लखनऊ की एक मासिक पत्रिका द्वारा लखनऊ के प्रतिष्ठित प्रत्रकारों श्री कमाल खान, जगदीश नरायन शुक्ला और शरत प्रधान के खिलाफ अनर्गल एवं भ्रामक खबरें प्रकाशित करना न सिर्फ निन्दनीय है बल्कि पत्रकारिता की लक्ष्मण रेखा का खुला उल्लंघन है। लखनऊ में दो दशकों से मुख्यधारा की पत्रकारिता कर रहे कमाल खान की ख्याति किसी परिचय की मोहताज नहीं है।
देश के राष्ट्रपति से दो-दो बार पुरस्कृत श्री कमाल खान और उनकी पत्नी श्रीमती रूचि कुमार इलेक्ट्रिानिक मीडिया के जाने माने चेहरे हैं और इन दोनों को अपने-अपने संस्थानों से इतना वेतन प्राप्त होता है कि अपनी कमाई से पूरा इनकम टैक्स अदा करने के बाद ये कोई प्लाट या बीघा-दो बीघा जमीन खरीदते हैं तो इस पर किसी को आपत्ति क्यों होनी चाहिए। मालूम हो कि कमाल खान ने आज तक पत्रकार कोटे से कोई जमीन या प्लाट नहीं लिया है। अब अगर कुछ सिरफिरे इनकी सफलता से परेशान हो बेवजह अलाप कर रहे हों तो इसे उसका मानसिक दिवालियापन ही कहा जाएगा।
वहीं जगदीश नरायन शुक्ला और शरत प्रधान जैसे वरिष्ठतम पत्रकारों को किसी नौसिखिये से सर्टिफिकेट लेने की जरूरत नहीं है। पिछले तीस सालों से इन वरिष्ठ पत्रकारों ने अपनी कलम और लेखनी से जहां निरंकुश सरकारों और अफसरों पर लगाम लगाई वहीं लखनऊ में दर्जनों पत्रकारों को इस पेशे की एबीसीडी सिखाई है। जगदीष शुक्ला के निष्पक्ष प्रतिदिन समाचार पत्र को जब रजिस्ट्रार आफ न्यूज पेपर्स (आरएनआई) की विधिवत मान्यता है तो इन छुटभैये तथाकथित पत्रकारों के सर्टिफिकेट की उनको आवश्यकता नहीं है।
दूसरों के जीवन भर की मेहनत और संघर्ष को नजरअंदाज करके उनके विलासिता का झूठा प्रलाप करने वाला यह पत्रकार मात्र अपनी कुंठा का शिकार है और इसी कुंठा के चलते वह प्रतिष्ठित लोगों के चरित्र हनन जैसी ओछी हरकतों पर उतर आया है जो कि निन्दनीय है और इसकी जितनी भर्त्सना की जाए कम है।
सच्चिदानन्द (सच्चे)
पत्रकार
लखनऊ






