लहर उठाना पोंटी चड्ढा का जुनून है. शायद इसीलिए कुछ समय पहले जब दिल्ली से एक न्यूज चैनल लांच हुआ तो उसने भी अपने टैगलाइन लिखी कि लहर तो उठेगी. बताते हैं कि लहर उठानेवाले इस चैनल में भी पोंटी चड्ढा का पैसा लगा हुआ था. लेकिन ऐसा नहीं है कि केवल चैनल ही लहर उठा रहा था. शायद यह चैनल में पोंटी चड्ढा का इफेक्ट था कि चैनल भी लहर उठाने से अपने आपको रोक नहीं पाया. वैसे भी पोंटी चड्ढा एक लहर का ही नाम है. उसे लहरों से लगाव भी है शायद इसीलिए उसकी कंपनियों की मदर कंपनी वेव इंक है. आज जिस पोंटी चड्ढा को हम सुनामी के रूप में देख रहे हैं, पिछले एक दशक से उसका पचरम चारों ओर लहरा रहा है. क्या पंजाब, क्या उत्तर प्रदेश और क्या उत्तराखण्ड. पोंटी का परचम चारों तरफ है.
पोंटी ने अपनी जिंदगी में जो कुछ किया है वह डंके की चोट पर किया है. उसने दिल्ली से दुबई तक अपना साम्राज्य स्थापित कर लिया है. जो लोग आज उसे मायावती का करीबी बता रहे हैं उन्हें यह भी जान लेना चाहिए कि वह कल्याण सिंह का भी करीबी रहा है और कलराज मिश्र का भी. वह प्रकाश सिंह बादल का भी करीबी है तो कैप्टन अमरिन्दर सिंह भी उसकी बेटी की शादी में आने से अपने आपको रोक नहीं पाते हैं. उत्तर प्रदेश में अगर मुलायम सिंह ने उसे पहला ब्रेक दिया तो उत्तराखण्ड में रमेश पोखरियाल निशंक ने उसके लिए उत्तराखण्ड में लाल कालीन ही बिछा दिया था. भूपिन्दर सिंह हुड्डा तो उस पर मेहरबान हैं ही.
पिछले दो दशक में उत्तर के अधिकांश राज्यों में मुख्यमंत्री कोई भी रहा हो, पोंटी हर मुख्यमंत्री का खास रहा है. उसने राजनीतिक दोस्ती के जरिए जो व्यापार खड़ा किया उसमें नियम और नैतिकता का कोई मतलब नहीं रखा है. वैसे भी साम्राज्य नैतिकता की नींव पर नहीं खड़े किये जाते. पहले साम्राज्य स्थापित करने के लिए जो तलवारें इस्तेमाल की जातीं थी उनकी जगह आज के लोकतांत्रिक राज समाज में संपर्कों की तलवार चलाई जाती है. इसलिए अगर चड्ढा के खरबपति होने में अगर नैतिकता के कुछ नियमों को नेताओं के तलघर में दबा दिये गये तो इसमें कोई हैरानी नहीं है. आर्थिक रूप से उदार भारत में जितने विशाल आर्थिक साम्राज्य खड़े किये हैं अगर उनकी नींव खोदी जाए तो हर जगह कुछ नियम कानून दबे हुए मिल जाएंगे. यह अलग बात है कि राजनीतिक संपर्कों की सीढ़िया चढ़कर अरबों-खरबों कमानेवाले पोंटी चड्ढा को व्यापारिक समाज ने कभी उस रूप में नहीं देखा जैसे गुलाबी अखबार बताया करते हैं. पोंटी चड्ढा का नाम कभी देश के अरबपतियों की लिस्ट में नहीं छपा और न ही उसके ऊपर किसी प्रबंध स्कूल के छात्र ने कोई शोध प्रबंध लिखने की कोशिश की. लेकिन पोंटी के कारोबार का तरीका ऐसा रहा है जिसे जानने की जरूरत है.
पोंटी का परिवार बंटवारे के बाद पाकिस्तान से भारत आया था. पोंटी के पिता पहले अमृतसर में रुके फिर वहां से रामनगर होते हुए मुरादाबाद में आकर बस गये. यहीं उन्होंने गन्ना पेराई की एक मशीन लगाई. इसके बाद पोंटी के पिता ने ही पहली बार शराब कारोबार में कदम रखा जिसे पोंटी ने साम्राज्य में तब्दील कर दिया. नब्बे के दशक में पंजाब के शराब कारोबार में घुसने से पहले पोंटी ने पंजाब में राजू नरूला के साथ मिलकर फिल्म वितरण का कारोबार शुरू किया. नरूला ने ही पोंटी की मुलाकात पंजाब में अकाली दल के नेताओं से करवाई जिसके बाद उसने कभी पीछे मुडकर नहीं देखा. अकालियों की सरकार गई और कैप्टन अमरिन्दर मुख्यमंत्री बने तो वह कैप्टन का भी करीबी हो गया शराब की फैक्ट्रियों से लेकर शापिंग माल्स तक सब खड़ा कर दिया.
जो लोग दशकों से शराब का कारोबार कर रहे थे उनका आरोप है कि जब से पोंटी शराब के कारोबार में आया है वे इस कारोबार से बाहर हो गये हैं. पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और यहां तक कि बिहार और झारखण्ड जैसे राज्यों में पोंटी का शराब सिंडिकेट काम करता है. लेकिन पोंटी ने सिर्फ शराब के कारोबार पर ही अपना अधिपत्य नहीं जमाया. पोंटी ने जब फिल्म वितरण के कारोबार में कदम रखा तो उत्तर भारत के जमे जमाये लोगों को किनारे कर दिया. अभी बालीवुड की जिस फिल्म ने रिलीज के साथ कमाई के सारे रिकार्ड तोड़ दिये उस अग्निपथ का वितरण अधिकार भी पोंटी चड्ढा की कंपनी के पास ही है. इसी तरह रियल एस्टेट के जमे जमाये कारोबारियों को भी पोंटी से ईष्या है, क्योंकि पोंटी जब जमीन के कारोबार में उतरा तो कई पुराने कारोबारियों को जमींदोज कर दिया. नोएडा सिटी सेन्टर की सबसे बड़ी जमीन का सौदा पोंटी चड्ढा की कंपनी वेब इन्फ्राटेक ने किया. 405 एकड़ जमीन उसने 6,570 करोड़ रुपये में खरीदी जिसके लिए उसने 350 करोड़ की स्टैंम्प ड्यूटी जमा करवाई. आज उसके पास इतनी जमीन है कि वह एक नया गाजियाबाद बसा सकता है.
गाजियाबाद डेवलमेन्ट अथारिटी ने पिछले 35 सालों में अपने लिए जितनी जमीन नहीं जुटाई होगी उससे ज्यादा जमीन पोंटी चड्ढा की कंपनी के पास है. बताते हैं कि पोंटी करीब दस हजार एकड़ जमीन का मालिक हैं, जबकि गाजियाबाद डेवलमेन्ट अथारिटी के पास चार हजार एकड़ जमीन ही है. पोंटी की ये जमीनें गाजियाबाद, नोएडा, ग्रेटर नोएडा, दिल्ली, लखनऊ, जयपुर के अलावा पंजाब और उत्तराखण्ड तक फैली हुई है. मल्टीप्लेक्स और माल के कारोबार में खैर उसने कइयों को पीछे छोड़ ही दिया है. यह सब करते हुए उसने अपना पुश्तैनी धंधा भी नहीं छोड़ा जो कि गन्ना पेराई से जुड़ा हुआ था. वह जब गन्ने के कारोबार में उतरा तो उत्तर प्रदेश में चीनी मिलों का सबसे चर्चित घोटाला सामने आ गया. जो चीनी मिलें ढाई हजार करोड़ कीमत वाली थीं उसे ढाई सौ करोड़ रुपये में उसने हासिल कर लिया. इसी तरह गोल्ड के कारोबार में भी पोंटी की पौ बारह है.
पिछले पांच सालों में पोंटी चड्ढा का कारोबार राकेट की गति से आगे बढ़ा है. 2007 में जब उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री मायावती ने शपथ ली तब से लेकर अब तक उत्तर प्रदेश में पोंटी चड्ढा ने जो चाहा वह पाया है. यह मायावती ही हैं जिन्होंने पोंटी को पूरे प्रदेश का शराब कारोबार सौंप दिया. इससे पहले प्रदेश में शराब कारोबार के ठेके कई व्यापारियों को दिये जाते थे लेकिन मायावती ने अकेले पोंटी चड्ढा को सारा ठेका दे दिया. इसके बाद पोंटी ने अपना सिंडिकेट बनाकर मनमानी कमाई की है. बताते हैं कि इस कारोबार से पोंटी ने मायावती के करीबी मंत्री नसीमुद्दीन के साथ मिलकर ढाई लाख करोड़ रुपये कमाये हैं.
दिल्ली से लेकर दुबई तक अपनी पहुंच कायम करनेवाले पोंटी के लिए कहा नहीं जा सकता कि उसका अगला मुकाम क्या होगा. वह दुबई के अपने शानदार विला या दिल्ली के आलीशान फार्म हाउस में ही पाया जाएगा या फिर उसका अगला मुकाम तिहाड़ जेल होगी. वह कहीं भी रहे, उसके साम्राज्य पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा क्योंकि 58 साल के पोंटी ने जो साम्राज्य खड़ा किया है उसे संभालने के लिए उसकी अगली पीढ़ी तैयार हो चुकी है.
लेखक अजीत द्विवेदी नया इंडिया अखबार के कार्यकारी संपादक हैं. उनका यह लिखा उनके अखबार साभार लेकर प्रकाशित किया गया है.






