Connect with us

Hi, what are you looking for?

No. 1 Indian Media News PortalNo. 1 Indian Media News Portal
Local News Community

बिहार

लालू यादव को मिली सजा तो तमाम ‘दागी’ राजनेताओं को सताने लगा है डर!

चारा घोटाले का बहुप्रतीक्षित फैसला आ गया है। दिग्गज राजनेता लालू यादव सहित 37 आरोपियों की सजा मुकर्रर कर दी गई है। इस घोटाले में चार साल की सजा तो पूर्व मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र को भी मिली है। वे भी लालू के साथ रांची की बिरसा मुंडा जेल में बंद हैं। लेकिन, बुजुर्ग हो चले 76 वर्षीय जगन्नाथ मिश्र की राजनीति सालों पहले ही हाशिए पर पहुंच चुकी है। ऐसे में, उनकी सजा को लेकर ज्यादा कोहराम नहीं मच रहा है। जबकि, चारा घोटाले की चर्चा का फोकस राष्ट्रीय जनता दल (राजद) प्रमुख लालू प्रसाद यादव पर ही ज्यादा रहता है।

चारा घोटाले का बहुप्रतीक्षित फैसला आ गया है। दिग्गज राजनेता लालू यादव सहित 37 आरोपियों की सजा मुकर्रर कर दी गई है। इस घोटाले में चार साल की सजा तो पूर्व मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र को भी मिली है। वे भी लालू के साथ रांची की बिरसा मुंडा जेल में बंद हैं। लेकिन, बुजुर्ग हो चले 76 वर्षीय जगन्नाथ मिश्र की राजनीति सालों पहले ही हाशिए पर पहुंच चुकी है। ऐसे में, उनकी सजा को लेकर ज्यादा कोहराम नहीं मच रहा है। जबकि, चारा घोटाले की चर्चा का फोकस राष्ट्रीय जनता दल (राजद) प्रमुख लालू प्रसाद यादव पर ही ज्यादा रहता है।

उन्हें रांची की विशेष अदालत ने पांच साल की सजा सुनाई है और उन पर 25 लाख रुपए का जुर्माना भी ठोका है। इसी मामले में जनता दल (यू) के सांसद जगदीश शर्मा भी फंस गए हैं। उन्हें चार साल की सजा मिली है और पांच लाख रुपए का जुर्माना हुआ है। सजा पाने वालों में कई बड़े पदों पर रहने वाले नौकरशाह भी हैं। 1990 के दौर में करीब 950 करोड़ रुपए का चारा घोटाला हुआ था। इस घोटाले का सिलसिला जगन्नाथ मिश्र के राज से शुरू हुआ था। लालू के राज में तो जमकर बंदरबांट हुई थी।

राजनेताओं के खिलाफ भी अब न्यायिक शिकंजा कसने लगा है। पहले यही आम धारणा बनती थी कि बड़े नेता कितनी भी मनमानी करें, लेकिन वे कानूनी फंदे में नहीं फंसते। लेकिन, अब परिदृश्य तेजी से बदलने लगा है। बहुचर्चित 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में पूर्व केंद्रीय संचार मंत्री ए. राजा लंबे समय तक तिहाड़ जेल की रोटियां तोड़ने के लिए मजबूर रहे हैं। तमिलनाडु के दिग्गज नेता एवं द्रमुक सुप्रीमो एम. करुणानिधि की सांसद बेटी कानिमोझी भी इसी घोटाले में महीनों तिहाड़ जेल की हवा खाती रही हैं। यह मामला अदालत में लंबित है। दोनों आरोपियों पर अरबों रुपए का खेल करने का आरोप है। कांग्रेसी सांसद सुरेश कलमाड़ी का एक दौर में खासा राजनीतिक रुतबा हुआ करता था। पार्टी और सरकार में उनकी पहुंच काफी ऊपर तक थी। 2010 में दिल्ली में राष्ट्रमंडल खेलों का आयोजन हुआ था। भारतीय ओलंपिक संघ के प्रमुख होने के नाते राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन में इनकी खास भूमिका थी। आरोप लगे कि तैयारी के नाम पर कलमाड़ी एंड कंपनी ने अरबों रुपए का घोटाला करा लिया।

इस घोटाले को लेकर देश के अंदर और बाहर सरकार और कांग्रेस की लंबे समय तक किरकिरी होती रही थी। आयोजन के नाम पर कई तरह से लूट की साजिश रची गई थी। जब सीबीआई ने पड़ताल शुरू की, तो खुलासा होने लगा कि कैसे कलमाड़ी और उनकी टोली ने अपनी राजनीतिक हनक के चलते इतना बड़ा फर्जीवाड़ा कर डाला था? कलमाड़ी लंबे समय तक तिहाड़ में रहे हैं। राजनीति से लेकर खेल की दुनिया में उनकी छवि खलनायक वाली बन गई है। लेकिन, कलमाड़ी जैसे नेताओं को कभी शर्मसार होते नहीं देखा गया। मौका मिलने पर वे संसद के सेंट्रल हॉल में ठहाका लगाने से बाज नहीं आते। भाव कुछ इस तरह का रहता है कि जैसे वे कानूनी शिकंजे से बच निकलेंगे। आम तौर पर जब राजनेता घोटालों-घपलों में घिर जाते हैं, तो बड़े आराम से कह देते हैं कि उनके खिलाफ तो राजनीतिक साजिश रची गई है। इस दौर में लालू और उनकी पूरी पार्टी इसी तरह के आरोप लगा रही है।

66 वर्षीय लालू यादव लंबे समय से बिहार की राजनीति में मुख्य किरदार की भूमिका में रहे हैं। 15 साल तक लगातार उन्होंने बिहार में राज किया है। 2004 में वे मनमोहन सरकार में रेलमंत्री बने थे। रेलमंत्री के रूप में लालू ने लोकप्रिय होने के तमाम राजनीतिक प्रयोग कर डाले थे। दावा किया गया था कि सालों से घाटे में चल रही रेल को मंत्री जी ने हजारों करोड़ रुपए के राजस्व से मालामाल कर दिया है। वह भी यात्री और मालभाड़ा बढ़ाए बगैर। सालों तक लालू के इस करिश्मे की चर्चा चलती रही थी। यहां तक कि लालू के ‘चमत्कारी’ फैसलों की धमक लंदन और न्यूयॉर्क तक पहुंच गई थी। दुनिया की जानी-मानी हार्वर्ड यूनिवर्सिटी ने मैनेजमेंट के छात्रों के बीच उनका   लेक्चर भी कराया था। लालू ने अपनी ठेठ गंवई शैली में हार्वर्ड के छात्रों को अपना ‘दिव्य ज्ञान’ भी दिया था।

जब चारों तरफ लालू यादव के राजनीतिक कौशल की सराहना हो रही थी, तो बिहार में यह सवाल जरूर उठ रहा था कि यदि वे इतने कौशल वाले प्रशासक हैं, तो फिर लालू-राबड़ी के 15 साल के राज में बिहार का बेड़ा इतना क्यों गर्क हुआ है? इसका तार्किक जवाब लालू और उनके सिपहसालार कभी नहीं दे पाए। उल्लेखनीय है कि राजद के शासन में बिहार में चौतरफा बदहाली का दौर रहा है। लालू-राबड़ी की सत्ता के बाद जब नीतीश कुमार का शासन आया, तो बिहार में बदलाव की बयार चली है। इसी के चलते पिछले कई सालों से लालू का राजनीतिक करिश्मा उतार पर रहा है। इतना जरूर रहा कि 2004 के लोकसभा चुनाव में उन्हें काफी सफलता मिल गई थी। इसके चलते केंद्र सरकार में उनकी मजबूत भागीदारी का हिसाब-किताब बन गया था। लेकिन, 2009 के लोकसभा चुनाव में उनकी स्थिति पतली हो गई। राज्य की सत्ता 2005 में ही खिसक गई थी। जबकि, यूपीए की दूसरी पारी में उन्हें मंत्री बनने की मौका नहीं मिला। लोकसभा चुनाव में उनकी पार्टी को महज 4 सीटें ही मिल पाई थीं।

दरअसल, बिहार की राजनीति में लंबे समय तक जदयू और भाजपा का चुनावी गठबंधन मजबूत स्थिति में रहा है। इसी गठबंधन की राजनीति ने राजद की सरकार उखाड़ कर फेंकी थी। यह अलग बात है कि नरेंद्र मोदी के बहुचर्चित मुद्दे पर अब जदयू और भाजपा का चुनावी गठबंधन 17 साल बाद टूट चुका है। यह फैसला जून में हुआ था। इस राजनीतिक बदलाव से लालू को उम्मीद बंधने लगी थी कि अब एक बार फिर प्रदेश की राजनीति में उनके दिन बहुरेंगे। लोकसभा के एक महत्वपूर्ण उपचुनाव में उनकी पार्टी के उम्मीदवार के तौर पर प्रभुनाथ सिंह को धमाकेदार जीत भी मिली थी। जदयू की राजनीति को यह पहला बड़ा झटका माना गया था। इसी के बाद लालू ने कहना शुरू किया था कि 2014 के लोकसभा चुनाव में राजद और लोजपा के गठबंधन को 40 में से 25 सीटें मिल जाएंगी। बिहार को फिर से जीत लेने के मंसूबे बना रहे लालू को चारा घोटाले के मामले ने एकदम ध्वस्त कर दिया है।

सर्वोच्च न्यायालय के नए नियमन की वजह से लालू की सांसदी भी छिन रही है। इसकी प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। उल्लेखनीय है कि 10 जुलाई को सर्वोच्च न्यायालय ने दागी नेताओं के संदर्भ में एक ऐतिहासिक फैसला दिया था। इसके तहत उस कानूनी प्रावधान को असंवैधानिक करार कर दिया गया, जिसके चलते ‘माननीय’ अपील के बहाने अपनी कुर्सी बचा लेते थे। हालांकि, सरकार ने न्यायालय के फैसले को पलटने के लिए कानून में संशोधन की तैयारी की थी। इसके लिए मानसून सत्र में एक विधेयक भी तैयार किया गया था। लेकिन, संसद के दोनों सदनों से इसे मंजूरी नहीं मिल पाई थी। ऐसे में, लालू जैसे नेताओं पर आ रहे खतरे को देखते हुए सरकार 24 सितंबर को एक चर्चित अध्यादेश लाई थी। इस पर राष्ट्रपति की मुहर लग पाती, इसके पहले ही तमाम राजनीतिक कोहराम मच गया। कांग्रेस के राहुल गांधी ने जब इस पर ‘वीटो’ लगा दिया, तो सरकार ने भारी फजीहत कराने के बाद इसे वापस लेने का फैसला कर डाला है। इस तरह से लालू जैसे सजा पाए ‘माननीयों’ की मुसीबत और बढ़ गई है। क्योंकि, दो साल से ज्यादा की सजा मिलते ही सांसदी या विधायकी तुरंत प्रभाव से छिन जाने का प्रावधान जो हो गया है। ऐसे में, अब लालू और जगन्नाथ मिश्र जैसे दिग्गजों को भी जेल में सामान्य कैदियों की तरह रहने के लिए मजबूर होना पड़ेगा।

नए कानूनी प्रावधान के तहत सजा प्राप्त लोगों को छह साल तक चुनाव लड़ने के अयोग्य भी माना जाएगा। इस हिसाब से लालू यादव को 11 साल का ‘राजनीतिक वनवास’ झेलना पड़ सकता है। इस अवधि तक तो लालू 77 के हो चलेंगे। इसीलिए कयास ये भी हैं कि कहीं चारा घोटाला की सजा लालू जैसे चर्चित नेता का पूरा राजनीतिक कैरियर ही चौपट न कर दे? हालांकि, उनकी पत्नी एवं पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी का विश्वास यही है कि वे जेल से बाहर आएंगे, तो जनता के बीच और पॉपुलर हो जाएंगे। क्योंकि, बिहार की जनता जान गई है कि लालू जी को जदयू और भाजपा वालों ने फंसा दिया है। राजद में प्रमुख हैसियत में रहने वाले सांसद रघुवंश प्रसाद का मानना है कि हाईकोर्ट में अपील के बाद जरूर राहत मिलेगी। लालू जी बेल पर बाहर आएंगे और फिर राजद की राजनीतिक रफ्तार तेज हो जाएगी।

लालू की तरह एक दौर में बिहार की राजनीति में जगन्नाथ मिश्र का भी दबदबा था। वे राज्य के तीन बार मुख्यमंत्री रह चुके हैं। उन्होंने अपना कैरियर अर्थशास्त्र के प्राध्यापक के रूप में शुरू किया था। लेकिन, लालू और नीतीश कुमार जैसे नेताओं के उदय के बाद उनकी राजनीति का सूरज अस्त होता चला गया। वे कांग्रेस से एनसीपी में चले गए थे। अब वे जदयू की राजनीति से जुड़ गए हैं। नीतीश की सरकार में उनका एक बेटा भी मंत्री है। लेकिन, अब तो लालू जैसे नेताओं की तरह से मिश्र को सहानुभूति का ज्यादा लाभ भी मिलता नहीं दिख रहा। आपराधिक मामलों में अब मंत्रीगण भी फंसते हैं, तो उनकी शामत आने का सिलसिला शुरू हो गया है।

राजस्थान सरकार में रुतबेदार मंत्री रहे महिपाल सिंह मदेरणा बहुचर्चित भंवरी देवी मामले में ऐसा फंसे कि उन्हें लंबे समय तक जेल में रहना पड़ा। उनका कोई रुतबा काम नहीं आया। हाल में राजस्थान सरकार के एक मंत्री बाबू लाल नागर भी बलात्कार के मामले में फंस गए हैं। उनकी कुर्सी चली गई है। उनसे पुलिसिया पूछताछ होने लगी है। किसी भी समय उन्हें जेल की हवा खानी पड़ सकती है। मध्यप्रदेश सरकार में वित्तमंत्री रहे बुजुर्ग नेता राघव जी भी अपने सहायक के साथ कुकृत्य के मामले में कुर्सी गंवा चुके हैं। वे लंबे समय तक जेल में रहे हैं। उनका राजनीतिक रुतबा किसी काम नहीं आया। अब चारा घोटाले में लालू और जगन्नाथ मिश्र जैसे दिग्गज कड़ी सजा भुगतने के लिए मजबूर हैं। ऐसे में, अब तमाम राजनेता सहम गए हैं। उन्हें लगने लगा है कि अब नया दौर शुरू हो गया है। कानून को ठेंगा दिखाया, तो किसी की भी गति लालू जैसी होते देर नहीं लगेगी।

लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है।

Pahad Ki Dada: Hill Mail Uttarakhand
CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

… अपनी भड़ास [email protected] पर मेल करें … भड़ास को चंदा देकर इसके संचालन में मदद करने के लिए यहां पढ़ें-  Donate Bhadasमोबाइल पर भड़ासी खबरें पाने के लिए प्ले स्टोर से Telegram एप्प इंस्टाल करने के बाद यहां क्लिक करें : https://t.me/BhadasMedia 

Advertisement

You May Also Like

विविध

Arvind Kumar Singh : सुल्ताना डाकू…बीती सदी के शुरूआती सालों का देश का सबसे खतरनाक डाकू, जिससे अंग्रेजी सरकार हिल गयी थी…

विविध

: काशी की नामचीन डाक्टर की दिल दहला देने वाली शैतानी करतूत : पिछले दिनों 17 जून की शाम टीवी चैनल IBN7 पर सिटिजन...

विविध

पहली बार चुनाव हमने 1967 में देखा था. तेरह साल की उम्र में. और अब पहली बार ऐसा चुनाव देख रहे हैं, जो इससे...

विविध

राजस्थान, कांग्रेस और सेक्स. ये तीन शब्द लगता है आपस में अच्छे से घुल मिल गए हैं. भंवरी कांड में ये तीनों शब्द जुड़े...