लोकपाल लटक गया. काँग्रेस भाजपा को दोष दे रही है, भाजपा सरकार को कोस रही है, ममता भी नाराज़ हैं, लालू के लोग बिल फाड़ रहे हैं तो मुलायम के लोग हल्ला कर रहे हैं कि लोकपाल कमज़ोर है. कोई अन्ना को असफल बता कर खुश है तो कोई संसद को सर्वोपरि साबित करने में व्यस्त है, नेता बयानबाज़ी में मस्त हैं और जनता भ्रष्टाचार और कालाबाज़ारी से त्रस्त है. पता नही इस आठ नौ माह की मशक्कत में किसको क्या मिला मगर लोकपाल के लिये की गई मेहनत, जन आंदोलन और संसद में अचानक हुये गर्भपात का घिनौना सच सबने देखा.
इस एक बिल के लिये नेता और जनता के बीच कड़ुवाहट के बीज़ पनपते नज़र आये और अब उस नाटक के लिये ज़िम्मेदारी तय करने के लिये स्वयंभू ठेकेदार मीडिया की जो भूमिका रही वो तो और ज्यादा शर्मनाक है. उसने आपको ये कहा, आपका क्या कहना है, आप को वो ये कह रहा है, आप क्या कहेंगे, बस मंथरा टाइप की चुगलखोरी को पत्रकारिता का नया स्वरुप देकर सिर्फ और सिर्फ वैमनस्यता और कडुआहट ही बढाई है. क्या इस तरह की बकवास / बहस जरूरी होती है? क्या बहस के बहाने आरोप प्रत्यारोप दिखाना जरूरी है? क्या इस देश में समाचारों के नाम पर सिर्फ नेताओं के विषवमन को सारे देश में फैलाना जरूरी है? दिन भर की बकवास देखने के बाद मुझे समझ में ही नही आया कि आखिर बहस का मतलब ही क्या है?
रायपुर के वरिष्ठ पत्रकार अनिल पुसदकर Anil Pusadkar ने उपरोक्त टिप्पणी अपने फेसबुक वॉल पर लिखी है. वहीं से साभार.





