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विसर्जन यात्रा के दिन दारू की दुकानें बंद रखने समेत कई मांगों पर प्रशासन और कोर्ट ने निराश किया

Anil Kumar Singh : बीते वर्ष फैजाबाद में दुर्गा प्रतिमा विसर्जन यात्रा के दौरान दारू पिए अराजक भक्तों ने मुसलमानों पर हल्ला बोल दिया था. एक दो हत्याएं हुईं. बड़े पैमाने पर आगजनी हुई थी. तत्कालीन प्रशासन मूक दर्शक बना रहा था. इस बार इसकी पुनरावृत्ति न हो इसलिए मैंने और मेरे साथियों कॉम दिनेश, उमाकांत विश्वकर्मा, कमलेश यादव व वरिष्ठ पत्रकार कृष्ण प्रताप सिंह ने जिलाधिकारी को ज्ञापन देकर मांग की थी कि विसर्जन यात्रा के दिन दारू की दुकानें बंद रहें. माइक से शोर कम हो तथा उससे गत वर्ष की भांति विषैले भाषणों का प्रसारण न होने पाए.

Anil Kumar Singh : बीते वर्ष फैजाबाद में दुर्गा प्रतिमा विसर्जन यात्रा के दौरान दारू पिए अराजक भक्तों ने मुसलमानों पर हल्ला बोल दिया था. एक दो हत्याएं हुईं. बड़े पैमाने पर आगजनी हुई थी. तत्कालीन प्रशासन मूक दर्शक बना रहा था. इस बार इसकी पुनरावृत्ति न हो इसलिए मैंने और मेरे साथियों कॉम दिनेश, उमाकांत विश्वकर्मा, कमलेश यादव व वरिष्ठ पत्रकार कृष्ण प्रताप सिंह ने जिलाधिकारी को ज्ञापन देकर मांग की थी कि विसर्जन यात्रा के दिन दारू की दुकानें बंद रहें. माइक से शोर कम हो तथा उससे गत वर्ष की भांति विषैले भाषणों का प्रसारण न होने पाए.

केन्द्रीय दुर्गा पूजा समिति से अमन और शांति के सन्दर्भ में हलफनामा लिया जाये. शहर में पुलिस के साथ अर्धसैनिक बल की तैनाती हो. इस ज्ञापन का कोई उत्तर न मिलने पर मैंने माननीय उच्च न्यायलय की लखनऊ बेंच में जनहित याचिका की थी. १० अक्टूबर को इस पर सुनवाई हुई तो जज साहबान ने इस याचिका के नोबल उद्देश्यों के तारीफों के पुल बांधने के बावजूद इस बिना पर आदेश करने से मना कर दिया कि सिविलियन को प्रशासन को निर्देश देने का अधिकार नहीं. इसलिए उनके हाथ भी बंधे हुए हैं. हालाँकि एक ही संतोष की बात है की माननीयों ने याचिका ख़ारिज नहीं की. पेंडिंग में डाल दिया. यानि की दुर्भाग्यवश अगर कोई दुर्घटना होती है तो हम लोगों के कोर्ट जाने का रास्ता खुला हुआ है. लेकिन सिविलियन अगर जिलाधिकारी से निवेदन नहीं कर सकता और कोर्ट में याचना नहीं कर सकता तो करे क्या?

अनिल कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से.

आशीष देवराड़ी : रतनगढ़ माता पर करीब सत्तर मर गए, सैकड़़ों घायल हो गए. एक ऐसे हादसे में जिसे आसानी से टाला जा सकता था मानवीय मौत क्रोध पैदा करती हैं. मुझे इस बात को कहने में कोई संकोच नहीं कि अब सार्वजनिक जगहों को आस्था के प्रकटीकरण के लिए प्रतिबंधित कर देना चाहिए.

आस्था जब व्यक्तिगत मामला है तो उसका सार्वजनिक प्रदर्शन कहीं से भी जायज नहीं ठहराया जा सकता. सार्वजनिक जगह का इस्तेमाल धर्म आस्था से परे समुचित मानव हित में होना चाहिए. ऐसा करना लोकतंत्र की धर्मनिरपेक्ष भावना के अनुकूल भी होगा.

आशीष देवराड़ी के फेसबुक वॉल से.

Pahad Ki Dada: Hill Mail Uttarakhand
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