लखनऊ : पत्रकारिता में दो धाराएं बहती हैं। एक धारा अनिर्बान की है जो अपने दायित्वों के लिए सारा कुछ न्योछार करने पर आमादा होते हैं। वह यह नहीं सोचता कि दूसरों को क्या करना चाहिए, बल्कि वह यह सोचता-करता है कि उसे खुद क्या करना है। वहीं दूसरी धारा है यूसुफी जैसे पत्रकारों की, जो केवल अपने पेट के लिए सब कुछ कर डालने पर आमादा है, जो उन्हें हर्गिज नहीं करना चाहिए। यूसुफी यह नहीं सोचता कि दूसरों के प्रति उसे क्या करना चाहिए, बल्कि वह तो केवल इस जुगत में लगा रहता है कि जैसे भी हो सके, उसका काम होता रहे ताकि उसके गले तक बिरयानी पहुंचती रहे।
अनिर्बान नाम का यह पात्र युवा पत्रकार अनिल यादव के पूर्वोत्तर भारत भ्रमण संस्मरण में मौजूद है। अनिल की किताब का नाम है: यह भी कोई देश है महराज। संस्मरण में मेघालय की एक घटना शामिल है जब आतंकवादियों-अलगावादियों की करतूत की खबर लिखने में अनिर्बान कोई कसर नहीं छोड़़ता। इसके लिए आतंकवादी इस पत्रकार पर जान-माल की धमकी देते हैं। लेकिन आतंकवादियों की धमकी पर बिना घबराये हुए, अनिर्बान न सिर्फ मेघालय में जमा रहता है, बल्कि असम में रह रही अपनी पत्नी और एक दुधमुही बच्ची को अपने साथ मेघालय ले जाता है। संदेश यह कि हम तो जूझेंगे ही, हर कीमत पर।
उधर उज्बेकिस्तान के लेखक शराफ रशीदोविच रशीदोव की महान कृति-उपन्यास में यूसुफी नामक एक पत्रकार का चरित्र है जो फर्जी खबर लिखने की कीमत, महज एक रकाबी भर स्वादिष्ट बिरयानी तक में से, वसूल लेने पर आमादा है। यह बिरयानी खाते समय उसकी टपक रही लार को वह अपने पूरे चेहरे पर मलने से भी गुरेज करता है। यह जानते हुए भी कि उसकी यह करतूत देश के आम किसानों और कामगारों पर कितनी भारी पड़ सकती है। तब सोवियत संघ मौजूद था और उज्बेकिस्तान उसका एक राज्य। इस उपन्यास का नाम है – तूफान झुका सकता नहीं।
तो अब नजर डाल लीजिए पत्रकारिता में मौजूद ऐसी ही दोनों धाराओं की हालत की। ऐसा हर्गिज नहीं कि अनिर्बान की धारा यूपी में लुप्त हो गयी है। बसपा की मायावी सरकार में अनिर्बान जैसा एक जांबाज पत्रकार पूरी ताकत के साथ हुकूमत के तोपों के खिलाफ कलम की ताकत पैना कर रहा था। नाम था प्रोफेसर निशीथ राय। डीएनए यानी डेली न्यूज एक्टिविस्ट नामक इस अखबार में छपे हर शब्द में संघर्ष चल रहा था, सत्ता की क्रूर और निरंकुश ताकत के खिलाफ। सत्ता के मद में चूर हाकिमों ने इस संघर्ष को कुचलने की हर चंद कोशिशें कीं। निशीथ राय का मकान कब्जाने के लिए सामान सरेआम पुलिस के दम पर खाली कराया गया। बिजली काट दी गयी। आय के स्रोत बंद कर दिये गये, साथी पत्रकारों को प्रताडि़त किया गया। लेकिन पत्रकार संघों जैसी दूकानों में पत्ता तक नहीं खड़का। दलाली में लिप्त पत्रकारों ने मायावती या उनके अफसर की किसी भी प्रेस कांफ्रेंस पर एक भी शब्द नहीं बोला। लेकिन अनिर्बान धारा के पत्रकारों का धर्मयुद्ध जारी रहा। लेकिन यूसुफी वाली धारा के पत्रकार केवल चर्बीदार बिरयानी से सने लार को अपनी जीभ पर लपलपाते रहे, चेहरे पर लार पोतते रहे। मगर बेशर्मी अख्तियार रखे इन पत्रकारों की सड़ांधती धुरी से अलग दूर अनिर्बान वाली धारा के पत्रकार बेशक चमकते-दमकते ही दीखते हैं।
लेकिन इस खींच-तान के बीच हैरतनाक बात तो यह है कि अनिर्बान की घटना हकीकत है जिसे अनिल यादव ने आंखोंदेखी बयान किया है। जबकि यूसुफी की कथा को शराफ रशीदोव ने अपनी कल्पना में रचा है। अब इस तथ्य को लखनऊ के पत्रकारिता में देखिये। आप पायेंगे कि अनिर्बान की धड़कन यहीं दूर-दूर तक नहीं सुनायी पड़ती है, जबकि यूसुफी की घृणित करतूतें यहां हर कदम पर गंधाती-उबकाई दिखेगी।
…जारी…
लेखक कुमार सौवीर लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार हैं. कई अखबारों व न्यूज चैनलों में महत्वपूर्ण पदों पर रहे हैं. इन दिनों आजाद पत्रकार के रूप में सक्रिय हैं. उनसे संपर्क 09415302520 के जरिए किया जा सकता है.
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