लखनऊ : लखनऊ में पैदा हुए सुनीत टंडन वर्तमान में दिल्ली स्थित आइआइएमसी के निदेशक हैं। उनकी स्कूली शिक्षा लामार्टीनियर स्कूल में हुई व उच्च शिक्षा दिल्ली के सेंट स्टीवेंस कॉलेज में हुई। यहां से उन्होंने इकॉनोमिक्स में ऑनर्स किया। शुरुआत में वह बैंकर रहे तथा रेडियो पर भी काम कर चुके हैं। इनकी जिंदगी की गुल्लक में रचनात्मकता व अनुभव के सिक्कों की भरमार है। मजे की बात तो ये है कि आज भी ये सिक्के बढ़ रहे हैं।
रंगमंच से लोकसभा टीवी, बैंक से पत्रकारिता तक उनके पास सिखाने के लिए बहुत कुछ है। नई पीढ़ी को दिशा तराशने की जिजीविषा काबिले मिसाल है। ये हैं इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट आइआइएमसी के निदेशक सुनीत टंडन। बैंक, फिल्म फेस्ट के महाप्रबंधक आदि, कितने ही पेशे बदले, लेकिन जो सुकून पत्रकारिता में मिला वह कभी कहीं नहीं मिला। वह कहते हैं सबसे अच्छा तब लगता है जब इंस्टीट्यूट के बच्चों को आगे बढ़ने के नुस्खे बताते हैं और जब अपने ही बच्चे कुछ कर दिखाते हैं।
बकौल सुनीत उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि वह एक दिन इस ओहदे को हासिल कर लेंगे। भविष्य में क्या करना है इसको
लेकर वह कभी चिंतित नहीं रहे, जो भी मन में आया वह किया। सुनीत मानते हैं कि उनका पत्रकारिता में आना किसी इत्तेफाक से कम नहीं था। कई पेशे बदले। दो साल बैंक में कार्य किया, मन नहीं लगा तो फिल्म फेस्टिवल से जुड़ गए। इस बीच कई थिएटर भी किए। कुछ समय नेशनल फिल्म फेस्टिवल में महाप्रबंधक रहे, लेकिन कहीं संतुष्टि नहीं मिली, इसके बाद छलांग लगाई पत्रकारिता में। लोकसभा टीवी के सीईओ बनाए गए। लिखना पसंद था, दूसरों को जागरूक करना भी तो पूर्णतया पत्रकार बन गया।
यदि कुछ करने का जज्बा हो और सफल संवाद करने की क्षमता तो आप पत्रकार बन सकते हैं। किसी क्लासरूम में बैठकर अखबार में लिखने का तरीका नहीं सिखाया जा सकता। हां, कुछ तौर-तरीके जरूर सिखाए जा सकते हैं, लेकिन वह भी सीमित। असल पत्रकार तो बाहरी दुनिया में कदम रख कर ही बनते हैं, न कि किसी चहारदीवारी में बैठकर।
पत्रकारिता में बीते कुछ सालों में बहुत तेजी से बदलाव आए है। इसकी रफ्तार बढ़ गई है। इंटरनेट और सोशल मीडिया के चलते भी कुछ दबाव आया है, जिससे पत्रकारिता तेज हो गई है। पहले केवल जागरूकता के लिए एक माध्यम था, अब युवाओं के लिए एक पेशा बन गया है, अवसर भी बहुत हैं।
कोई भी पत्रकार हो, जरूरी है कि वह निष्पक्ष होकर कार्य करे। किसी एक का पक्ष लेने के बजाए हर पहलू पर सोचें और पारदर्शी तरीके से अपनी बात रखें। इससे आम लोगों का आप पर भरोसा बना रहता है। किसी भी पत्रकार की ताकत है लोगों का भरोसा। यदि एक बार आपने इस विश्वास को तोड़ दिया तो अधिक दिनों तक इस क्षेत्र में टिके रहना कठिन है।
सुनीत मानते हैं कि आज के युवा तेज दौड़ना जानते हैं। वह इसकी तारीफ करते हैं। साथ ही इस पीढ़ी को संदेश भी देना चाहते हैं, चाहे अखबार हो या कोई भी अन्य क्षेत्र, हर ओर भेड़चाल की स्थिति है। रफ्तार जितनी तेज होगी उतना मंजिल के करीब पहुंचेंगे, लेकिन यह भी देखना होगा कि खुद के अंदर कितनी आग है। नहीं है तो उसे लेकर आएं, क्योंकि इसी आग को एक्स फैक्टर कहते हैं और यही एक्स फैक्टर इस प्रतियोगी समाज में टिकने के लिए जरूरी है।
दैनिक जागरण, लखनऊ संस्करण में प्रकाशित साशा सौवीर की रिपोर्ट. साभार- दैनिक जागरण.





