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लखनऊ में पत्रकार राजनीति फिर गरम, धड़ेबाजी शुरू

लखनऊ : राज्य मान्यता प्राप्त पत्रकार समिति के चुनाव को लेकर पत्रकारो में धड़ेबाजी फिर शुरू हो गई हैं. आज से बाकायदा इसका श्रीगनेश हो गया. चुनाव की तारीख को लेकर बुलाई गई बैठक पत्रकारों की एकता और आदर्श बातों से शुरू हुई और भड़ास की खबरों पर जाकर खत्म हो गई. एक खेमा जल्दी से जल्दी चुनाव चाहता था तो दूसरा इसे विधानसभा चुनाव के बाद करवाना चाहता था. चुनाव की तारीख तो तय ना हो सकी मगर चुनाव अधिकारी जरूर तय हो गए. अब सारा दामोदार विधानसभा चुनाव की तारीख पर टिका हैं. अगर चुनाव अगले हफ्ते तक घोषित हो गए तो पत्रकारों की समिति के चुनाव टाल दिए जायेंगे वरना 19 जनवरी को यह चुनाव हो जायेंगे.

लखनऊ : राज्य मान्यता प्राप्त पत्रकार समिति के चुनाव को लेकर पत्रकारो में धड़ेबाजी फिर शुरू हो गई हैं. आज से बाकायदा इसका श्रीगनेश हो गया. चुनाव की तारीख को लेकर बुलाई गई बैठक पत्रकारों की एकता और आदर्श बातों से शुरू हुई और भड़ास की खबरों पर जाकर खत्म हो गई. एक खेमा जल्दी से जल्दी चुनाव चाहता था तो दूसरा इसे विधानसभा चुनाव के बाद करवाना चाहता था. चुनाव की तारीख तो तय ना हो सकी मगर चुनाव अधिकारी जरूर तय हो गए. अब सारा दामोदार विधानसभा चुनाव की तारीख पर टिका हैं. अगर चुनाव अगले हफ्ते तक घोषित हो गए तो पत्रकारों की समिति के चुनाव टाल दिए जायेंगे वरना 19 जनवरी को यह चुनाव हो जायेंगे.

दरसअल मौजदा समिति का गठन ही विवादों के बीच हुआ था. पिछले चुनाव में उन 11 पत्रकारों को वोट नहीं डालने दिया गया था जिनकी मान्यता चुनाव से कुछ समय पहले ही हुई थी. इन पत्रकारों ने इसकी शिकायत प्रमुख सचिव सूचना से की थी. सरकार चाहती ही थी कि इस तरह की कोई शिकायत आये लिहाजा उसने इस कमेटी के अस्तित्व को ही मानने से इनकार कर दिया. हालात इतने बदतर हो गए कि एनेक्सी से इस समिति के पदाधिकारियों के बोर्ड और फोटो तक हटा दिए गए और अफसरों की चमचागिरी में लगे समिति के पदाधिकारी इसका विरोध भी नहीं कर पाए.

इसके बाद तो अफसर लगातार बदतमीजी करते रहे और खुद को वरिष्ठ कहने वाले पत्रकार पंचम तल के अफसरों की चरण वंदना में लगे रहे. इन सब बातों के बीच समिति के पदाधिकारियों के बीच ही आपसी मतभेद की खबरें जब आम हो गई तो समिति के लोगों ने किसी और फजीहत से बचने के लिए चुनाव कराने का निर्णय किया. आज विधान सभा के प्रेस रूम में मान्यता समिति के अध्यक्ष हिसाम सिद्दीकी ने दोपहर तीन बजे बैठक बुलाई. पहले कार्यकारणी की बैठक शुरू हुई और उसके बाद सामान्य बैठक.

अध्यक्ष सिद्दीकी ने कहा की वह निर्धारित समय में ही चुनाव कराना चाहते हैं. इसके लिए उनकी कार्यकारणी ने चुनाव अधिकारी के रूप में अजय कुमार, गोलेश स्वामी और अम्बरीश कुमार के नाम तय किये हैं. पीटीआई के अभिषेक कुमार ने कहा कि हमेशा बुजुर्ग पत्रकारों को ही इसकी कमान दी जाती है, कुछ नौजवान पत्रकारों को भी मौका दिया जाना चहिए. इसके बाद सर्वेश कुमार का नाम और जोड़ा गया, साथ ही तय किया गया कि हाल ही में सूचना आयुक्त के पद से अवकाश प्राप्त पत्रकार ज्ञानेंद्र शर्मा और वीरेंद्र सक्सेना विशेष पर्यवेक्षक के रूप में मौजूद रहेंगे.

इसके बाद चुनाव की तारीख को लेकर विवाद शुरू हुआ. रामदत्त त्रिपाठी, मनमोहन समेत कुछ लोगों ने इसका विरोध किया कि चुनाव जनवरी में कराये जायें. इनका तर्क था कि विधानसभा चुनाव के कारण सभी लोग व्यस्त होगे. मगर सिद्धार्थ कलहंस, प्रमोद गोस्वामी, मक़सूद, संजय शर्मा आदि ने सुझाव दिया कि चुनाव की तारीख तय कर दी जाये और अगर विधान सभा के चुनाव घोषित हो जाते हैं तो इन तारीखों को आगे बढ़ा दिया जाये. थोड़े विवादों के बाद इसे मान लिया गया. चुनाव को लेकर थोड़े विवाद और भी सामने आते रहे.

इसके बाद हिसाम सिद्दिकी ने अपनी बात कहते हुए पिछले चुनाव के बहाने पिछली समिति और कुछ पत्रकारों के आचरण पर बिना उनका नाम लिए हमला किया और कहा कि ऐसे पत्रकारों के कारण अफसरों कि इतनी हिम्मत हो गई कि वो पत्रकारों से अभद्रता करने लगे. ऐसा इसलिए हुआ कि हमारे झगड़े उन तक पहुंचने लगे. साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि अगर चुनाव में कोई शराब पीकर  आये या अभद्रता करे तो उसे वोट ना डालने दिया जाये. प्रमोद गोस्वामी ने इस पर आपत्ति जताई कि पिछली समिति कि बातों को इस तरह उठाया जा रहा है जबकि उसमें गलती सबकी थी.

सिद्दिकी  ने अपना प्रवचन खत्म किया ही था कि वीक एंड टाइम्स के संपादक संजय शर्मा ने उनके दावों की हवा निकाल दी. संजय ने हिसाम सिद्दीकी से कहा कि यह 21 लोगों की कमेटी सभी पत्रकारों का नेतृत्व करती है. पिछले दिनों कमेटी के अध्यक्ष के रूप में आपने समिति के ही शरद प्रधान और मुदित माथुर को जिस तरह मेल लिखे और उन्होंने जिस तरह जवाब दिया, क्या उससे सब पत्रकारों की इज्जत खत्म नहीं हुई. अगर समिति के पदाधिकारियों में ही झगड़ा था तो इसे मिल कर सुलझाना चहिए था.

कुछ पत्रकारों ने कहा कि भड़ास पर यह मेल आ जाने से बहुत बदनामी हुई. शरद प्रधान ने सबके सामने कहा कि संजय ने बहुत सही  सवाल उठाया है. इसके बाद नैतिकता की दुहाई दे रहे सभी लोग इस बात पर राजी हुए कि समिति के लोगों के बीच इस तरह के विवाद  नहीं होने चाहिए. स्पुतनिक के अरविन्द शुक्ल ने कहा कि पत्रकारों की समस्याओं को उठाने के लिए भी एक मंच होना चहिए  तो सबने सूचना विभाग की इस बात की कड़ी आलोचना की कि ज्ञानेंद्र शर्मा जैसे  वरिष्ठ पत्रकारों को भी विभाग मान्यता नहीं दे रहा है.

लखनऊ से एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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