Abhishek Srivastava : कछुआ अगर खरगोश की गति से दौड़ना चाहे तो क्या होगा? वही, जो आज हमारे वरिष्ठ समाजवादी पत्रकार अरुण कुमार त्रिपाठी के साथ हुआ है 'जनसत्ता' अखबार में। कल चुनाव नतीजा आया और आज नतीजों पर उनका लेख छप गया। अरे भाई, ज़रा ठहर कर सोच लेते तो ब्लंडर से बच जाते।
देखिए, ''इन नतीजों के मायने'' शीर्षक वाले लेख के पहले पैरा में अरुण जी क्या कहते हैं, ''जो लोग इस चुनाव को नरेंद्र मोदी बनाम राहुल गांधी बनाकर देख रहे थे वे न सिर्फ जनता के साथ छल कर रहे थे बल्कि कॉरपोरेट नीतियों की जीत के लिए एक छद्म और मिथकीय लड़ाई का मंचन कर रहे थे।''
ठीक बात है। कोई दिक्कत नहीं।
अब तीसरा पैरा देखिए जो लेख का हाइलाइटर भी है, ''नरेंद्र मोदी बनाम राहुल गांधी की धारणा वाले इस चुनाव में निश्चित तौर पर मोदी की जीत और राहुल गांधी की हार हुई है। पर वह तो होनी ही थी…।''
अरे! वामपंथियों का तो नहीं पता, लेकिन लगता है समाजवादियों का बौद्धिक राडार इस बार जवाब दे रहा है। सब फेसबुक का असर है। अखबारी लेख में फेसबुक वाली जल्दबाज़ी से बचना चाहिए।
युवा पत्रकार अभिषेक श्रीवास्तव के फेसबुक वॉल से.






