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लड़कियों की इन तस्वीरों में कोई खबर है क्या?

पटना : ‘फुर्सत के पल’ शीर्षक के साथ मोबाइल लिए दो लड़कियों की तस्वीर,…. कैप्शन में कुछ यों कि .. ऐसा लग रहा है कि घर लौटने के दौरान छात्राएं परिवारजनों से बात करती हुई…../ ‘चलो घर चलें’ शीर्षक के साथ तीन लड़कियों की तस्वीर…. कैप्शन में- घर जाने के दौरान बातचीत करने में मशगूल दिखी छात्राएं…./ ‘चलो परीक्षा अच्छी गई’ .. परीक्षा भवन से निकलती खुश-खुश लड़कियों का तस्वीर…../इन तस्वीरों में कोई खबर है क्या?

पटना : ‘फुर्सत के पल’ शीर्षक के साथ मोबाइल लिए दो लड़कियों की तस्वीर,…. कैप्शन में कुछ यों कि .. ऐसा लग रहा है कि घर लौटने के दौरान छात्राएं परिवारजनों से बात करती हुई…../ ‘चलो घर चलें’ शीर्षक के साथ तीन लड़कियों की तस्वीर…. कैप्शन में- घर जाने के दौरान बातचीत करने में मशगूल दिखी छात्राएं…./ ‘चलो परीक्षा अच्छी गई’ .. परीक्षा भवन से निकलती खुश-खुश लड़कियों का तस्वीर…../इन तस्वीरों में कोई खबर है क्या?

जी हां इंच- इंच जगह का इस्तेमाल करने वाले प्रिंट मीडिया के पास लड़कियों की तस्वीरों के लिए जगह की कोई कमी नहीं है। फिर चाहे तस्वीर कोई खबर बयान करती हो या नहीं! कोई फर्क नहीं पड़ता! भले ही खबरों के मामले में तस्वीरें के कोई मायने ना हों, ऐसी बेखबरों वाली लड़कियों की तस्वीरें अमूमन रोजाना ही शहर के कथित प्रतिष्ठित अखबार में छापे जाते हैं। गौरतलब यह भी है कि इन तस्वीरों में उनका कोई बयान या बात भी नहीं कही जाती, सिर्फ देखकर अपने मन से अख़बार कोई कैप्शन लगा देता है- ऐसा लग रहा है, ऐसा ही कुछ करती हुई.

यही नहीं “are you our star” के तहत एक अंग्रेजी अखबार द्वारा दिए जाने वाले तस्वीरों (जिसमें पत्र के छायाकार द्वारा ली गई तस्वीर में किसी एक के चेहरे को घेर दिया जाता है और फिर उसे इनाम लेने के लिए बुलाया जाता है।) में अधिकतर (90 फीसदी) लड़कियों/ महिलाओं के समूह की ही तस्वीर होती हैं।

फुर्सत के पल तो लड़कों के भी होते हैं, लड़के भी स्कूल कालेज से लौटते हुए मजे करते हैं, परीक्षा का टेंशन तो उनका भी खत्म होता है … लेकिन बिना खबरों वाली ये तस्वीरें लड़कियों की ही छापी जाती है क्यों? बाकायदा छायाकारों को हिदायत होती है कि शहर के हाई प्रोफाइल गर्ल्स स्कूल व कालेज के बाहर डंटा रहे और छुट्टी के बाद निकलती लड़कियों की तस्वीर ली जाए। छायाकार भी मुस्तैदी से वहां लगा रहता है। छपी हुई प्रति तस्वीर पर भुगतान पाने वाले आज के छायाकार निश्चिंत रहते हैं कि लड़कियों वाली तस्वीर तो छप ही जाऐंगी। मेहनत सफल होगा। छापी गईं अधिकतर तस्वीरें शहर के कुछेक कथित हाई प्रोफाइल गर्ल्स स्कूल व कालेज के बाहर की ही होती हैं। यह तस्वीरों में दिखता भी है और उनके कैप्शन में अक्सर लिखा भी होता है।

आखिर लड़कियों की तस्वीर छापने के पीछे मीडिया की मंशा क्या है? इन बेमतलब की तस्वीरों को छापने में इतनी दिलचस्पी क्यों? क्या प्रबंधन, छायाकारों, संपादकीय विभाग की सोच लड़कियों तक ही सीमित है और उन्हें ऐसा लगता है कि इससे पाठक वर्ग अखबार के प्रति आकर्षित होगा? इन तस्वीरों को छापने के पीछे उनकी कुत्सित सोच साफ दिखती है। इसका मतलब साफ है कि उन्होंने लड़कियों को शोभा की वस्तु समझ लिया है।

यहां एक सवाल और उठता है कि क्या तस्वीरें खींचने और फिर छापने के लिए अखबार ने उन लड़कियों या महिलाओं से इजाजत ली है? यहां अखबार कह सकता है कि तस्वीर छापने को लेकर उन लड़कियों को कोई आपत्ति नहीं रही है। स्वाभाविक है। ‘अखबार में नाम’ को लेकर कोई क्या क्या नहीं कर गुजरता, तो फिर यों ही किसी की तस्वीर छप जाए तो वह भला आपत्ति क्यों कर करेगा? (जब तक कि उसका बेजा इस्तेमाल ना हो) लेकिन अखबारों की सोच क्या है?

यहां प्रिंट मीडिया पर सबसे बड़ा सवाल यह है कि वह कभी राह चलते लड़कों, बुजुर्गों, वृद्धों, दबे कुचले वर्ग के लोगों-बच्चों की बिना खबरों वाली कोई तस्‍वीर यों ही क्यों नहीं छापता? वह महिलाओं को शोभा की वस्तु बनाना कब छोड़ेगा?

लेखिका लीना मीडिया मोरचा की संपादक हैं.

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