संभवतः पहली बार किसी के परिचय को उसके लिखे लेख का हेडिंग बना दिया गया है. यह काम भड़ास पर ही नहीं, बल्कि पत्रकारिता में भी पहली बार हुआ होगा. कोई डाक्टर अजय कुमार साहब हैं. इनका पता और फोन नंबर आदि देखकर लग रहा है कि ये विदेश में बसे भारतीय हैं. और संभवतः शोधरत हैं. किस देश में हैं, फिलहाल समझ नहीं पाया. आप समझ जाएं तो नीचे के कमेंट बाक्स के जरिए हमें भी बता दें. डाक्टर साहब का गुस्सा कितना ज्यादा है, इसका अंदाजा उनके लिखे लेख और खुद के प्रति अति उपेक्षात्मक परिचय से लगाया जा सकता है. उनके लिखे को बिना किसी संपादन के हूबहू प्रकाशित किया जा रहा है. आप भी पढ़ें. -यशवंत, एडिटर, भड़ास4मीडिया
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date Sun, Dec 11, 2011 at 6:56 PM
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थप्पड़ के सामान अपराध पर हरविंदर को जेल और बलजिंदर को बेल, आखिर क्यों?
८ दिसम्बर २०११ को नवभारत times में छपी खबर का हवाला देते हुए एक सवाल
इस देश में 2 लोगों ने लगभग एक ही तरह का अपराध किया , लेकिन दोनों के खिलाफ अलग-अलग तरह से बर्ताव हो रहा है। ये दोनों आरोपी हैं , केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार को थप्पड़ मारने वाले हरविंदर सिंह और पंजाब के मुक्तसर में महिला टीचर को थप्पड़ मारने वाले सरपंच बलजिंदर सिंह।
इनमें एक बुनियादी फर्क है। पहली घटना में एक आम आदमी ने एक नेता को थप्पड़ मारा , वहीं दूसरी घटना में एक नेता ने आम महिला को थप्प…ड़ मारा। पहली घटना दिल्ली की है। युवक हरविंदर सिंह ने केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार को थप्पड़ मारा। हरविंदर, पवार से नाराज था। वह पूरे देश की परेशानियों से परेशान था। यानी महंगाई से परेशान था। उसे लगा कि इसके लिए शरद पवार दोषी हैं। इसके लिए उसने पवार को ' सिर्फ एक थप्पड़ ' मारा। वह पकड़ा गया। उसे जेल भेज दिया गया। कोर्ट को लगा कि उसका बाहर रहना खतरनाक साबित हो सकता है। कोर्ट ने उसे तुरंत 14 दिन की जुडिशल कस्टडी में भेज दिया। दूसरा वाकया पंजाब के मुक्तसर का है। मंगलवार को मुक्तसर में एक महिला टीचर भटिंडा की सांसद हरसिमरत सिंह कौर के पास अपनी मांग लेकर गई। वहां मौजूद सरपंच बलजिंदर को यह बुरा लगा। उसने सरेआम उस महिला टीचर की पिटाई कर दी। बलजिंदर ने महिला को एक थप्पड़ नहीं मारा, लगातार कई थप्पड़ जड़ दिए। महिला की सरेआम पिटाई के बावजूद बलजिंदर को तुरंत जमानत पर रिहा कर दिया गया। मुक्तसर का यह सरपंच अब मुक्त है।
अगर हक की मांग करने गई महिला को कई थप्पड़ लगाने वाले सरपंच को तुरंत जमानत दी जा सकती है , तो फिर सिर्फ एक थप्पड़ लगाने वाले हरविंदर को जमानत क्यों नहीं मिलनी चाहिए ? क्या हरविंदर का अपराध इसलिए बड़ा है कि उसने एक केंद्रीय मंत्री को थप्पड़ मारा है…?
हमारी राय इसप्रकार है …
दोनों थप्पड़ों में एक बुनियादी अंतर है .. हरविंदर का थप्पड़ शोषित का शोषक पर है .. जो न्याय के नियमो के मूल श्रोत प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत के विरुद्ध है .. लेकिन बलजिंदर का थप्पड़ शोषक का शोषित पर है जो की न्याय के नियमो के मूल श्रोत प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत के विरुद्ध नहीं है .. इसलिए हरजिंदर का थप्पड़ प्राकृतिक न्याय का घोर उलंघन व अत्यधिक दंडनीय माना जा सकता है और न्यायलय उसकी १४ दिन के हिरासत के अलावा उसको मानसिक अस्पताल भेजकर उसकी दिमगीजांच करवा सकता है .. क्यूँकी उसके दिमागी सॉफ्टवेर में कही कोई प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत के विरुद्ध असहनीय गड़बड़ी तो नहीं .. जबकि बलजिंदर का थप्पड़ न्याय के नियमो के मूल श्रोत प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत के विरुद्ध नहीं होने के कारण सामान्य व जमानत योग्य है …
नायालय अगर इस भेद को जिन्दा नहीं रख पाई तो समाज में अराजकता फ़ैल सकती है .. पानी प्राकृतिक सिद्धांत के विरुद्ध उल्टा पहाड़ पर चड़ने लगेगा . और वहां से बदलो की तरफ जाने लगेगा .. नदीयाँ सूख जायेंगी … हरियाली व फसलें चौपट हो जायेंगी .. भुखमरी फ़ैल जायेगी .. और संभवतया भूलोक खतरे में आ जायेगा …
सोचो प्राकृतिक खाद श्रृंखला नीचे से ऊपर की ओर चलती है शाकाहरी से मांसाहारी की तरफ .. या यूं कहो अहिंसक से हिंसक की तरफ .. अगर इसका उल्टा हो गया और शेर को भेड़, बकरी, या गाय खाने लग जाये, गाय को फसल खाने लग जाए, और फसल को हवा पानी व धुप खाने लग जाए तो क्या भूलोक पर जीवन संभव है?
ठीक इसी प्रकार अगर नेता (शोषक या शेर) को अगर जनता (शोषित या बकरी ) लतियाने लग जायेगी तो भूलोक के प्राकृतिक सिद्धांत खतरे में पड़ जायेंगे .. इसीकारण कोई भी संस्था, जैसे सरकार, न्यायालय या कोई अन्य इनके समकक्ष की ये नैतिक जिम्मेदारे बनती है की .. समाज हित के मद्देनजर बकरी ( जनता या अन्ना या कोई निम्न श्रेणी का जीव) को प्राकृतिक के सिद्धांत के विरुद्ध नियंत्रित रखे. अगर बकरी ( निम्न जनता) हिंसा करने लगेगी तो प्राकृतिक सिद्धांत को चलाने और प्रकृती की रक्षा के लिए अधिक उर्जा व बल की आवस्यकता होगी जिसकी पूर्ती करने में सूर्यदेव भी अक्षम होंगे.. अधिक रक्षा बल नियुक्त करने पड़ेंगे जिनकी पगार के लिए जनता पर अधिक प्रकार के कर लगाने पड़ेंगे शायद सांस या हवा टैक्स, धुप टैक्स, पानी टैक्स आदी आदी .. जिससे सामाजिक राजनितिक प्रसाशनिक व्यवहारिक न्यायिक व और भी अनेको तरह की व्यवस्थाएं चरमरा जायेंगी .. निम्न जीव ( जनता) अतिशोषण का शिकार होकर पलायनवादी (लेखक ) या लुप्त हो सकते हैं जिससे शोषक या शीर्ष वर्ग का अस्तित्व खतरे में पड़ जायेगा .. और उपरोक्त तमाम व्यवस्थायों के ठेकेदारों का अमूल्य जीवन खतरे में पड़ जायेगा . उनका गुणगान करने के लिए निम्न वर्ग (जनता ) ख़ास हो जायेगा, उनकी मूर्तियों को देखने और नमन करने वालों का समूल नास हो जायेगा … खतरा इससे भी ज्यादा हो सकता की उनकी मूर्तियों को रोजाना मल मूत्र विषर्जन से श्रद्धांजली देने वाला पक्षी वर्ग भी शायद लुप्त हो जाए ..
लेखक दशक पूर्व भारत से पलायन कर चुका शोषित या बकरी श्रेणी का निम्न जीव है …
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Thank you very much
With Best Regards

Dr Ajay Kumar, Ph.D.
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