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लखनऊ

लोग कहते भी हैं कि ”पिछड़े हैं तो क्या गम है”!

उत्तर प्रदेश की राजनीति में पिछड़ों की हमेशा अहम भूमिका रही है। इस समाज ने प्रदेश को न केवल कई बड़े नेता दिये बल्कि पिछड़ा बिरादरी के एक-दो नहीं चार बड़े नेता मुख्यमंत्री तक की कुर्सी पर विराजमान हो चुके हैं। आज भी यूपी की कमान पिछड़े समाज से आने वाले अखिलेश यादव के हाथ में है। अखिलेश के पिता मुलायम सिंह स्वयं भी सीएम रह चुके है।

उत्तर प्रदेश की राजनीति में पिछड़ों की हमेशा अहम भूमिका रही है। इस समाज ने प्रदेश को न केवल कई बड़े नेता दिये बल्कि पिछड़ा बिरादरी के एक-दो नहीं चार बड़े नेता मुख्यमंत्री तक की कुर्सी पर विराजमान हो चुके हैं। आज भी यूपी की कमान पिछड़े समाज से आने वाले अखिलेश यादव के हाथ में है। अखिलेश के पिता मुलायम सिंह स्वयं भी सीएम रह चुके है।

इसी तरह पिछड़ा वर्ग से आने वाले पूर्व मुख्यमंत्रियों रामनरेश यादव और कल्याण सिंह की भी पिछड़ों मे अच्छी खासी पकड़ थी। देखने में यह भी आया कि जब जिस पार्टी में मजबूत पिछड़ा वर्ग के नेताओ का उभार हुआ, वह दल आसानी से सत्ता की सीढ़िया चढ़ गया या फिर उसने प्रदेश की राजनीति में अपना ठोस आधार तैयार कर लिया।  

आज भी प्रदेश की राजनीति में पिछड़ा वर्ग से आने वाले नेताओं का दबदबा है। कांग्रेस के नेता और केन्द्रीय मंत्री श्री प्रकाश जायसवाल, बेनी प्रसाद वर्मा, भारतीय जनता पार्टी के हुकुम सिंह, राम नारायण साहू, शंकर प्रसाद जायसवाल, विनय कटियार, उमा भारती, कल्याण सिंह, बसपा के स्वामी प्रसाद मौर्य, लाल जी वर्मा, चन्द्रदेव राम यादव, धर्म सिंह सैनी, राम अचल राजभर, सुखदेव राजभर, राष्ट्रीय लोकदल के नेता और केन्द्रीय मंत्री चौधरी अजित सिंह, जयंत सिंह, सच्चिदानंद गुप्ता उर्फ मंत्री जी का नाम प्रमुखता के साथ लिया जा सकता है। समाजवादी पार्टी में तो पिछड़ा वर्ग के नेताओं ने पूरी तरह से आधिपत्य ही जमा रखा है। मुलायम सिंह यादव, राम गोपाल यादव, अखिलेश यादव, शिवपाल यादव, राम गोविंद चौधरी, अंबिका चौधरी, राम आसरे विश्वकर्मा जैसे नेताओं की लम्बी-चौडी लिस्ट हैं। लेकिन मुलायम के चलते कोई भी अपने आप को पिछड़ा वर्ग का नेता नहीं कहता है।

उत्तर प्रदेश की कुल आबादी का करीब-करीब आधा हिस्सा पिछड़ों का है। इस लिये चाहे सत्ता में दावेदारी की बात हो या फिर आरक्षण का मुद्दा सभी जगह यह वर्ग ताल ठोंक कर खड़ा रहता है। उत्तर प्रदेश में पिछड़ा वर्ग और समाज के अन्य वर्गो की स्थिति ‘आधे में अध घर,आधे में सब घर’ जैसी है। आधी आबादी को ही देख कर ही विभिन्न दलों द्वारा अपनी-अपनी रणनीति बनाई और गोटें बिछाई जाती हैं। हालात ऐसे हैं कि पिछड़ा होना आज गर्व की बात बन गया है, लोग कहते भी हैं कि पिछड़े हैं तो क्या गम है।

लोकसभा चुनाव 2014 के मद्देनजर भी विभिन्न राजनीतिक दल और उनके आका पिछड़ों को लुभाने और अपनी ताकत बढ़ाने में जुट गए हैं। पिछड़ों के नेताओं को तवज्जो दी जा रही है तो अगड़ा वर्ग से आने वाले नेता भी अपने आप को पिछड़ों का मसीहा बताने की होड़ में लगे हैं। कहा जा सकता है कि प्रदेश की राजनीति में ताकत बढ़ाने और जातियों कोे लुभाने का हथकंडा खूब फलफूल रहा है।  सियासी परिदृश्य पर मौजूदा समय में बसपा और सपा का मुस्लिम-ब्राहमण प्रेम सुर्खियों में है, लेकिन दूसरी जातियों पर भी इनकी नजर है।  कांग्रेस ओैर भाजपा भी किसी न किसी बहाने वोटरों को लुभाने के लिये अपना-अपना अभियान जारी किए हुए हैं।  वोटों की इस जंग में छोेटे दल भी जातियों को जोड़ कर नये समीकरण तलाश रहे हैं। वह जानते हैं कि दो-चार सीट जीत कर बड़े दलों से सौदेबाजी की जा सकती है। छोटे दलों पर बड़ों की हमेशा ही निगाहें लगी रहती हैं।  ऐसे दलों में पीस पार्टी,अपना दल आदि का नाम लिया जा सकता है।

विधानसभा चुनाव में छोटे-छोटे यह दल कभी चमत्कार तो नहीं कर सकेे हैं लेकिन पिछले विधान सभा चुंनाव में पीस पार्टी, अपना दल, कोैमी एकता दल, भारतीय समाज पार्टी के गठबंधन का असर जरूर देखने को मिला।  पूर्वी उत्तर प्रदेश में भारतीय समाज पार्टी, कौेमी एकता दल, जनाधिकार मंच, फूलन  सेना,जनवादी पार्टी जैसे तमाम दल एकता मंच बना कर लामबंद होने की प्रक्रिया में तेजी के साथ आगे बढ़ रहे हैं।  एकता मंच कुशवाहा, चौहान,  मुसलमान, राजभर और निषादों  के अलावा नाई, लोहार कुम्हार, गोड़, खरवार, बीआर, धोबी, पासवान,  दुसाध, कमकर, कुंजड़ा, केवट और बिंद आदि जातियों को जोड़कर करीब 25 लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ने का मंसूबा पाले हुए हैं। कुछ सीटों के लिये मंच ने प्रत्याशियों के नामों की घोषणा भी कर दी है।  एकता  मंच के गठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले भारतीय समाज पार्टी के अध्यक्ष ओमप्रकाश राजभर कहते हैं कि गाजीपुर से पूर्व मंत्री बाबू सिंह कुशवाहा, बलिया से पूर्व सांसद  अफजाल अंसारी, सलेमपुर से खुद ओमप्रकाश राजभर, आजमगढ़ से जनवादी पार्टी के ओमप्रकाश चौेहान और बनारस से विधायक मुख्तार अंसारी को उम्मीदवार घोषित किया जा चुका हैं। एकता मंच के प्रत्याशियों में भी पिछड़ो के अच्छे खासे नाम है।

विधानसभा चुनाव में एक मात्र सीट पर जीत हासिल कर सकी अपना दल की अध्यक्ष अनुप्रिया की नजर भी जातीय समीकरण पर टिकी हैं।  अनुप्रिया मुसलमानों के साथ-साथ पिछड़ांे को भी एक साथ लाकर अपनी ताकत में इजाफा करना चाहती हैं। पूर्वी उत्तर प्रदेश की तरह ही पश्चिम उत्तर प्रदेश में भी पिछड़ों की सियासत परवान चढ़ रही है। राष्ट्रीय लोकदल(रालोद) के वर्चस्व वाले इस क्षेत्र में  54 फीसदी आबादी पिछड़ों की है। समाजवादी पार्टी ने भी विधान सभा चुनाव में यहां से ठीकठाक सफलता हासिल की थी। बसपा दलित और पिछड़ा वर्ग में आने वाले गुर्जरों जिनक यहां अच्छी खासी पकड़ है को एक साथ नीले झंडे ने नीचे लाने के लिये हाथ-पैर मार रही है। गत विधानसभा चुनाव में बसपा यह फार्मूला अपना चुकी है और उसे इसका फायदा भी मिला था।  बसपा के तीन गुर्जर विधायक चुने गए लेकिन सपा का कोई भी गुर्जर या जाट प्रत्याशी न जीत सका अलबत्ता रालोद से एक ( करतार सिंह भड़ाना) और भाजपा के दो गुर्जर ( हुकुम सिंह ) व रविंद्र भड़ाना) विधानसभा में पहुंचें।  बसपा की उपलब्धि रालोद के प्रमुख अजित सिंह के  संसदीय क्षेत्र बागपत  में सेंध लगाने की रही।  

लोकसभा में भी बसपा इसी फार्मूले को आजमाते हुए प्रशांत चौधरी व मलूक नागर को आगे कर गुर्जरों को जोड़ने में लगी है। बसपा नेता लखीराम, वेदराम भाटी, सतवीर, हेमलता चौधरी जो  पिछड़ा समाज से आते हैं,बसपा की गोटे बिछाने में लगे हुए हैं। बात सपा की कि जाये तो वह पश्चिम उप्र के पिछड़ों में अपनी पहली जैसी पैठ नहीं बना पा रही है।  पूर्व प्रदेशाध्यक्ष स्वर्गीय रामशरण दास की भरपाई उसके लिये एक चुनौती बनी हुई है। उधर सपा नेतृत्व ने जाटों को लुभाने के लिये अपने जाट नेता राजेन्द्र चौधरी को आगे कर दिया है लेकिन बात बन नहीं रही है।  मुलायम परिवार के अलावा सपा में राजेंद्र चौधरी को सर्वाधिक प्रमुखता मिली हुई हैं।  प्रवक्ता होने के अलावा कारागार व खाद्य रसद मंत्रालय जैसा अहम विभाग उनके पास है। वैसे इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि सपा का विभिन्न पिछड़ा वर्ग की जातियों पर असरदार पकड़ है।

सपा गुर्जरों को लुभाने के लिये एड़ी चोटी का जोर लगाए हुए है। उसने राम सकल गुर्जर को विधान परिषद सदस्य व कार्यक्रम क्रियान्वयन राज्यमंत्री,नरेंद्र भाटी और वीरेंद्र सिंह को राज्य मंत्री दर्जा देकर गुर्जरों को लुभाने की कोशिश की जरूर है लेकिन यह प्रयोग कितना सफल होगा यह आने वाला समय ही बतायेगा।  रामसकल का कहना है सपा के अलावा गुर्जरों को अन्य किसी दल ने इतना सम्मान नहीं दिया।  पिछड़ों को हक दिलाने में समाजवादी पार्टी सदैव आगे रही हैं।

भाजपा के पिछड़ा कार्ड में कल्याण सिंह की वापसी और मोदी की इंट्री को अहम माना जा रहा है।  विधायक दल नेता के पद पर हुकुम सिंह और विधान परिषद में नैपाल सिंह को पार्टी की कमान सौंप भाजपा पिछड़ों की सियासत में अगुवा बनना चाहती है। भाजपा आलाकमान ने पिछड़ा वर्ग के गुर्जर अशोक कटारिया को प्रदेश उपाध्यक्ष बनाकर नए चेहरे के रूप में पेश किया है, तो लोधी समाज में साध्वी उमा भारती, कल्याण सिंह उनके पुत्र राजवीर सिंह पर ही दारोमदार रहेगा।  जाटों पर पकड़ बनाने को पूर्व केंद्रीय मंत्री सतपाल मलिक को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, पश्चिम क्षेत्रीय अध्यक्ष पद पर भूपेंद्र सिंह  की ताजपोशी कर सियासी कद में इजाफा किया गया हैं। अति पिछछ़ों को लुभाने के लिये भाजपा मोदी मंत्र पर भरोसा करेगी। भाजपा जाटों को यह बताने की कोशिश में लगी है के उसे कहीं से आरक्षण नहीं मिलने वाला है,भाजपा सत्ता में आई तो वह इस दिशा में काम करेगी।

लेखक अजय कुमार उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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