अपनी रिपोर्टिंग के सिलसिले में कल यानी बुधवार को मेरी मुलाकात आंध्र के नेता और कांग्रेस की रातों की नींद उडाने वाले जगन मोहन रेड्डी की मां विजयम्मा से हुई। जगन के जेल में होने के चलते विजयम्मा वाईएसआर कांग्रेस पार्टी यानी वाईआएसआरसीपी की कार्यकारी अध्यक्ष भी हैं। पिछले दो दिनों से वह दिल्ली में आंध्र प्रदेश के विभाजन के खिलाफ राष्ट्रपति और सभी राजनीतिक दलों के नेताओं से मिलने आई थीं।
शायद आगामी दिनों के लिए राजनीतिक साथी तलाशने भी। बहरहाल, मेरी उनसे मुलाकात कुछ अजीब थी। होना ही था क्योंकि विजयम्मा सिर्फ तेलुगु जनती हैं। एक तेलुगु चैनल की पत्रकार ने मुझसे कहा कि वह उनसे बातचीत करके मुझे उनके ख्याल बता देगी। मेरी पास और कोई चारा भी नहीं था। अपने ईटीवी के दिनों में मैंने जो कुछेक तेलुगु शब्द सीखे थे उनके बल पर मैं बातचीत की दिशा समझने की कोशिश कर रही थी। लेकिन कुछ काम नहीं बना। तो मैंने विजयम्मा के व्यक्तित्व पर ध्यान देना शुरू किया।
यह तो साफ था कि अपने पति, वाइएस राजशेखर रेड्डी के जीवन काल में राजनीति में सीमित सक्रियता रखने वाली विजयम्मा को पति के हादसे में मौत और बेटे की गिरफ्तारी ने सीधे पार्टी की जिम्मेदारी लेने को बाध्य कर दिया था। खैर, जब विजयम्मा अपने बेटे व परिवार के साथ कांग्रेस नेतृत्व के छल-कपट, झूठ वगैरह का तेलुगु में विस्तार से बखान कर रही थीं तो मेरी नजर उनके लुक्स पर टिकी हुई थी। और क्या करती?
विजयम्मा ने अपने सांवले माथे पर खूब बडी सी सुर्ख लाल बिंदी लगाई हुई थी। उन्होंने कीमती सूती कपड़े की चौड़ी सुनहली बॉर्डरदार नारंगी रंग की साड़ी पहनी थी। उनकी कलाइयों में साड़ी से मैच करने वाली चमकदार नारंगी रंग की कांच की चूड़ियां थीं। मुझे याद आया हैदराबाद के बाजारों में ऐसी चूड़ियां खूब बिकती हैं। और तभी अचानक कार्टून के किरदारों की तरह मेरे भी दिमाग की बत्ती जल उठी।
मुझे लगा कि वाईएसआर की मौत को तो अरसा बीत चुका है। फिर यह सब कैसे? यहां यह बता देना शायद जरूरी है कि
विजयम्मा उन क्रांतिकारी महिलाओं में नहीं हैं जो फेमिनिस्ट दावे को पुष्ट करने के लिए समाज से पंगा लें। दरअसल, सचाई यह है कि दक्षिण का समाज पिछले बहुत सालों से इस सच्चाई या बदलाव को स्वीकार कर चुका है कि पति के दुनिया से चले जाने के बाद भी पत्नी अपने वैधव्य को प्रचारित करने के बजाय एक सामान्य पहनावा अपना सकती है और जो चाहे पहन-ओढ सकती है।
एक वाकया याद आया जब मेरे पूर्व सहयोगी प्रमोद चूंचूवार ने मुझे बताया था कि विदर्भ सहित महाराष्ट्र के कई इलाकों में भी महिलाओं ने इस बदलाव को लाया था और यहां तक दावा किया था कि वह पति के देहावसान के बाद भी सुहाग की निशानियों को अगर चाहें तो त्याग न करें क्योंकि उनके पति उनके मन में हैं, उनका आत्मिक रिश्ता बरकरार है। यह गूढ फलसफा है, इस पर बहस हो सकती है। लेकिन ध्यान देने वाली बात यह है कि यह सब गांव-देहात की महिलाएं थीं। मेरी मित्र निस्तुला ने बताया कि उसके गृह प्रदेश कर्नाटक में भी यह बदलाव दशकों पहले आ चुका है।
स्वाभाविक था मेरे दिमाग में उन सब महिलाओं की तस्वीर कौंध गई जो हमारे समाज में अपने पति को खो देती हैं। खास तौर पर जिनके साथ बेहद कम सम्र में ही ऐसा हादसा हो जाता है। बेशक, अब हमारे समाज में भी रंगीन कपड़ों पर रोक नहीं है लेकिन क्या वे सचमुच अपनी इच्छा से पहन ओढ सकती है? सवाल सुंदर या आकर्षक दिखने का नहीं है। वैसे भी मुझे उनमें से किसी के आकर्षण में कोई अंतर नहीं दिखा। मगर सवाल समाज के दबाव से, तानों के भय से अपनी इच्छाओं को
दमन करने का है। और एक या दो दिन या कुछ महीने नहीं, पूरी जिंदगी।
विजयम्मा से मिलने के बाद एक ही सवाल घूम रहा है, नॉर्थ में कब आएगी यह समझ?
लेखिका स्मिता मिश्रा वरिष्ठ पत्रकार हैं. ईटीवी, दैनिक भास्कर, दैनिक हिंदुस्तान समेत कई अखबारों-चैनलों में वरिष्ठ पद पर काम करने के बाद इन दिनों दक्षिण भारत के अंग्रेजी अखबार 'मेट्रो इंडिया' की दिल्ली ब्यूरो चीफ हैं. उनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है.






