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लखनऊ के ‘वॉयस ऑफ मूवमेंट’ नामक अखबार से दो दर्जन पत्रकार निकाले गए

लखनऊ। यहां बात राजधानी के दो मझोले अखबारों कैनविज टाईम्स और वाईस ऑफ मूवमेन्ट की हो रही है. एक अखबार कैनविज ग्रुप का है तो दूसरा लखनऊ विजिलेंस मुख्यालय के एक इंस्पेक्टर का. कैनविज ग्रुप ने करीब डेढ़ वर्ष पूर्व अपने बिजनेस को मजबूत बनाने और सरकार से अपना हित साधने के उद्देश्य से कैनविज टाइम्स अखबार की शुरुआत की. इसकी जिम्मेदारी बतौर संपादक प्रभात रंजन दीन को दी गई. वाईस आफ मूवमेंट की कमान इंस्पेक्टर साहब के सुपुत्र प्रखर सिंह संभाल रहे हैं. 

लखनऊ। यहां बात राजधानी के दो मझोले अखबारों कैनविज टाईम्स और वाईस ऑफ मूवमेन्ट की हो रही है. एक अखबार कैनविज ग्रुप का है तो दूसरा लखनऊ विजिलेंस मुख्यालय के एक इंस्पेक्टर का. कैनविज ग्रुप ने करीब डेढ़ वर्ष पूर्व अपने बिजनेस को मजबूत बनाने और सरकार से अपना हित साधने के उद्देश्य से कैनविज टाइम्स अखबार की शुरुआत की. इसकी जिम्मेदारी बतौर संपादक प्रभात रंजन दीन को दी गई. वाईस आफ मूवमेंट की कमान इंस्पेक्टर साहब के सुपुत्र प्रखर सिंह संभाल रहे हैं. 

करीब आठ-दस रोज पूर्व कैनविज टाईम्स ने प्रभात रंजन दीन को अपने लिए निरर्थक मानते हुए उन्हें उनकी जिम्मेदारी से मुक्त कर दिया. कैनविज ग्रुप ने प्रभात रंजन दीन और उनकी पूरी टीम को करीब आठ-दस रोज पूर्व एक साथ पूरा बकाया वेतन देकर कार्यमुक्त कर दिया. कैनविज टाईम्स से मुक्त होते ही प्रभात रंजन अपनी पूरी टीम के साथ वाईस ऑफ मूवमेंट की ओर कूच कर गए. वाईस ऑफ मूवमेंट के जिम्मेदार भी कैनविज ग्रुप की भांति प्रभात रंजन के तथाकथित मशहूर नाम के छलावे में आकर गलतफहमी के शिकार हो गये. इन लोगों ने एक ही झटके में अपने उस पुरानी टीम के 23 कर्मचारियों के पेट पर लात मार दिये जिसने उसके बुरे समय में अपना खून पसीना बहाकर अखबार को शिखर पर पहुंचाया था.

सुनने में आ रहा है कि कर्मचारियों का तीन माह का वेतन बकाया है. अखबार की तरफ से कर्मचारियों को एक-एक माह का वेतन दिया गया है. शेष वेतन बाद में दिये जाने की बात सुनने में आ रही है. निकाले गये कर्मचारियों में एक तरफ जहां संस्थान के जिम्मेदारों के प्रति आक्रोश है तो वही दूसरी ओर प्रभात रंजन के प्रति भी आक्रोश व्याप्त है. कर्मचारियों का कहना है कि यदि संस्थान को निकालना ही था तो कम से कम एक माह पूर्व नोटिस देकर बकाया वेतन अदा कर दिया होता. वाईस आफ मूवमेंट से निकाले गये कर्मचारियों में एक कर्मचारी ऐसा भी है जो पत्रकारों के अधिकारों की बात करता है और पत्रकारों का लीडर भी है मगर जब खुद और अपने साथियों के अधिकारों की लड़ाई लड़ने की बात सामने आई तो चुप्पी साध चुके हैं.

पत्रकारों की इस दयनीय स्थिति को देखर मैं यही कहूंगा कि जो व्यक्ति अपने अधिकारों की लड़ाई स्वयं नहीं लड़ सकता है, वह भला दूसरों के अधिकारों की लड़ाई क्या खाक लड़ेगा.

लेखक विनीत राय लखनऊ स्थित युवा पत्रकार हैं. उनसे संपर्क 09451907315 के जरिए किया जा सकता है.

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