उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री और बसपा सुप्रीमो मायावती की माया सच में निराली है। पहले लोगों को जाति के नाम पर बांटकर प्रदेश में सत्ता की कुर्सी पर कब्जा जमाए बैठी मायावती अब प्रदेश को चार भागों पूर्वांचल, अवध, बुंदेलखंड और पश्चिमी प्रदेश में बांटकर आगे भी सत्ता पर अपना कब्जा बरकरार रखना चाहती हैं। अब सवाल यह है कि विकास के नाम पर प्रदेश को बांटने के मायावती के फैसले से क्या सच में प्रदेशवासियों को लाभ होगा या सिर्फ अपने स्वार्थ के चलते बसपा सुप्रीमो प्रदेश का बंटाधार करने में लगी हैं।
2012 में होने वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से ठीक पहले मायावती द्वारा अचानक ही प्रदेश को चार भागों में बांटने की घोषणा से राजनीतिक सरगर्मिंयां भी तेज हो गयी हैं। सपा ने तो माया के इस फैसले का खुलकर विरोध किया है वहीं कांग्रेस और भाजपा भी इस फैसले को पचा नहींपा रहे हैं। पहले ही तेलंगाना आंदोलन का हल न निकाल पा रही केन्द्र सरकार के सामने भी एक नई चुनौती खड़ी हो गयी है।
मायावती का कहना है कि प्रदेश को बांटकर न सिर्फ विकास में तेजी आएगी बल्कि लोगों के जीवन स्तर में सुधार होगा। क्या मायावती का यह कथन सही है। अगर कुछ तथ्यों पर गौर करें तो विकास के नाम पर बंटवारे का फैसला सही नहीं है। अगर हम उत्तराखंड की बात करें जो कुछ सालों पहले उत्तर प्रदेश से ही अलग होकर नया साम्राज्य बना है तो क्या इसके सालों बाद भी उत्तराखंड में उस गति से विकास हुआ जैसा कि अलग प्रदेश की मांग कर रहे नेताओं ने बंटवारे के समय सपना दिखाया था। प्रशासनिक तौर पर भी उत्तराखंड का वह स्थान नहीं है जैसा कि होना चाहिए था।
एक रिपोर्ट के मुताबिक किसी भी नए प्रदेश के गठन में अनुमानत: कम से कम पचास हजार करोड़ की लागत आती है। इस प्रकार यूपी के चार हिस्से करने में कम से कम दो लाख करोड़ रुपये व्यय होंगे। सीधे तौर पर इतनी बड़ी धनराशि को सरकार ऐसे ही प्रदेश के विकास कार्यों में लगाऐ तो जाहिर है कि प्रदेश में वह सभी बातें हो सकती हैं जो मायावती चार टुकड़े करके करना चाहती हैं। हालांकि प्रदेश को विभाजित करने का मुद्दा पहली बार नहीं उठा है। इससे पहले समय-समय पर पूर्वांचल, बुंदेलखंड और हरित प्रदश की मांग उठती रही है लेकिन सही मायने में गौर किया जाये तो इन मांगों के पीछे कोई ठोस आधार न होने के कारण शायद यह मांग तेलंगाना जैसे आंदोलन का रूप नहीं ले पायी।
आंध्र प्रदेश से अलग करके तेलंगाना राज्य की जो मांग चल रही है कहींन कहीं इस आंदोलन के पीछे एक बहुत बड़ा आधार है कि सही मायने में वहां तेलंगाना की जरूरत है। अगर हम सम्पूर्ण देश की बात करें तो उत्तर प्रदेश, बिहार और काफी हद तक मध्य प्रदेश ऐसे राज्य हैं जो एक तरह से सेंट्रल इंडिया की धुरी हैं। अब अगर उत्तर प्रदेश के चार हिस्से होंगे तो सीधे-सीधे इसका असर देश की धुरी पर पड़ेगा और धुरी कमजोर हो जाएगी। हालांकि इस तथ्य को लेकर कई लोगों की राय भिन्न भी हो सकती है।
चुनाव करीब होने के चलते कांग्रेस और भाजपा भी मायावती के इस फैसले का खुलकर विरोध नहीं कर पा रही है क्योंकि समय-समय पर इनके द्वारा भी प्रदेश के बंटवारे की मांग उठाई गई है। मायावती की कैबिनेट ने भी यूपी को चार भागों में बांटने की मंजूरी दे दी है और मायावती ने कहा है कि इस प्रस्ताव को विधानसभा के इसी सत्र में सदन में लाया जाएगा। इससे पहले रविवार को मायावती के लखनऊ में ब्राह्मण भाईचारा सम्मेलन के दौरान सवर्णों को आरक्षण की मांग दोहरायी थी। एक दिन बाद सोमवार को मुस्लिमों को पार्टी से जोडऩे के लिए मदरसों के विकास हेतु ४५ करोड़ रुपये की धनराशि देने का ऐलान किया और तीसरे दिन मंगलवार को मायावती ने हैट्रिक लगाते हुए प्रदेश को चार भागों में बांटने की घोषणा कर कांग्रेस और भाजपा को गहरा झटका दिया है।
मायावती भले ही अपने इस चुनाव स्टंट को ब्रह्मास्त्र मान रही हों लेकिन इससे सही मायनों में प्रदेश की जनता कितनी लाभान्वित होगी यह सोचने वाली बात है। बजाए दो लाख करोड़ की धनराशि प्रदेश के बंटवारे में लगाने से अगर इसका उपयोग अधूरे पड़े विकास कार्यों, नई योजनाओं में किया जाए तो निश्चित ही इससे जनता, प्रदेश और देश सभी को लाभ पहुंचेगा।
लेखक अनुराग मिश्र दैनिक प्रभात, मेरठ में बतौर सब एडिटर कार्यरत हैं.





