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रेयरेस्‍ट ऑफ द रेयर श्रेणी के मामले में ही कोर्ट रिपोर्टिंग पर लगे रोक

: आईएनएस के वकील ने रखा तर्क : नई दिल्ली : मीडिया गाइडलाइन के मामले में सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई के दौरान बुधवार को अपना पक्ष रखते हुए इंडियन न्यूज पेपर सोसायटी ने कहा कि रेयरेस्ट आफ द रेयर श्रेणी के मामलों में ही अदालती कार्यवाही के प्रकाशन पर रोक लगाई जानी चाहिए क्योंकि इस बारे में कोई संवैधानिक उपचार नहीं है। वरिष्ठ अधिवक्ता राम जेठमलानी की तरह आईएनएस के वकील पराग त्रिपाठी ने तर्क दिया कि गलत रिपोर्टिंग के मामले में अदालत की अवमानना का कानून पहले से ही मौजूद है। इससे पहले भी कई वरिष्ठ अधिवक्ता मीडिया के लिए गाइडलाइन तैयार करने के सुप्रीम कोर्ट के रुख का विरोध कर चुके हैं।

: आईएनएस के वकील ने रखा तर्क : नई दिल्ली : मीडिया गाइडलाइन के मामले में सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई के दौरान बुधवार को अपना पक्ष रखते हुए इंडियन न्यूज पेपर सोसायटी ने कहा कि रेयरेस्ट आफ द रेयर श्रेणी के मामलों में ही अदालती कार्यवाही के प्रकाशन पर रोक लगाई जानी चाहिए क्योंकि इस बारे में कोई संवैधानिक उपचार नहीं है। वरिष्ठ अधिवक्ता राम जेठमलानी की तरह आईएनएस के वकील पराग त्रिपाठी ने तर्क दिया कि गलत रिपोर्टिंग के मामले में अदालत की अवमानना का कानून पहले से ही मौजूद है। इससे पहले भी कई वरिष्ठ अधिवक्ता मीडिया के लिए गाइडलाइन तैयार करने के सुप्रीम कोर्ट के रुख का विरोध कर चुके हैं।

शीर्ष अदालत ने मंगलवार को संकेत दिया था कि वह तमाम पक्षों से मिले सुझावों को एक सिफारिश के तौर पर संसद को भेज सकती है। वहीं वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे ने अदालत की कार्यवाही की कवरेज करने के मामले में मीडिया के लिए दिशानिर्देश तय करने के उच्चतम न्यायालय के प्रयासों का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि कानून का शासन और मीडिया की स्वतंत्रता के बीच संतुलन कायम करने की जरूरत है। साल्वे ने पांच सदस्यीय संविधान पीठ के समक्ष मीडिया दिशानिर्देशों के बारे में कहा कि संस्थागत शुचिता के हितों की रक्षा के लिए यह जरूरी हो गया है। विशेषकर इलेक्ट्रानिक मीडिया के आगमन के बाद यह जरूरी है जिसके कारण एक नया आयाम पैदा हो गया है।

साल्वे ने कहा कि महत्वपूर्ण मामलों की रिपोर्टिंग से कई बार अदालत की कार्यवाही के संचालन पर खासा प्रभाव पड़ता है। उन्होंने मुख्य न्यायाधीश एसएच कपाडि़या की अध्यक्षता वाली पीठ के सुझाव का समर्थन किया। पीठ ने सुझाव दिया था, क्या हमे अनच्च्छेद 19 (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार जिसमें प्रेस आजादी शामिल है) और अनच्च्छेद 21 (जीवन एवं स्वतंत्रता का अधिकार) का दायरा तय नहीं करना चाहिए ताकि संविधान के तहत प्रदत्त दोनों अधिकारों के बीच संतुलन कायम हो सके। साल्वे ने अदालत की कार्यवाही की कवरेज के लिए सामान्य दिशानिर्देशों के विचार का समर्थन किया विशेषकर निजता के अधिकार के सिद्धांत और अनुच्छेद 21 के तहत नागरिकों की गरिमा की रक्षा को ध्यान में रखते हुए।

उन्होंने न्यायमूर्ति डी के जैन, न्यायमूति एस एस निज्जर, न्यायमूति रंजना प्रकाश देसाई और न्यायमूति जे एस खेहर की सदस्यता वाली पीठ से कहा, आप न्यायमूर्तियों का दायित्व है कि अचुच्छेद 21 के तहत नागरिकों के अधिकारों के संरक्षण के लिए कदम उठाया जाए। साल्वे ने वोडाफोन टैक्स मामला, आरुषि तलवार हत्याकांड और अंबानी बंधुओं के गैस विवाद में एक पक्ष की ओर से पेश होने के दौरान आई परेशानियों का जिक्र करते हुए कहा कि जनहित को देखते हुए यह जरूरी हो गया है कि अदालत यह तय करे कि अदालती कार्यवाही के कवरेज के मामले में मीडिया को किस हद तक उन्मुक्ति (विशेष छूट) प्राप्त है। (एजेंसी)

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