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वर्धा में सान्याल जन्मवर्ष पर काव्यानुवाद की समस्याओं पर जम कर हुई चर्चा

कोलकाता । महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय की ओर से नलिन मोहन सान्याल के 150 वें जन्म वर्ष के उपलक्ष्य में 'काव्यानुवाद की समस्याएं' विषय पर आयोजित सेमिनार को सम्बोधित करते हुए कवि, अनुवादक एवं प्रगतिशील वसुधा के सम्पादक राजेन्द्र शर्मा ने कहा कि अपने देश में अनुवाद का काम उस तरह होता है जैसे कोई पुरानी फिल्म के गीत को याद कर बाथरूम में गुनगुनाने की कोशिश करता है, जबकि इस काम को काफी गंभीरता से लिया जाना चाहिए। भारत में अनुवाद के इतिहास की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि दाराशिकोह ने काफी पहले उपनिषदों का अनुवाद करवाया था वह सांस्कृतिक अनुष्ठान था जबकि अंग्रजों ने फोर्ट विलिमय के माध्यम से अनुवाद का जो कार्य शुरू किया वह उपनिवेश की महत्वकांक्षी आवश्यकताएं थीं।

कोलकाता । महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय की ओर से नलिन मोहन सान्याल के 150 वें जन्म वर्ष के उपलक्ष्य में 'काव्यानुवाद की समस्याएं' विषय पर आयोजित सेमिनार को सम्बोधित करते हुए कवि, अनुवादक एवं प्रगतिशील वसुधा के सम्पादक राजेन्द्र शर्मा ने कहा कि अपने देश में अनुवाद का काम उस तरह होता है जैसे कोई पुरानी फिल्म के गीत को याद कर बाथरूम में गुनगुनाने की कोशिश करता है, जबकि इस काम को काफी गंभीरता से लिया जाना चाहिए। भारत में अनुवाद के इतिहास की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि दाराशिकोह ने काफी पहले उपनिषदों का अनुवाद करवाया था वह सांस्कृतिक अनुष्ठान था जबकि अंग्रजों ने फोर्ट विलिमय के माध्यम से अनुवाद का जो कार्य शुरू किया वह उपनिवेश की महत्वकांक्षी आवश्यकताएं थीं।

हमारा देश जैसी सांस्कृतिक विभिन्नताओ में जीता है वहां अनुवाद नैसर्गिक प्रक्रिया है। साहित्य का अनुवाद टीका या भाष्य नहीं होता। वह सांस्कृतिक प्रक्रिया का अंग होता है। सोवियत रूस की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि एक समय था जब उस देश ने अपने देश के तमाम साहित्य को दुनिया भर में प्रचारित प्रसारित करने के लिए व्यापक पैमाने पर अनुवाद करवाया था। अनुवाद के लक्ष्य कई बार भिन्न प्रकार के होते हैं।

कवि, गद्यकार और अनुवाद के क्षेत्र में महत्वपूर्ण कार्य कर चुके ओम भारती ने कहा कि कविता का अनुवाद किसी अन्य भाषा में हो ही नहीं सकता। वह मूल कविता की व्याख्या, पुनर्वव्याख्या होता है। शाब्दिक अर्थ बोध होता है। अनुवादक उसमें अपना आंशिक योगदान करेगा ही, जबकि मूल को मूल रहने देना एक बड़ी चुनौती होती है। अनुवादक अपने को इससे कैसे रोके यह बड़ी बात है। मूल भाषा के कवि की अभिव्यक्ति को उसी रूप में अक्ष्क्षुण रखना प्रायः संभव नहीं हो पाता। अनुवाद दरअसल प्रभावी ढंग का अंतरभाषिक संवाद होता है। अनुवाद के क्षेत्र में उन्होंने धर्मवीर भारती के संपादन में प्रकाशित विदेशी कवियों की कविताओं के अनुवाद के संकलन देशांतर का उल्लेख किया और उसे मील का पत्थर बताया। उन्होंने देशांतर की दूधनाथ सिंह लिखित और आलोचना में प्रकाशित समीक्षा को भी अनुवाद की समस्याओं को समझने और अनुवाद की संभावना को परखने के लिए लिहाज से महत्वपूर्ण करार दिया और उसे बीजमंत्र माना।

गायक, कवि एवं अनुवादक मृत्युजंय कुमार सिंह ने कहा कि एक भाषा से दूसरी भाषा में अनुवाद केवल शब्दानुवाद और भावानुवाद भर नहीं होता बल्कि उसके सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य को भी अभिव्यक्त करना होता है। उन्होंने हिन्दी की समृद्धि की चर्चा करते हुए कहा कि हिन्दी में उसकी बोलियों और अन्य भारतीय भाषाओं से हेलमेल और संस्कृत से सम्बद्धता के कारण जितने पर्यायवादी शब्द हैं दूसरी किसी भाषा में नहीं। नीलकंठ और कल्पतरू जैसे शब्दों का अंग्रेजी में अनुवाद बड़ी चुनौती है। उन्होंने कहा कि छंदबद्ध कविता के अनुवाद में इस बात भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि अनुवाद की गयी भाषा में भी छंद होता ताकि वह मूल भाव के करीब पहुंचे।

कवि प्रताप राव कदम ने कहा कि बुद्ध ने अपने शिष्यों से कहा था कि उनके वचनों को वे अपने अपने क्षेत्र की भाषा में प्रचारित प्रसारित करें जिससे अनुवाद की प्रक्रिया ने गति पकड़ी। उन्होंने कहा कि कवि को ही दूसरी भाषा की कविता का अनुवाद करना चाहिए। उन्होंने कहा कि गीतांजलि का हालांक रवीन्द्रनाथ टैगोर ने स्वयं अंग्रेजी अनुवाद किया था किन्तु उनके मूल्य बांग्ला कविताओं की बात कछ और है।

विख्यात बांग्ला साहित्यकार नवारुण भट्टाचार्य ने कहा कि अनुवाद मनुष्य को आपस में जोड़ने की सबसे सशक्त सांस्कृतिक प्रक्रिया है। यह काम होते रहना चाहिए इसके दोष तक ही जाकर ठहरें। मनुष्य के संवाद की शक्ति अनुवाद से बढ़ती है। शुद्धता पर जोर नहीं होना चाहिए। साहित्यकार व सन्मार्ग के उपसमाचार सम्पादक डॉ.अभिज्ञात ने कहा कि अच्छी कविता एक अर्थ प्रायः नहीं होती। कई बार किसी कविता का ठीक-ठीक एक अर्थ निकाल पाना ही मुश्किल हो जाता है, मुक्तिबोध की 'अंधेरे में' कविता उसका उदाहरण है। ऐसे में कविताओं के एकदम ठीक ठाक अनुवाद की बात सोचना कठिन है। एक ही कविता का जब उसी भाषा के लोग अलग अलग अर्थ निकालते हैं तो फिर दूसरी भाषा में उसके अनुवाद का क्या हाल होगा। कविता के अनुवाद में परफेक्शन की गुंजाइश कम होती है।

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहीं कवयित्री एवं अनुवादिका डॉ.चंद्रकला पाण्डेय ने कहा कि अनुवाद में सांस्कृतिक संदर्भों की चर्चा अवश्य की जानी चाहिए। उसका बिना अनुवाद कार्य अधूरा है क्योंकि एक भाषा के रीति रिवाज दूसरी भाषा से जुड़े लोगों के रीति रिवाज से अलग होते हैं ऐसे में रचना के मूल कथ्य के अनदेखे रह जाने का खतरा होता है। कार्यक्रम का संचालन विश्वविद्यालय के कोलकाता केन्द्र के प्रभारी डॉ.कृपाशंकर चौबे ने किया।

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