Santosh Singh : आज वीपी सिंह की पुण्यतिथि है…उनको उनकी पुण्यतिथि पर सादर नमन… केवल इतना लिख दूँ तो कई लोग नहीं समझेंगे.. क्योंकि उनको अन्य दूसरे लोगों की तरह मैंने भी शुरू में नहीं समझा था..1992 के शुरुआती दिन थे. मैं गाँव से मैट्रिक करके आगे की पढाई के लिए इलाहाबाद आया था. तब मंडल आयोग लागू ही हुआ था और दिल्ली के साथ इलाहाबाद भी उन दिनों मंडल आयोग द्वारा लागू आरक्षण के विरोध के आन्दोलन का केंद्र था..
जिधर देखो, धरना-प्रदर्शन और वीपी सिंह को गाली देने वाली सभा दिखाई देती थी..चारो ओर बड़ा ही डिप्रेसिंग माहौल था…हम जैसे किशोर छात्रों के मन में यह बात घर कर गयी थी कि अब हमारा अब कोई भविष्य नहीं है क्योंकि हमारे सीनियर हमे ऐसे ही समझा रहे थे….इसी चक्कर में मैंने एक साल ड्राप भी कर लिया था.. बाद के दिनों में जब पूरी बात वृहत्तर समाजिक परिप्रेक्ष्य में समझ में आई तो लगा कि यह लिखना जरूरी है..
आज कई लोग कागजी/जबानी क्रांति की बात करते है पर उनसे आरक्षण या भागीदारी पर स्पष्ट सवाल पूछिए तो कन्नी काटते नजर आते हैं और उनसे पूछिए कि क्या वह बाबा साहब अम्बेडकर या वी पी सिंह को एक क्रन्तिकारी के रूप में मानते हैं तो निश्चित रूप से उनका जवाब नहीं होगा… जबकि मेरी दृष्टि में आंबेडकर और वीपी सिंह दोनों ऐसे क्रन्तिकारी थे जिन्होंने सदियों से वंचित आबादी के लिए मुख्यधारा के बंद दरवाजे को एक झटके में तोड़ दिया था…देश का टैलेंट-बेस जो पहले 15-20% से आ पाता थी, उसका परसेंटेज एकाएक बढ़ गया…देश की एक बड़ी आबादी जो अपने को मार्जिनलाईज्ड समझती थी, अपने को देश के लोकतंत्र का अभिन्न अंग समझने लगी..जो कि हरेक दृष्टि से एक क्रन्तिकारी घटना थी…
देश के एक इमानदार नेता और समाजिक न्याय के पुरोधा को पुनःनमन…और इस मौके पर यही आशा करूँगा कि शायद कभी उनको इस बात के लिए श्रेय और प्रशंसा भी मिलें, जितनी कभी गलियाँ मिली!
संतोष सिंह के फेसबुक वॉल से.





