: भड़ास ने मुझे लिखने का मौक़ा देकर दोबारा एक लिखने वाले पत्रकार के रूप में मेरी पहचान बनायी : जब मैं दोबारा लिखने पढने की दुनिया में आया, तो मुझे लिखने वाला मानने वाले बहुत कम लोग थे. 1997 के बाद कई साल तक मैंने टीवी न्यूज़ में काम किया. टी वी न्यूज़ और पत्रकारिता शिक्षण की दुनिया से जब मैं बेआबरू होकर निकला तो मुझे नौकरी देने वाला कोई नहीं था. मेरे एक पुराने शुभचिन्तक एक नई पत्रिका निकाल रहे थे. मैं जब उनके पास नौकरी मांगने गया तो उन्होंने कहा कि मित्र आप पहले तो बहुत अच्छा लिखते थे लेकिन दस साल का अंतराल है, कहीं आप लिखना भूल तो नहीं गए होंगे. मैं अपना सा मुंह लेकर लौट आया.
उर्दू सहाफत के हसन शुजा ने भरोसा किया और लिखने का काम दे दिया. उनके यहां लिखे जा रहे सम्पादकीय को थोड़ा झाड़ पोंछ कर सबसे पहले यशवंत ने भड़ास पर छापना शुरू किया. उसके बाद वैकल्पिक मीडिया के कई मंचों ने मुझे फिर से दो रोटी कमाने लायक पत्रकार बनाया. भड़ास के 4 साल पूरे होने के साथ-साथ मेरे फिर से लिख कर रोटी कमाने वाले पत्रकार के रूप में 4 साल पूरे होने वाले हैं. यशवंत और वैकल्पिक मीडिया के अन्य साथी कहते हैं कि मैंने भी उनके मंच के विकास में योगदान दिया है. हो सकता है कि यह बात सच हो लेकिन यह भी उतना ही सच है कि अगर भड़ास और उसके समकालीन मंचों ने हाथ न लगाया होता तो मैं आज भी अपने को लिखने वाला पत्रकार साबित करने के लिए संघर्ष कर रहा होता. यशवंत की इस खुशी में आज मैं अपने आप को शामिल करता हूँ और गर्व अनुभव करता हूँ. यशवंत जिंदाबाद.
शेष नारायण सिंह
वरिष्ठ पत्रकार
दिल्ली
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