हमारी यह कोशिश रहती थी कि वोटरों के साथ संबंध प्रगाढ़ बनाया जाए। इसका सबसे मजबूत तरीका था साथ में खाना। इसका दो लाभ था। पहला यह कि हम वोटरों से जुड़ते थे और दूसरा लाभ था कि हमें खाने के लिए पंचायत से बाहर ओबरा नहीं जाना पड़ता था। इसकी शुरुआत हुई हरि चौधरी के घर से। उनकी पत्नी सविता देवी वार्ड संख्या नौ की वार्ड पार्षद हैं। मैं सुबह-सुबह गया से ओबरा आया और वहां से पुनपुन को लांघ कर कुराईपुर पहुंचा।
हमें गौरीशंकर सिंह से मिलना था। लेकिन वे घर में नहीं थे। फिर मैंने लोगों से पूछा कि वार्ड के पार्षद कौन हैं। लोगों ने बताया कि हरि चौधरी वार्ड पार्षद हैं। हरि चौधरी के घर पहुंचा। आवाज दी। वे घर से बाहर आए। मैंने अपना परिचय दिया और बताया कि हम आपकी पंचायत से चुनाव लड़ना चाहते हैं। उन्होंने घर के अंदर बुलाया और छत पर ले गये। वह वहीं धान पीट रहे थे। छत पर धान बिखरा हुआ था। ठंड का महीना था। धूप अच्छी लग रही है। उन्होंने वहीं बोरा पर बैठने का आग्रह करते हुए कहा कि अब खाने का समय हो गया है। खाना बन गया है और खाकर जाइएगा। मैं ना नहीं कर सका। खाना के बाद फिर दूसरी जगह जनसंपर्क निकल गया।
जनसंपर्क में ऐसा भी समय आया जब हमें अपने प्रतिद्वंद्वी के घर खाना खाने पड़ा। कुराईपुर के मनोज सिंह ने नामांकन किया था। नामांकन हम भी कर चुके थे। दोपहर का समय था। भूख लगी थी। ओबरा जाकर खाना संभव नहीं लग रहा था। मनोज सिंह का भाई सरोज से अच्छा संपर्क हो गया था। सोचा, चलो सरोज के यहां खाते हैं। घर का पता पूछते हुए सरोज के यहां पहुंचे। दो-तीन लोग घर के पास खलिहान में बैठे थे। उसमें सरोज भी थे। उन्होंने दूर से देख लिया। करीब पहुंचे। चौकी पर बैठने को कहा। फिर परिचय कराया है कि ये हैं मनोज भइया। यानी चुनावी जंग का प्रतिस्पर्धी। बातचीत हुई। लेकिन इस बात की आशंका भी कि कहीं यह दुष्प्रचार न कर दिया जाए कि दोनों यादव उम्मीदवार समझौता कर लिया है।
मैंने पूछा, खाना-वाना बना है कि नहीं। आज आपके यहां ही खाएंगे। फिर उनके पिताजी महावीर बाबू भी आ गए। फिर इधर-उधर की बात होने लगी। थोड़ी देर बाद हम खाने के लिए आंगन में गए। हम और सरोज बैठे थे। बातचीत हुई। लेकिन इस दौरान कोई राजनीतिक बातचीत नहीं हुई। हालांकि सरोज ने इतना जरूरत कहा कि पोलिंग एजेंट या काउंटिंग एजेंट हम लोग मिलजुल कर व्यक्ति को रखेंगे ताकि किसी भी प्रकार की धांधली को रोका जा सके।
चुनाव प्रचार के दौरान एक दोपहर में तेज भूख लग गई। सवाल यह था कि अब खाना कहां खाएं। होटल में जाने में काफी समय निकल जाता। अब भरोसा जाति का था। जिनके यहां बैठा, वह लोग स्वाजातीय थे। मैंने कहा कि आज खाना आपके घर ही खाएंगे। हालांकि उस बिगहा पर तेली, मल्लाह, पासवान, कहार समेत कई जाति के लोग थे। लेकिन सामाजिक ढांचा में किसी यादव के घर से खाना मांग कर खाना सहज था। जबकि उसी सहजता से दूसरी जाति के यहां खाना मांगना संभव नहीं था। उसी बिगहा के एक व्यक्ति चुनाव को लेकर काफी खफा थे। उन्होंने कहा कि वोट मांगने सब आते हैं, लेकिन जीतने के बाद कोई काम नहीं करता है। उनके भाषण को बीच में काटते हुए मैंने कहा, हमरा भूख लगल हे। घर में खाए ला बनल है। हालांकि वह खिलाने के पक्ष नहीं थे। फिर भी मैं जबरदस्ती कहा कि आपके यहां ही खाना खाएंगे। आखिरकार खिलाने को तैयार हुए। फिर उनके यहां ही खाना खाया।
चुनाव प्रचार के दौरान रामलगन बिगहा गया। वह पासवानों का बिगहा है। वहां भी दोपहर हो गई थी। धान काटकर आर्इं महिलाएं घर के बाहर एक जगह बैठी थीं। मैंने उनसे कहा कि आज खाना आपके यहां खाएंगे। उस गांव में एक महिला की नैहर हमारे गांव डिहरा में है। इस बीच गपशप हो रहा था कि एक बूढ़ी महिला लोटा में पानी लेकर आइं और कहा कि चला बाबू खा ल। हम हाथ धोकर उनके साथ उनके आंगन में चले गये। वह वार्ड पार्षद विश्वकर्मा पासवान की मां थीं। खाने के दौरान गांव-समाज को लेकर बातचीत होती रही। ऐसे कई मौके आए, जब मैंने मांगकर खाना खाया। इसकी वजह यह थी कि जिस घर में खाना खाता था, उस परिवार से संबंध करीबी हो जाता था। दूसरा यह लाभ था कि मुहल्ले में चर्चा हो जाती थी कि वीरेंद्र यादव उसके यहां आकर खाना खाया है। इस प्रकार हम भात के माध्यम से वोट का रिश्ता-नाता जोड़ रहे थे।
(जारी)
इसके पहले के भाग को पढ़ने के लिए नीचे के शीर्षकों पर क्लिक करें –
वीरेंद्र यादव की चुनाव यात्रा (एक) : बभनडीहा की पहचान हैं जगतपति कुमार
वीरेंद्र यादव की चुनाव यात्रा (दो) : उपचुनाव की घोषणा की थी प्रतीक्षा
वीरेंद्र यादव की चुनाव यात्रा (तीन) : स्थानीय नेता और अधिकारियों से समझा समीकरण
वीरेंद्र यादव की चुनाव यात्रा (चार) : स्थानीय लोगों से मदद का भरोसा






