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लुटेरे हिंदू बनाम कमेरे हिंदू!

शंभूनाथ शुक्ल : अच्छा हुआ ब्राह्मण समाज में भस्म करने की क्षमता कभी नहीं रही वर्ना सभ्यता कब की समाप्त हो चुकी होती। वे आपको श्राप के जरिए भस्म कर देने की नौटंकी भर करते हैं। अब देखिए तमाम ब्राह्मण जाति के मूर्धन्य संपादकों और उन उप संपादकों तथा अदने से रिपोर्टरों ने भी मुझे भस्म कर देने और मेरे घर के सामने आमरण अनशन की धमकी दी है जो उस वक्त कभी मेरे चेंबर तक में घुसने की हिम्मत नहीं करते थे जब मैं संपादक था। आज अचानक उन्हें लगने लगा कि मैं जो लिखता हूं सब कूड़ा है और मेरे अंदर एक सफल पत्रकार बनने की क्षमता कभी नहीं रही। अगर मैं कूड़ा लिखता हूं तो भैया फेसबुक में पढ़कर आप विचलित क्यों हो जाते हो? आखिर आप सब तथाकथित ब्लू ब्लड वाले कुलीन ब्राह्मणों का ही कहना है कि यह तो निठल्ले लोगों का शगल है। फिर क्यों बेचैन हो जाते हो? मुझे अपने किसी संस्कार के लिए आप जैसे मूढ़मति के लोगों की जरूरत नहीं है।
शंभूनाथ शुक्ल : अच्छा हुआ ब्राह्मण समाज में भस्म करने की क्षमता कभी नहीं रही वर्ना सभ्यता कब की समाप्त हो चुकी होती। वे आपको श्राप के जरिए भस्म कर देने की नौटंकी भर करते हैं। अब देखिए तमाम ब्राह्मण जाति के मूर्धन्य संपादकों और उन उप संपादकों तथा अदने से रिपोर्टरों ने भी मुझे भस्म कर देने और मेरे घर के सामने आमरण अनशन की धमकी दी है जो उस वक्त कभी मेरे चेंबर तक में घुसने की हिम्मत नहीं करते थे जब मैं संपादक था। आज अचानक उन्हें लगने लगा कि मैं जो लिखता हूं सब कूड़ा है और मेरे अंदर एक सफल पत्रकार बनने की क्षमता कभी नहीं रही। अगर मैं कूड़ा लिखता हूं तो भैया फेसबुक में पढ़कर आप विचलित क्यों हो जाते हो? आखिर आप सब तथाकथित ब्लू ब्लड वाले कुलीन ब्राह्मणों का ही कहना है कि यह तो निठल्ले लोगों का शगल है। फिर क्यों बेचैन हो जाते हो? मुझे अपने किसी संस्कार के लिए आप जैसे मूढ़मति के लोगों की जरूरत नहीं है।
 
मेरी एक ऐसी ही पोस्ट पर ब्राह्मण नायकों की प्रतिक्रिया पर मित्र अतुल गंगवार ने ठीक ही लिखा कि कमेरे हिंदुओं और लुटेरे हिंदुओं में यही फर्क है। लुटेरे गाली ही दे सकते हैं वे कभी भी श्रम करना नहीं चाहते। मुझे याद है जब वीपी सिंह ने मंडल आयोग की सिफारिशों पर अमल की घोषणा की थी तो तमाम जगह इन्हीं तथाकथित दूसरों के हिस्से की मलाई खाने वाले हिंदुओं ने दांत में तृण दबाकर वीपी सिंह को भस्म हो जाने का श्राप दिया था पर वीपी सिंह उनके इस श्राप के १८ साल बाद तक जीवित रहे। ये लोग तब रोना रो रहे थे "भला ब्राह्मणों से गरीब कौन होगा? हम सदैव से सुनते आए हैं कि हर कहानी किस्से में लिखा गया कि एक गरीब ब्राह्मण था। अब देखिए कि गरीब ब्राह्मण तो गरीबी का ही पर्याय है इसलिए अगर आरक्षण मिले तो ब्राह्मण को ही मिले।" 
 
उस समय नवभारत टाइम्स में एक लेख छपा था जिसमें कहा गया था- "ब्राह्मण गरीब इसलिए कहा जाता रहा कि यह जाति काम नहीं करना चाहती। ब्राह्मण दूसरे के श्रम पर हाथ साफ करना चाहता है इसीलिए उनके श्रम विभाजन में ब्राह्मण के पास सिर्फ हराम का भोजन ही लिखा गया।" अब ऐसे नाकारा ब्राह्मण मेरा क्या बिगाड़ पाएंगे? मुझे फख्र है कि मैं इस लुटेरी जाति की मानसिकता के बाहर आ गया हूं। पत्रकारिता में मैं कोई लूटपाट करने अथवा लिखने का शगल जैसी बातें करने नहीं आया था मैने पत्रकारिता में कदम इसलिए रखा था ताकि मैं इस एकरस बगिया को वैविध्यता प्रदान कर सकूं। और मुझे खुशी है कि पत्रकारिता में मैने तमाम मुस्लिमों और पिछड़ी तथा दलित जातियों को लाने का प्रयास किया और सफल भी रहा।
 
वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ल के फेसबुक वाल से
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