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सुख-दुख...

वर्तिका नन्दा की नजर से रवीन्द्र शाह

कभी भी अचानक रवीन्द्रजी का फोन आ जाया करता था और पहला सवाल हाल पूछने का नहीं बल्कि यह होता था कि क्या कर रही हो। मेरा जवाब भी हमेशा एक ही होता था – काम।। बस, काम ही प्रमुख सूत्र था बात का भी और शायद यह बड़ी वजह रही कि मैं उनके बारे में वो तमाम बुनियादी बातें भी नहीं जानती थी जो दो परिचित लोग जान सकते हैं। हरसूद 30 जून पर जनसत्ता में कुछ साल पहले मैनें एक लेखा लिखा। तब मैं न तो विजय मनोहर तिवारी को जानती थी और न ही रवींद्र शाह को। मुझे किताब कहीं मिली, मैनें उसे पढ़ा और बस उस पर लिख दिया। बाद में शायद हिंद भवन में उसका लोकार्पण हुआ तो मैनें पहली बार उन्हें देखा पर फिर शायद एक-दो साल कोई मुलाकात नहीं हुई पर हां, हवा में यह जरूर पता चलता रहा कि इस भागती दिल्ली में कोई रवींद्र शाह भी है जिसमें काम का जज्बा है।

कभी भी अचानक रवीन्द्रजी का फोन आ जाया करता था और पहला सवाल हाल पूछने का नहीं बल्कि यह होता था कि क्या कर रही हो। मेरा जवाब भी हमेशा एक ही होता था – काम।। बस, काम ही प्रमुख सूत्र था बात का भी और शायद यह बड़ी वजह रही कि मैं उनके बारे में वो तमाम बुनियादी बातें भी नहीं जानती थी जो दो परिचित लोग जान सकते हैं। हरसूद 30 जून पर जनसत्ता में कुछ साल पहले मैनें एक लेखा लिखा। तब मैं न तो विजय मनोहर तिवारी को जानती थी और न ही रवींद्र शाह को। मुझे किताब कहीं मिली, मैनें उसे पढ़ा और बस उस पर लिख दिया। बाद में शायद हिंद भवन में उसका लोकार्पण हुआ तो मैनें पहली बार उन्हें देखा पर फिर शायद एक-दो साल कोई मुलाकात नहीं हुई पर हां, हवा में यह जरूर पता चलता रहा कि इस भागती दिल्ली में कोई रवींद्र शाह भी है जिसमें काम का जज्बा है।

उनसे आखिरी मुलाकात उनकी मौत से ढाई दिन पहले हुई। मेरी किताब थी हूं रहूंगी उसी दिन छप कर आई थी। मैं उस समय एफसीसी के बाहर गाड़ी पार्क ही कर रही थी जब उनका फोन आया। इस बार उन्होंने यह नहीं पूछा कि क्या कर रही हो बल्कि यह पूछा कि कहां हो। मैनें कहा फारेन क्लब तो उन्होंने कहा-वहीं रूकना। मैं अभी आ रहा हूं।

मैं वहां रूकी भी।  थोड़ी देर बाद वहां पर एक कार्यक्रम था। मैं वहां किरण कपूर से मिलना चाहती थी। थोड़ी देर में रवीन्द्र जी आए। क्लब के मेन रूम में ही एक-दो और पत्रकार साथियों के साथ उनसे मुलाकात हुई और कुछ ही मिनटों में वे चले भी गए।

जाने से पहले उन्होंने पता नहीं क्या सोचकर मुझे कहा कि बाहर की सड़क पर बहुत से गढ्ढे हैं, वहां कार ध्यान से पार्क किया करो। उनके जाने के 15 मिनट बाद मेरी गाड़ी वाकई उसी जगह एक गढ्ढे में फंसी भी जिसे मैं मुश्किल से निकलवा पाई। यह एक संकेत था।

उनके बारे में तीन बातें खास थी – एक तो उन्हें पत्रकारिता से इतर तमाम साहित्यिक समारोहों की भी पूरी जानकारी रहती थी, दूसरे, उन्हें लोगों की पहचान थी और तीसरे, उनमें लोगों को आपस में जोड़ने की गजब की क्षमता भी।

इन तीनों क्षमताओं की झलक मैनें हर बार देखी। रोटरी का प्रोग्राम था फरवरी में। मेरा उसी दिन आगरा में भी कार्यक्रम था। मैं वहीं से सीधे अशोका होटल पहुंची और वहां भी देखती रही कि किस खूबसूरती से वे लोगों को आपस में जोड़ते हैं।

वे नहीं रहे, इसकी सूचना मुझे इंडिया टुडे के सुधीर गोर ने दी। मुझे कुछ समझ में ही नहीं आया। विश्वास नहीं हुआ। किसी ऐसे का जाना जिसे आप जानते हों, अंदर तक छीलता है। रवींद्र जी को मैनें एक सजग पत्रकार और कर्मठ इंसान के तौर पर देखा था। मुझे लगा था कि अभी उनकी यात्रा एक तरह से शुरू ही हुई है। लेकिन कई बार जिसे हम शुरूआत समझते हैं, वहां किसी अंत की लिखावट छप चुकी होती है।

काश, इस लिखावट को मिटा कर फिर से कुछ नया लिखा जा सकता

काश।।।।।।।।

वर्तिका नन्दा वरिष्ठ पत्रकार हैं. इन दिनों लेडी श्रीराम कॉलेज में मीडिया शिक्षिका के बतौर कार्यरत हैं.


रवीन्द्र शाह की द्वितीय पुण्य तिथि पर इंदौर में 27 फरवरी को आयोजन

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