चुनाव को लेकर अपने स्तर पर हम अधिकतम लोगों से संपर्क बनाकर आधार बढ़ाना चाह रहे थे। इसके लिए स्थानीय नेता और पदाधिकारियों के साथ निरंतर संपर्क बनाए हुए थे। हमारा मानना था कि ये लोग वोट नहीं दिलवा सकते हैं, लेकिन माहौल बनाने में सहायक बन सकते हैं। इस क्रम में पूर्व विधायक, पार्टियों के पदाधिकारी व ब्लॉक स्तर के अधिकारियों से स्थानीय समीकरण के संबंध में जानकारी लेते रहे थे। प्रखंड में एक मात्र पंचायत में उपचुनाव हो रहा था। इस कारण चुनाव काफी महत्वपूर्ण हो गया था। इसमें सबकी रुचि थी। पत्रकार के नाम पर संपर्क बनाने में काफी सहूलियत होती थी।
इस क्रम में हमारी मुलाकात माले नेता व ओबरा प्रखंड के उपप्रमुख मुनारिक राम से हुई। उन्होंने कहा कि हमारी पार्टी कोई उम्मीदवार नहीं देगी। अभी तक पार्टी ने किसी को समर्थन देने का वादा नहीं किया है। इस संबंध में आप पूर्व विधायक राजाराम सिंह व जिला सचिव अनवर हुसैन से बातचीत कर लीजिए। मैंन तुरंत राजाराम सिंह को फोन किया और अपनी इच्छा से अवगत कराया। उन्होंने कहा कि अभी हम बिहार से बाहर हैं और लौटने पर मिलते हैं। बाद में उनसे मुलाकात नहीं हो सकी। लेकिन फोन पर बातचीत होती रही। पूर्व विधायक सत्यनारायण सिंह से बातचीत की। वर्तमान विधायक सोमप्रकाश सिंह से भी बात हुई। उन्होंने कहा कि इच्छा है तो लड़ लीजिए।
जदयू के विधान सभा प्रत्याशी रहे प्रमोद चंद्रवंशी से बातचीत की। उन्होंने कहा कि हम स्थानीय चुनाव में नहीं पड़ना चाहते हैं। जिला परिषद की ओबरा पश्चिम सीट से चुनाव लड़ चुकी सरोज देवी से बातचीत थी। मेरी अपनी पंचायत डिहरा व बभनडीहा दोनों जिला परिषद की ओबरा पश्चिम सीट के तहत ही आती हैं। उन्होंने अपने पराजय की गाथा सुनायी और कहा कि चुनाव काफी टफ है। इसी क्रम में मैं दाउदनगर जाकर माले के जिला सचिव अनवर हुसैन से बातचीत की। उन्होंने भी चुनाव लड़ने के कारण, जीत की संभावना और इससे जुड़े पहलुओं पर चर्चा की। लेकिन समर्थन के संबंध में कोई आश्वासन नहीं दिया। जदयू के जिलाध्यक्ष विश्वनाथ सिंह हमारे ही पंचायत के हैं। उनसे बातचीत भी की। इसके अलावा भी विभिन्न पार्टियों के प्रखंड अध्यक्षों व प्रखंड स्तरीय नेताओं के संपर्क में निरंतर बना रहा।
अधिकारियों के बीच अपनी पहचान मजबूत करने की कोशिश की। प्रखंड विकास पदाधिकारी देवेंद्र कुमार, अंचलाधिकारी अनिल कुमार चौधरी, कल्याण पदाधिकारी संजय कुमार, प्रखंड कृषि पदाधिकारी ललित किशोर चौबे, थानाध्यक्ष मनोज सिंह आदि भी संपर्क किया। उन लोगों से प्रशासनिक प्रक्रिया के संबंध में जानकारी ली। मेरी मुख्य चिंता थी कि क्या दूसरे पंचायत में जाकर भी चुनाव लड़ा जा सकता है। इस संबंध में अधिकारियों ने बताया कि प्रखंड सीमा के अंदर किसी भी पंचायत से मुखिया का चुनाव लड़ा जा सकता है। इस संबंध में अधिकारियों ने कई उदाहरणों से हमारी आशंकाओं का समाधान किया। नौकरी को लेकर भी आशंका थी। क्या नौकरी करते हुए हम चुनाव लड़ सकते हैं। अधिकारियों ने बताया कि प्राइवेट नौकरी करने को लेकर कोई बंदिश नहीं है। सरकारी नौकरी में रहते हुए आप चुनाव नहीं लड़ सकते हैं।
तीसरी आशंका थी बच्चों को लेकर। नगर निकायों में दो से अधिक बच्चों वालों के चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध है। हमारी तीन संतानें हैं। इस आशंका के समाधान के लिए राज्य निर्वाचन आयोग के पूर्व सचिव रघुवंश प्रसाद सिन्हा को फोन किया। उन्हीं के कार्यकाल में यह कानून बना था। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह कानून सिर्फ नगर निकायों के लिए है। पंचायत निकायों के लिए संतान की कोई बंदिश नहीं है। इस प्रकार हमारी कई आशंकाओं का समाधान हो गया। लेकिन फिर चैन नहीं थी। ओबरा आने के बाद अधिकारियों से मुलाकात करने की कोशिश करता था और फिर चुनाव को लेकर गपशप भी होती थी। इस दौरान कई स्थानीय राजनीतिक कार्यकर्ताओं से मुलाकात हो जाती थी। उनसे स्थानीय समीकरणों को समझने में सहायता मिलती थी। गांव की भूमि आधिपत्य को समझने के लिए गांव के कृषि सलाहकार दिनेश कुमार से मुलाकात की। वह मेरे ननिहाल गिजना का था। उसने जातियों के हिसाब से जमीन की भागीदारी के संबंध में बताया। उसने गांव के जातीय संबंधों और उसके आलोक में होने वाले राजनीति समीकरणों के बारे में भी बताया। उसने पंचायतों में कृषि सलाहकारों की भूमिका और किसानों को उनसे मिलने वाले लाभ के बार में भी बताया।
(जारी)
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वीरेंद्र यादव की चुनाव यात्रा (एक) : बभनडीहा की पहचान हैं जगतपति कुमार
वीरेंद्र यादव की चुनाव यात्रा (दो) : उपचुनाव की घोषणा की थी प्रतीक्षा






