांचा ही ढांचा बचा है। वैन से होंडा कंपनी का जनरेटर, प्रकाश उपकरण, किताबों की रैक, गाड़ी के पीछे वाले दोनों पहिए, लोहे का काफी सामान आदि गाड़ी से गाड़ी से गायब है। वैसे इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है। इन क्रांतिकारी नामधारी नटवर लालों ने क्रांति को कितना बदनाम किया, अपने ही साथियों को कितने जख्म दिए, जनता को किस कदर लूटा, इसका अंदाजा दो तथ्यों से ही लगाया जा सकता है।
एक-इन पर जबरन संपत्ति कब्जा करने के आपराधिक मामले चल रहे हैं; दो-इन्होंने क्रांति का बाना ओढ़कर अपने ऐशोआराम के लिए पैसा बटोरा; वह भी कार्यकतार्ओं को इस भ्रम में रखकर कि वे क्रांति कर रहे हैं। संगठन ऐसा है कि एक तरफ बदहाल खटने वाले अधिकार रहित कार्यकर्ता हैं और दूसरी तरफ अधिकार और सुविधा संपन्न एक खास परिवार के लोग जो नेतृत्व करते हैं! सामाजिक बदलाव के काम के भ्रम में इस गिरोह ने कितनी जिन्दगियां बर्बाद कर दीं! आखिर यह कब तक चलता रहेगा! क्या वे यह सोचते हैं कि उन्हें समाज हमेशा बर्दाश्त करता रहेगा! नहीं। ऐसा नहीं होगा। लखनऊ से इनके खिलाफ बिगुल बज चुका है।
देवेंद्र प्रताप के ब्लॉग 100 flowers से साभार.






