मेरी कोशिश होती थी कि हमारा सूर्योदय किसी वोटर के दरवाजे पर ही हो। इतनी सुबह न चाय की उम्मीद की जा सकती थी और न पानी की। वोटर आपसे सीधे मुंह बात कर ले, यही बहुत था। एक दिन सुबह-सुबह बभनडीहा पहुंच गया। दुर्गा प्रसाद गुप्ता जी के दरवाजे पर। घर पर नहीं थे। खेत की मेढ़ पर खड़ा होकर ट्रैक्टर से खेत जुतवा रहे थे। गेहूं बुआने का समय था।
वह एक ट्रैक्टर के मालिक भी थे। दिन भर से जितना अधिक खेत जोतेंगे, उतनी ही आमदनी। इसलिए वह जल्दी से जल्दी अपना खेत जोतकर चालक को दूसरे का खेत जोतने के भेजना था। मेरी उपस्थिति उन्हें खल भी रही होगी। फिर भी थोड़ा समय उन्होंने निकाला। उन्होंने अपनी विवशता जतायी। आप भी अपने आदमी हैं। जफर अंजूम भी मेरे गांव का है और मनोज कुमार सिंह का भी दबाव है। उनकी भावह पंचायत सचिव हैं और मेरे भाई सरपंच हैं। कोई आश्वासन नहीं दे सकता हूं। आप जनसंपर्क करते रहिए।
बभनडीहा मुसलमानों का गांव है। मैंने मान लिया था कि यहां से हमें कोई वोट नहीं मिलेगा, इसलिए इस गांव में समय देना बेकार है। लेकिन उस दिन मुझे लगा कि वोट मिले या न मिले, लोगों से जरूर मिलूंगा। गलियों से होता हुआ मस्जिद के पास पहुंचा। वहां एक मैदान है और वहीं उत्क्रमित मध्य विद्यालय भी है। गांव के दोनों बूथ यहीं हैं। मैदान में एक पेड़ कट कर गिरा हुआ था। उस पर बैठकर लोग बातचीत कर रहे थे। निश्चित रूप से चर्चा का विषय चुनाव ही था। मैंने उन लोगों से बातचीत का क्रम शुरू करते हुए कहा कि मैं भी मुखिया का उम्मीदवार हूं। मेरा घर डिहरा है। आपके गांव से भी दो लोग उम्मीदवार हैं। हम तीसरा उम्मीदवार हैं। वोट मांगने आया हूं। इस बीच कई लोग जमा हो चुके थे। लोग नाम व गांव से पहले परिचित थे। आज उम्मीदवार स्वयं उनके सामने था। बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ। बारी-बारी से सबका नाम, शिक्षा, व्यवसाय आदि की जानकारी ली। कुछ लोगों से पारिवारिक बातचीत भी हुई।
मैंने कहा कि हम आपके बीच वोट मांगने आए हैं। अपने तर्क भी दिए। इस गांव में पहली बार मुस्लिम परिवारों के साथ मैं रू-ब-रू हो रहा था। लेकिन बातचीत में कहीं मुस्लिम मुद्दा नहीं था। रोजी-रोजगार, शिक्षा, भविष्य सबकी चिंता थी। मुखिया जी से उन्हें कोई उम्मीद नहीं थी। क्योंकि नाली, गली, सोलर लाइट से लेकर इंदिरा आवास। यही सीमा है मुखिया जी की। लेकिन युवाओं की समस्या असीम हैं। कोई रोजगार के लिए स्कूल चलाता है तो कोई दिल्ली में काम करके परिवार का भरण-पोषण करता है। उसी गांव के मुखिया के उम्मीदवार जफर अंजूम भी एक स्कूल संचालित करते थे। स्कूल से छुट्टी होने के बाद चुनाव-प्रचार में जुट जाते थे।
स्कूल के पास ही उम्मीदवार अंजुम जी का घर था। सोचा उनसे भी मिल लिया जाए। वोट तो नहीं देंगे, कम से कम बातचीत हो जाए। अब तक सिर्फ फोन पर ही बातचीत होती थी। घर के दरवाजे पर आवाज लगायी। उनके भाई आये और उन्होंने कहा कि अभी वे स्कूल गए हुए हैं। उनके मकान के आगे एक जगह कुछ लोग बैठे थे। उनसे बातचीत करने की कोशिश की। उन्होंने बातचीत को लेकर रुचि नहीं दिखाई। मैं आगे गया। एक-दो युवक एक जगह खड़े होकर बातचीत कर रहे थे। उनसे बातचीत शुरू की। अपने बारे में बताया, उनके बारे में जानकारी ली।
तब तक एक उम्मीदवार इरशाद जी वहां पहुंच गए। उन्होंने बड़े गर्मजोशी के साथ मिलाया और कहा कि वीरेंद्र जी, पत्रकार भी थे। अब तक मैं उन्हें पहचान नहीं पाया था। लेकिन ज्यों ही मेरा परिचय पत्रकार के रूप में कराया, उनके चेहरा सामने
आ गया। उनसे एक बार भेंट हुई थी। जब मैं पहली बार बभनडीहा पंचायत से उपचुनाव लड़ने को लेकर इस गांव में आया था, तो वह पहले व्यक्ति थे, जिनसे मेरी मुलाकात हुई थी। उस समय मेरे साथी ब्रजेश द्विवेदी ने उनसे मेरा परिचय कराया था और बताया था कि इनकी पत्नी दो बार पंचायत समिति सदस्य रह चुकी हैं। तब उन्होंने मुखिया के लिए हो रहे उपचुनाव में खड़े होने का निर्णय नहीं लिया था। वास्तविकता यह थी कि मुखिया उपचुनाव के लिए पंचायत में मैं पहली बार दौरा शुरू किया था और लोगों से इस संबंध में चर्चा शुरू की थी। यह सिलसिला निरंतर जारी रहा।
(जारी)
लेखक वीरेंद्र कुमार यादव बिहार के वरिष्ठ पत्रकार हैं. हिंदुस्तान और प्रभात खबर समेत कई अखबारों को अपनी सेवा दे चुके हैं. फ़िलहाल बिहार में समाजवादी आन्दोलन पर अध्ययन एवं शोध कर रहे हैं. इनसे संपर्क [email protected] के जरिए कर सकते हैं.
इसके पहले के भागों के बारे में पढ़ने के लिए क्लिक करें : वीरेंद्र यादव की चुनाव यात्रा






