Sanjeev Chandan : साजिश पर गौर करें ……… पढ़ें कि कैसे होती हैं अवैध गिरफ्तारियां …. और एकजुट हों कि साहित्य और अकादमी जगत में गुंडागर्दी फिर सर न उठाने पाए.. २७ जुलाई (शनिवार) को Rajeev Suman को फोन आता है, ‘बांदिले बोल रहा हूँ, आपके केस का जांच अधिकारी, रेलवे स्टेशन आ जाओ आप या मैं आऊं आपके घर?’ राजीव ने कहा कि ‘आता हूँ’ और मुझे फोन लगाया.
सुबह-सुबह मेरा फोन स्विच ऑफ था, अपने वकील से बात की उसने. फिर बांदिले को काल बैक किया और पूछा की क्या काम है. बांदिले ने बताया कि वह उसे (राजीव) कुछ सलाह देना चाहता है, केस के सिलसिले में. राजीव ने कहा, ‘फोन पर दीजिए, मैं आ नहीं सकता. बंदिले ने धमकी दी, ‘तो मैं आता हूँ.’. राजीव ने कहा ठीक है, ‘आप अपना काम करिए और मैं अपना.’
राजीव को झांसा देने की अपनी कोशिश में विफल ‘बंदिले साहब’ पांच लोगों के साथ राजीव के घर पहुंचे 1 बजे के करीब. तब तक राजीव और मेरा संपर्क हो चुका था. हम वकील के यहाँ पहुँच गए थे. घर पर राजीव की पत्नी ने उनका स्वागत किया, पानी पिलाया. सादे ड्रेस में पुलिस वालों ने फिर धमकी दी, सलाह दी, ‘कब तक भागेगा हम पकड़ ही लेंगे’. फिर मुझे धमकी भिजवाई कि उन्हें पता है कि मैं दिल्ली में ही हूँ, हाईकोर्ट के फैसले से कुछ नहीं होने वाला, हम जल्द ही उसको पकड़ेंगे.’ आस-पास के लोगों के पास उन्होंने अपना नंबर छोड़ा और चले गए .
अब जरा गौर करें
विभूति राय आईपीएस हैं , वर्धा का एसपी भी. विभूति भूमिहार हैं, वर्धा का एसपी भी. बड़े दिल से उन्हें सैल्यूट करते हैं जनाब, खून का रंग गाढ़ा होता है. इन दोनों की साजिश और प्लानिंग किस तरह कानूनों की धज्जियाँ उड़ा रहा है, उस पर भी गौर करें …… वे हमें पुलिसिया धौस में लेना चाहते हैं. राजीव ने दारोगा कुलपति के खिलाफ वर्धा कोर्ट से फर्जी मायग्रेशन देने के लिए धारा ४२०, ४६८ के तहत मुकदमा दर्ज करा रखा है. जिसके बाद विभूति ने भी अपने जातिबंधु पुलिस कप्तान के सहारे मुकदमा दर्ज कराया. नियम है कि कोई भी मुकदमा, जो थाने में दर्ज होता है २४ घंटे के अन्दर सीजेएम कोर्ट में भेज दिया जाता है. यह प्रावधान इसलिए किया गया है कि पुलिस अपनी मनमानी न करे और जांच के मामले में कोई भी गिरफ्तारी अदालत की नजर में हो.
राजीव ने २०१२ में मुकदमा दर्ज होने के दो सप्ताह बाद सी जीएमकोर्ट में एफआईआर की कॉपी निकालने का आवेदन किया था, जिसमें लिखित जवाब मिला कि ऐसा कोई एफआईआर कोर्ट नहीं पहुंचा है. अभी जब पुलिस की टीम दिल्ली आई थी, तो भी वर्धा में एफआईआर की कॉपी निकालने की कोशिश की गई तो थाने और सीजेएम दफ्तर से यह पता चल रहा है कि इसकी कॉपी आज भी कोर्ट नहीं पहुंची है. यहीं से साजिश की बात स्पष्ट हो जाती है, पुलिस के उच्च पदों पर पहुंचा दारोगा कुलपति और उसका बिरादरी भाई 'वर्धा एसपी' की संयुक्त साजिश. दरअसल दारोगा कुलपति ने राजीव के द्वारा अपने ऊपर कोर्ट से मुकदमा दर्ज होने पर अपनी जमानत अर्जी लगाई थी कोर्ट में, फिर उसे आगे चलकर वापस ले लिया, इस निवेदन के साथ कि आगे कभी वह जमानत लेगा. और पुलिसिया टैक्टिस के तहत राजीव पर काउंटर एफआईआर करके थाने में ही रख लिया गया. यानी राजीव को कभी बाध्य कर मुकदमा सेटल करने का प्लान. अब विभूति रिटायर हो रहे हैं, इसलिए इस मामले को निपटाने के लिए पुलिस भेजी दिल्ली, ताकि राजीव पर धौंस डाला जा सके. किसी राज्य में, जब पुलिस ऐसी गिरफ्तारियों के लिए दूसरे राज्य से आती है तो सम्बंधित थाने में सूचित करके और अपने साथ स्थानीय पुलिस प्रतिनिधि को लेकर ही छापे मारती है. राजीव के घर जाने के पहले वर्धा से आई टीम इस नियम का भी उल्लंघन करके आई थी .
मानवधिकार के जानकारों को खूब पता होगा कि पुलिस कैसे फर्जी गिरफ्तारियां, फर्जी कंफाइनमेंट करती है, जब आप पिछले डेढ़ सालों से एफआईआर कोर्ट नहीं भेज पाए हैं तो आपके पास खूब तरीका है इस तरह की गिरफ्तारियों का ….. अभी शुक्रवार में एक खबर छपी है कि कैसे दिल्ली पुलिस ने एक आदमी को अलग–अलग नामों से अलग–अलग मामलों में जेल में डाल दिया था. Colin Gonsalves की मदद से वह बाहर आ सका, दिल्ली के कमिश्नर को माफ़ी मांगनी पड़ी, मुआवजा देना पड़ा. पुलिसिया कुलपति और उसके प्रति श्रद्धान्वित एसपी ने यही साजिश रची राजीव को फर्जी तरीके से गिरफ्तार करने का, ताकि विभूति राय को राजीव के मुक़दमे से मुक्ति दिलाई जा सके. इस मामले में महाराष्ट्र सरकार को जांच करनी चाहिए. इस एसपी की निगरानी में एफआईआर में छेड़छाड़ सहित कई मामले पहले भी वर्धा में प्रकाश में आये थे .
Umashankar Singh, भाई आपने आह्वान किया था कि राजीव के लिए सारे साहित्यकार-मानवाधिकारवादी सामने आयें. यह समय है कि महाराष्ट्र के गृहमंत्री को हम सब मिलें और इस मामले की जाँच करवाएं और दोषी पुलिस अधिकारियों पर कारवाई करवाएं, दारोगा कुलपति की गिरफ्तारी सुनिश्चित कराएं. उमा भाई आप इनिशिएशन लें. समय मांगें गृह मंत्री से, रामदास जी आठवले से मिलें, उनकी पार्टी के हमारे मित्रों ने सहयोग का आश्वासन दिया है……! हम दारोगा कुलपति के मंसूबों को कामयाब न होने दें. और साहित्यकारों! कृपया इस पुलिसिया कुलपति के काले कारनामों को देखते हुए इसका बहिष्कार करें. हालांकि मुझे पता है कि उनके अंधभक्त साहित्यकार, उनसे हिस्सा लेने वाले साहित्यकार इसके बाद मुझे ब्लाक करेंगे फेसबुक पर….. उनके कदम का स्वागत! क्या साहित्य और अकादमी जगत की इस गुंडागर्दी के खिलाफ एकजूट होना हमारा फैसला नहीं होना चाहिए …..!!
संजीव चंदन के फेसबुक वॉल से.






