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लखनऊ में इन्हें पत्रकार नहीं, लैमार कहकर बुलाया जाता है

कुछ दिन पूर्व मैं एक न्यूजपेपर छापने वाले प्रिटिंग प्रेस में बैठा था कि तभी कुछ युवक अंदर आये. उनके चेहरे एवं कपड़ों को देख कर आप उन्हें शोहदों (महिलाओ एंव लडकियों पर छींटा कसी व छेड़- छाड़ करने वाले) की श्रेणी में कह सकते हैं। कछ समय बाद जैसे ही उन्होंने बोलना शुरू किया, तो मैं अवाक रह गया। इतनी गंदी भाषा मैंने अपने जीवन में नहीं सुनी। मेरे मुंह से तुरंत निकला कि आप लोग करते क्या हैं? वो बोले कि हम पत्रकार हैं। मैं यह सुन कर पत्रकारिता एवं पत्रकार के इस बदल रहे रूप को देख कर अचंभित रह गया और अनायास ही मस्तिष्क में ये प्रश्न आया कि क्या ये है आज की पत्रकारिता और भावी पत्रकार?

कुछ दिन पूर्व मैं एक न्यूजपेपर छापने वाले प्रिटिंग प्रेस में बैठा था कि तभी कुछ युवक अंदर आये. उनके चेहरे एवं कपड़ों को देख कर आप उन्हें शोहदों (महिलाओ एंव लडकियों पर छींटा कसी व छेड़- छाड़ करने वाले) की श्रेणी में कह सकते हैं। कछ समय बाद जैसे ही उन्होंने बोलना शुरू किया, तो मैं अवाक रह गया। इतनी गंदी भाषा मैंने अपने जीवन में नहीं सुनी। मेरे मुंह से तुरंत निकला कि आप लोग करते क्या हैं? वो बोले कि हम पत्रकार हैं। मैं यह सुन कर पत्रकारिता एवं पत्रकार के इस बदल रहे रूप को देख कर अचंभित रह गया और अनायास ही मस्तिष्क में ये प्रश्न आया कि क्या ये है आज की पत्रकारिता और भावी पत्रकार?

मेरे न चाहने के बाद भी अनायास एक प्रश्न मेरे मुंह से निकल पड़ा जो शायद उनके संपादक की सोच और गरिमा पर प्रश्न चिन्ह लगा रही था कि आपके संपादक कौन हैं और इस पत्र में आप कितने दिनों से कार्य कर रहे हैं? उनका जवाब था कि दो वर्षों से तथा संपादक श्री….. हैं. (संपादक पद की गरिमा को देखते हुये मैं उनका नाम उजागर नहीं कर रहा हूं) नवयुवक पत्रकार एवं मेरी बातचीत के कुछ अंश लेकिन उन सज्जन को ये नहीं मालूम है कि मैं कौन हूं…

मैं- आपने पत्रकारिता की कोई डिर्ग्री या डिप्लोमा लिया है्?

नवयुवक- नहीं।

मैं- आपने कोई कोर्स नहीं किया है्, तो आप खबर कैसे लिखते हो ?

नवयुवक- इंटरनेट है ना, लिखने की क्या जरूरत है कापी पेस्ट करो।

कुछ समय बाद उनकी आपस की बातचीत से पता चला कि ये खबरों के नहीं, दलाली के पत्रकार हैं और लखनऊ के अधिकांश पुलिस वाले इन्हें लैमार के नाम से बुलाते हैं। इन सब बातों को सुन कर कुछ और जानने की चाहत ने मुझे इन महोदय के कार्यालय में जाने की अपनी इच्छा को रोक नहीं पाया। मैं सीधे उनके कार्यालय गया तो वहां एक महिला ने हमे बताया कि “सर” अभी नहीं आये हैं। मैंने उस महिला से कहा कि मुझे पत्रकार बनना है, तो वो तपाक से बोली कि आप को 1100 रु जमा करने होंगे, आई कार्ड के लिये। मैं यह सुन कर स्तब्ध रह गया। तभी दूसरा प्रश्न मेरी तरफ फेंका गया कि आप फील्ड से कितना पैसा कम्पनी को दे देंगे? मैंने कहा कि मैं विज्ञापन नहीं दे सकता तो वो तपाक से बाली कि मैं विज्ञापन की नहीं, वसूली की बात कर रही हूं। इतना सुनते ही मैंने वहां से निकलना बेहतर समझा, क्योंकि पत्रकारिता और पत्रकारों का इतना गिरता हुआ स्तर मैंने आज तक नहीं देखा था।

इस घटना से मुझे कुछ दिन पूर्व एक केन्द्रीय मंत्री एवं न्यूज चैनल के बीच हुई स्टिंग आपरेशन की याद आ गयी कि क्या फर्क है इस समाचार पत्र में और उस न्यूज चैनल में। दोनों ही अपना कार्य कर रहे हैं, कोई छोटे स्तर पर और कोई बडे़ स्तर पर। क्या आज की पत्रकारिता और पत्रकार का स्तर यही है? या हम जैसे पत्रकार अब आउट डेटेड हो चुके हैं जिन्हें अपनी और अपने समाचार पत्र की छवि की ज्यादा चिन्ता रहती है।

अखिलेश चन्द्रा

पत्रकार, लखनऊ

CMD & Editor in chief

Vision 24 News

Weekly News Paper & Internet based News channel.

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