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”लोकतांत्रिक राजनीति टीवी धारावाहिक नहीं”

आमतौर पर मीडिया जिन्हें चढ़ाता है, उन्हें गिरा भी देता है। सीएनएन आईबीएन के इंडियन ऑफ द ईयर अवार्ड के दौरान अन्ना हजारे ने बड़े भोलेपन से स्वीकारा कि उन्हें महाराष्ट्र के क्षेत्रीय नेता से राष्ट्रीय आइकॉन बनाने के लिए मीडिया जिम्मेदार था। ‘यदि आपके कैमरे हर जगह मेरा पीछा नहीं करते तो भला मुझे कौन जानता?’ यह इस समाजसेवी का ईमानदार वक्तव्य था।

आमतौर पर मीडिया जिन्हें चढ़ाता है, उन्हें गिरा भी देता है। सीएनएन आईबीएन के इंडियन ऑफ द ईयर अवार्ड के दौरान अन्ना हजारे ने बड़े भोलेपन से स्वीकारा कि उन्हें महाराष्ट्र के क्षेत्रीय नेता से राष्ट्रीय आइकॉन बनाने के लिए मीडिया जिम्मेदार था। ‘यदि आपके कैमरे हर जगह मेरा पीछा नहीं करते तो भला मुझे कौन जानता?’ यह इस समाजसेवी का ईमानदार वक्तव्य था।

अब वही मीडिया मुंबई में अन्ना के फ्लॉप शो की खबरें मुस्तैदी से दिखा रहा है और हमें बता रहा है कि किस तरह एक आंदोलन एंटी-करप्शन से एंटी-कांग्रेस बन गया और किस तरह अन्ना के अनशन दबाव बनाने वाले ब्लैकमेल की तरह हो गए। गत सप्ताह मणिशंकर अय्यर, जो कि सत्ता-वर्ग के अंतिम मूर्तिभंजक हैं, ने अन्ना को ‘फ्रैंकेंस्टीन मॉन्स्टर’ बताया। अय्यर अनेक नेताओं के इस दृष्टिकोण को ही प्रतिफलित कर रहे थे कि मीडिया द्वारा रचे गए अन्ना संसदीय लोकतंत्र के लिए खतरा बनते जा रहे हैं। लेकिन क्या अन्ना की लार्जर दैन लाइफ छवि के लिए मीडिया ही जिम्मेदार था?

इसमें कोई शक नहीं कि पिछले नौ माह में अन्ना हजारे के सलाहकारों ने मीडिया का बेहतरीन इस्तेमाल किया। प्राइम टाइम प्रेस वार्ताएं, मेड फॉर टीवी तमाशे, सोशल नेटवर्किग, अन्ना को मीडिया कवरेज की अधिकता से बहुत लाभ मिला। हां, कुछ अवसरों पर मीडिया का कवरेज अतिनाटकीय था और कुछ पत्रकार अन्ना के चीयरलीडर भी बन गए, लेकिन अन्ना को विशुद्ध रूप से मीडिया द्वारा रची गई परिघटना के रूप में देखना एक गंभीर भूल ही होगी। लोग अन्ना की ओर केवल इसीलिए आकर्षित नहीं हुए थे, क्योंकि सभी टीवी कैमरे उनकी ओर खिंचे चले जा रहे थे। लोग अन्ना की ओर इसलिए आकर्षित हुए थे, क्योंकि वे उन्हें नैतिक रूप से कंगाल राजनीतिक नेतृत्व का विलोम जान पड़े थे।

अप्रैल की घटनाओं को याद करें, जब अन्ना पहली बार राष्ट्रीय परिदृश्य पर उभरे थे। जंतर-मंतर पर किए गए अपने पहले अनशन से ठीक पहले अन्ना प्रेस क्लब में एक प्रेस कांफ्रेंस में शामिल हुए थे। कांफ्रेंस में नाममात्र की संख्या में लोग मौजूद थे और अन्ना काफी हद तक राष्ट्रीय मीडिया के लिए विस्मय का विषय ही थे। लेकिन अनशन द्वारा सुर्खियों में जगह बना पाने से भी पहले वरिष्ठ केंद्रीय मंत्री शरद पवार द्वारा लोकपाल के लिए गठित मंत्रिसमूह से त्यागपत्र देना अन्ना के इस दावे को लगभग उचित ठहराना ही था कि एक ‘भ्रष्ट’ मंत्री एंटी-करप्शन लॉ पेनल में नहीं हो सकता।

दो दिन बाद जब सरकार ने अपने आधिकारिक राजपत्र में औपचारिक अधिसूचना जारी करते हुए एक सशक्त लोकपाल बिल का मसौदा तैयार करने के लिए संयुक्त ड्राफ्टिंग कमेटी गठित की तो इससे अन्ना के आंदोलन को और बल मिला। कमेटी के सदस्यों में आधे सरकार के मंत्री थे और आधे ‘टीम अन्ना’ के सदस्य। ९ अप्रैल तक अन्ना भ्रष्टाचार-रोधी कानून पर जारी बहस में महज एक और आवाज भर ही थे, लेकिन उन्हें और उनकी ‘टीम’ को लोकपाल पर सरकार से औपचारिक वार्ता करने की अनुमति मिलते ही वे ‘सिविल सोसायटी’ के एकमात्र प्रवक्ता बन गए। अचानक वे अरुणा रॉय, लोकसत्ता के जयप्रकाश नारायण सहित लोकपाल कानून पर कड़ी मेहनत कर चुके कई अन्य समाजसेवियों जितने ही प्रतिष्ठित हो गए।

क्या मीडिया ने सरकार से कहा था कि टीम अन्ना को सिविल सोसायटी की ओर से वार्ताकार बनाए या यह एक ऐसी सरकार का विचार था, जो गैरसरकारी संगठनों को संतुष्ट करने को आतुर थी? जब ड्राफ्टिंग कमेटी में सरकार की ओर से चर्चा करने के लिए कांग्रेस के मंत्रियों को नियुक्त कर दिया गया, तब तो यह पूरी जोर-आजमाइश प्रभावी रूप से कांग्रेस बनाम टीम अन्ना बनकर रह गई। यदि 9 अप्रैल को सरकार से गलती हुई थी तो 5 जून को तो वह भारी भूल ही कर बैठी। कालेधन के मसले पर अनशन कर रहे बाबा रामदेव के आंदोलन को समाप्त करने के लिए दिल्ली पुलिस ने आधी रात को बलप्रयोग किया, जबकि महज 72 घंटे पहले सरकार के चार वरिष्ठ मंत्री योग गुरु की अगवानी करने हवाई अड्डे पहुंचे थे।

लेकिन सबसे बड़ी भूल हुई 16 अगस्त को, जब दिल्ली पुलिस ने अपने दूसरे अनशन की तैयारी कर रहे अन्ना को गिरफ्तार कर लिया। पहले अन्ना को अनशन स्थल प्रदान करने में आनाकानी करके और फिर न्यायिक हिरासत में भेजकर सरकार ने उन्हें एक भ्रष्टाचार विरोधी कार्यकर्ता से एक शहादतपूर्ण मसीहा में बदल दिया। अन्ना के अप्रैल अनशन के दौरान उनके मंच पर भारत माता का विशाल पोस्टर था और बाबा रामदेव भी मंचासीन थे, लेकिन अगस्त में रामलीला मैदान पर हुए अनशन के दौरान भारत माता के पोस्टर की जगह महात्मा गांधी के चित्र ने ली और बाबा रामदेव भी मंच से दूर हो गए।

अन्ना की गिरफ्तारी के बाद देशभर में हजारों की संख्या में लोग सड़कों पर उतर आए। अब यह केवल लोकपाल कानून की लड़ाई ही नहीं रह गई थी, बल्कि यह एक भ्रष्ट और अहंकारी माने जाने वाले सत्तातंत्र के प्रति आम जनता का मोहभंग था। आक्रोशित भारतीयों के लिए अन्ना का त्यागपूर्ण व्यक्तित्व सबसे महत्वपूर्ण प्रतीक बन गया। ‘मैं भी अन्ना’ टोपियों और टी-शर्ट की भारी बिक्री ने इस आंदोलन का पूरी तरह ‘वैयक्तिकरण’ कर दिया। जब संसद ने अन्ना का अनशन समाप्त कराने के लिए हड़बड़ी में लोकपाल बिल लाने पर प्रस्ताव पारित किया, तो इसे अन्ना की संपूर्ण विजय माना गया। लेकिन क्या मीडिया ने सरकार को अन्ना की गिरफ्तारी के लिए बाध्य किया था या वह एक घबराए हुए सत्तातंत्र का बुद्धिहीन कृत्य था?

वास्तव में सरकार और टीम अन्ना दोनों ने इस माध्यम को समझने में भूल की। टीम अन्ना ने उन्मादी कवरेज को अपना हथियार मान लिया, लेकिन यह भूल गई कि लोकतांत्रिक राजनीति कोई टीवी धारावाहिक नहीं, बल्कि वार्ताओं और समझौतों की एक यंत्रणापूर्ण प्रक्रिया है। दूसरी तरफ सरकार भी नहीं समझ पाई कि कर्कशता हमेशा उस मीडिया के परिवेश का एक अनिवार्य अंग होगी, जिसकी देशभर में 350 से अधिक समाचार चैनल और सैकड़ों ओबी वैन हैं। मीडिया आगे भी न केवल टीम अन्ना, बल्कि अनेक आंदोलनों का लाउडस्पीकर बना रहेगा। सशक्त नेता इस शोरगुल से व्यथित नहीं होंगे और विवेकशील सिविल सोसायटी कैमरा लेंसों के बिना भी समाज की मान्यता पाती रहेगी।

लेखक राजदीप सरदेसाई नेटवर्क18 के एडिटर इन चीफ हैं. उनका यह लेख दैनिक भास्‍कर में प्रकाशित हो चुका हैं, वहीं से साभार लिया गया है.

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