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वश चले तो इन दलाल पत्रकारों को गोली मार दूं

पत्रकारों का बुरा करने वाले पत्रकार ही हैं. अपना उल्‍लू सीधा करने के लिए दलाल टाइप के पत्रकार ही असली दोषी हैं पत्रकारों की बेरोजगारी के. दरअसल, ये दलाल टाइप के पत्रकार पहले एक फाइनेंसर को फांसते हैं. उसे ऊंचे-ऊंचे सब्‍जबाग दिखाते हैं. उसके बाद जब फाइनेंसर इनके झांसे में फंस जाता है तो ये दलाल टाइप के पत्रकार अपने साथियों को भरते हैं ताकि चैनल की हर खरीद-फरोख्‍त में माल कमा सकें.

पत्रकारों का बुरा करने वाले पत्रकार ही हैं. अपना उल्‍लू सीधा करने के लिए दलाल टाइप के पत्रकार ही असली दोषी हैं पत्रकारों की बेरोजगारी के. दरअसल, ये दलाल टाइप के पत्रकार पहले एक फाइनेंसर को फांसते हैं. उसे ऊंचे-ऊंचे सब्‍जबाग दिखाते हैं. उसके बाद जब फाइनेंसर इनके झांसे में फंस जाता है तो ये दलाल टाइप के पत्रकार अपने साथियों को भरते हैं ताकि चैनल की हर खरीद-फरोख्‍त में माल कमा सकें.

इनके साथी भी इन्‍हीं की तरह होते हैं, जिन्‍हें कोई 5000 में नहीं रखता उन्‍हें ये दलाल टाइप पत्रकार 20 से 30 हजार रुपये में चैनल में रखवाते हैं. हालांकि ये लोग चैनल लांचिंग के तीन से चार महीने बाद बाहर हो जाते हैं. इस बीच बेरोजगारी से जूझ रहे ईमानदार पत्रकार, जो पत्रकारिता को ही अपनी रोजी-रोटी का साधन मानते हैं, भी इन लोगों का हिस्‍सा बन जाते हैं. नतीजतन सैलरी और इनकम में भारी अंतर शुरू हो जाता है. ऊपर से चैनल को दिखने के लिए प्रसारण का खर्च. फाइनेंसर को जो सब्‍जबाग दिखाया जाता है, वो पूरा होता न देख फाइनेंसर भी अपना हाथ चैनल की ओर से हटा लेता है. यानी चैनल लावारिश हो जता है. फिर संजीवनी की तरह कुछ दिन के लिए एक जुगाड़ू बेरोजगार दिग्‍गज पत्रकार उस चैनल के साथ जुड़ जाता है. पूरी ईमानदारी से अपने पद पर काम करता है. लेकिन काफी जोड़-तोड़ के बाद भी वो सफल नहीं हो पाता है.

नतीजा ये है कि सर छुपाने के लिए पत्रकारिता को पेशा बनाने वाले फाइनेंसर पत्रकारिता को बुरा सपना समझकर हाथ जोड़ देते हैं. लेकिन उनके हाथ जोड़ने तक उस चैनल/संस्‍थान में बेरोजगारों की संख्‍या इतनी हो जाती है कि उसे बयान कर पाना मुश्किल होता है. इसके साथ पत्रकारिता में अपना भविष्‍य तलाशने वाले नौजवान पत्रकार भी इसका हिस्‍सा बन जाते हैं. स्थिति यह हो जाती है कि जिन पत्रकारों को दूसरों की समस्‍याओं को उठाकर उनका समाधान खोजने की कोशिश करना होता है, वे अपनी ही बात कहीं नहीं पहुंचा पाता है. बहुत पीड़ादायी बात है कि आज सैकड़ों पत्रकार इस तरह की स्थितियों से दो-चार होकर बेरोजगार हो रहे हैं. मैं भी पत्रकारिता से जुड़ने के बाद पिछले पांच सालों में कई बार बेरोजगारी से जूझ चुका हूं. मेरा बस चले तो मैं दलाल टाइप पत्रकारों को बीच चौराहे पर गोली मार दूं. जिसे मेरी बात बुरी लेगे माफ करेगा, ज्‍यादा बुरी लगे तो मिल लेगा, एक दूसरे का दर्द आदान-प्रदान कर लेंगे.

विक्रम श्रीवास्‍तव

पूर्व ब्‍यूरोचीफ

जनंसदेश एवं सीएनईबी

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
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