पत्रकारों की असली औकात क्या है, ये इस लोकसभा चुनावों की बयार के बीच पता चल रहा है। एक नमूना पेश-ए-नज़र है। इतवार की देर शाम मेरे पास भाजपा मण्डल अध्यक्ष दुर्गेश पाण्डे का फोन आया कि धौरहरा लोकसभा क्षेत्र से प्रत्याशी की लाइन में लगे भाजपा नेता शशांक त्रिवेदी प्रेस वार्ता करना चाहते हैं। नियत समय पर प्रेस वार्ता स्थल पर पहुँचा तो नेता जी के पास कहने के लिए कुछ नहीं था, सिवाय अल्लमतरानी के।
जब चला चली की बेला आई तो नेता जी पत्रकारों को लिफाफा बांटने लगे, बोले इसमे डिटेल है। चूँकि इससे पहले एक और भाजपा नेता आशीष कुमार मैसी भी ऐसे लिफाफे बांट चुके हैं इसलिए सीलबन्द लिफाफे में प्रेस नोट की बात सुनकर हाज़मा खराब हुआ तो मैंने वहीं भीड़ में लिफाफा फाड़ दिया। इस बीच शशांक त्रिवेदी वहाँ से खिसक लिए। लिफाफे में प्रेस नोट के तौर पर पांच पांच सौ के कुछ नोट थे। यह देख नेता जी की थू-थू होने लगी, लेकिन वह तो वहाँ से खिसक चुके थे। मुझे गुस्से के साथ खुद के पत्रकार कहलाने पर शर्मिन्दगी भी हुई। खैर भाजपा मण्डल अध्यक्ष दुर्गेश जी को बुला कर जो मुँह में आया बका। दूसरे पत्रकार भी यह देख उन पर चढ दौड़े। इस बीच मैं भी वहाँ से निकल लिया पत्रकारिता के एक नए अनुभव और अपनी औकात के एहसास के साथ।
दैनिक जागरण, लखीमपुर में कार्यरत पत्रकार दीपेन्द्र मिश्र के फेसबुक वॉल से.






