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सुख-दुख...

रेप का स्‍टेटस क्‍या है, रेपिस्‍ट किस तबके से ताल्‍लुक रखते हैं?

देहरादून के एक और स्ट्रिंगर ने टीवी मीडिया छोड़ दिया. हमारे सहयोगी शशि भूषण मैठाणी ने आजतक को अलविदा कह दिया. क्यों ऐसा किया? पता चला कि आजतक ने उनसे खबरें लेने की बजाए एएनआई न्यूज़ से खबरें लेनी शुरू कर दी, जिस से वो परेशान थे.. सवाल रोज़ी-रोटी का था.. कुंठा में जी रहे थे. लिहाजा तनाव से खुद को दूर करना की बेहतर समझा. मैठाणी अब अपनी पत्रिका पर ज्यादा ध्यान देंगे. उनके टीवी मीडिया से जाने का दुःख हुआ.. वो बद्रीनाथ, केदारनाथ से लेकर न जाने कहाँ-कहाँ से मेहनत कर खबर लाते थे, जो शायद एएनआई न दे पता.

देहरादून के एक और स्ट्रिंगर ने टीवी मीडिया छोड़ दिया. हमारे सहयोगी शशि भूषण मैठाणी ने आजतक को अलविदा कह दिया. क्यों ऐसा किया? पता चला कि आजतक ने उनसे खबरें लेने की बजाए एएनआई न्यूज़ से खबरें लेनी शुरू कर दी, जिस से वो परेशान थे.. सवाल रोज़ी-रोटी का था.. कुंठा में जी रहे थे. लिहाजा तनाव से खुद को दूर करना की बेहतर समझा. मैठाणी अब अपनी पत्रिका पर ज्यादा ध्यान देंगे. उनके टीवी मीडिया से जाने का दुःख हुआ.. वो बद्रीनाथ, केदारनाथ से लेकर न जाने कहाँ-कहाँ से मेहनत कर खबर लाते थे, जो शायद एएनआई न दे पता.

देहरादून से अन्य टीवी मीडिया से जुड़े लोग भी परेशान हैं, वो अपने ऑफिस में पूछते हैं कि गैंग रेप हुआ है खबर भेज दें? ऑफिस से पूछा जाता है, रेप का स्टेटस क्या है? रेप करने वाले किस तबके से ताल्‍लुक रखते हैं? उनके पूछने का मतलब ये था कि यदि खबर, गरीब घर से है तो रहने दो, पीडि़त यदि अच्छे घर से है.. मार्डन है तो खबर चल सकती है… टीआरपी के लिए ऐसा पूछा जाता है.. अब दलित या निचले तबके की खबर पर भी सवाल जवाब हो रहे है.. ऐसा ही कुछ सवाल, अपराध की दूसरी खबरों पर भी पूछे जाते हैं… ऐसे सवाल इन दिनों और भी ज्यादा पूछे जाने लगे हैं.. क्यूंकि अब टीवी मीडिया के धुरंधर इन्सान के स्टेटस से अपनी टीआरपी तय करेंगे.

साथ ही एक बात और यदि खबर देहरादून, उधम सिंह नगर या नैनीताल जैसे नामी शहर की है तो विचार हो भी जायेगा, यदि पौढ़ी, पिथौरागढ़ से है तो आपको आइडिया भेजने की भी जरूरत नहीं. क्यूंकि वो टीआरपी सिटी नहीं है, अगर हम इन सवालों की तह पर जाये तो एक ही जवाब मिल रहा है कि दिल्ली मीडिया को अब स्ट्रिंगर की जरूरत नहीं.. केवल नाम को संवाद सूत्र रखे रहेंगे.. जब कोई बाईट जरूरत हुई मंगवा ली. चार-पांच सौ का बिल बन जायेगा या कोई ब्रेकिंग खबर ले लेंगे.. लेकिन अब स्ट्रिंगर भी दूसरी तरफ कामों की तरफ हाथ-पैर मारने  लगे हैं ताकि उनकी रोजी रोटी चल सके.. ऐसे में खबर समय से चैनल को मिल जाएगी.. इसमें संदेह है.. और यदि मिलेगी तो वो भी रीजनल चैनल में घिस-पिट चुकी होगी.

कुछ समय पहले खबर आई थी कि आजतक के अंग्रेजी चैनल हेडलाइन्स टुडे ने अपने इनपुट पर हिंदी डेस्क से जुड़े लोग रखे हैं ताकि हिंदी बेल्ट से जल्दी से जल्दी खबर स्ट्रिंगर के जरिए उन तक पहुँच जाये और वो उस खबर को ब्रेकिंग बना सकें.. पर ये प्रयोग सफल होने से पहले ही दम तोड़ गया… चैनल प्रबंधन ने स्ट्रिंगर से खबर लेनी ही बंद कर दी.. सवाल यही उठता है कि न्यूज़ एजेंसी के जरिये कब तक ये दिल्ली की मीडिया अपना काम चलाएगा? खबर के पीछे जितनी मेहनत स्ट्रिंगर करता है… उतना तो स्टाफ रिपोर्टर भी नहीं करता.. हकीकत ये है कि दिल्ली से आने वाला रिपोर्टर भी पहले स्ट्रिंगर को खोजता है… उसकी तारीफ कर उससे विजुअल ले लेता है और काम निकल जाने के बाद धन्यवाद भी नहीं करता.. और दिल्ली पहुँच कर डेस्क पर उसकी बुराई अलग से.. अरे उसके तो जलवे हैं.. वो तो रैकेटियन है..क्या नहीं करता वो?

सवाल फिर यही उठता है कि दिल्ली टीवी मीडिया की खबर का असर ख़त्म हो रहा है.. रीजनल का ज्यादा असर है… स्पीड न्यूज़ ने दिल्ली मीडिया को राज्य सरकारों में शासन में बेअसर कर दिया.. अब यहाँ रीजनल की पूछ ज्यादा हो रही है.. क्यूंकि मुख्यमंत्री रीजनल खबरें ही जयादा देख रहा है और दर्शक भी.. पिछले विधान सभा चुनावों में दिल्ली मीडिया को कम विज्ञापन मिला जबकि रीजनल मालामाल हो गए… रीजनल के संपादक, रिपोर्टर को सीएम नाश्ते की टेबल पर बुलाता है… दिल्ली मीडिया को चाय भी नहीं पूछी जाती… बरहाल ये बदलता मीडिया है.. मीडिया का बदलता दौर है.. हालात रोज बदल रहे हैं.. हर कोई बदल रहा है.

लेखक दिनेश मानसेरा उत्तराखंड के टीवी जर्नलिस्ट हैं. इन दिनों एनडीटीवी के लिए नैनीताल में कार्यरत हैं.

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