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बिहार

वीरेंद्र यादव की चुनाव यात्रा (छह) : एक प्रस्तावक की तलाश की मुश्किलें

दूसरी पंचायत में जाकर नामांकन के लिए एक व्यक्ति यानी एक प्रस्तावक की तलाश मेरे लिए काफी भारी पड़ रही थी। चुनाव के लिए जाति सबसे महत्वपूर्ण फैक्टर था। लेकिन अपनी ही जाति में एक प्रस्तावक मुझे नहीं मिल रहा था। पंचायत में मनोज कुमार सिंह के पिता महावीर बाबू का नाम का सम्मान के साथ लिया जाता था। उनके खिलाफ कोई यादव खड़ा होने को तैयार नहीं था।

दूसरी पंचायत में जाकर नामांकन के लिए एक व्यक्ति यानी एक प्रस्तावक की तलाश मेरे लिए काफी भारी पड़ रही थी। चुनाव के लिए जाति सबसे महत्वपूर्ण फैक्टर था। लेकिन अपनी ही जाति में एक प्रस्तावक मुझे नहीं मिल रहा था। पंचायत में मनोज कुमार सिंह के पिता महावीर बाबू का नाम का सम्मान के साथ लिया जाता था। उनके खिलाफ कोई यादव खड़ा होने को तैयार नहीं था।

वजह यह थी कि मेरा प्रस्तावक बनने का मतलब मनोज का विरोध करना था। अब दूसरी जाति में प्रस्तावक की तलाश शुरू की। स्थानीय सामाजिक समीकरण में कोई भूमिहार मेरा प्रस्तावक नहीं मिल सकता था। जनसंपर्क के दौरान खरांटी के तिवारी टोला में संपर्क काफी अच्छा बन गया था। वहां एक सक्रिय युवक था गुड्डू तिवारी। लोगों से मिलवाने में उसने काफी सहयोग किया था। उससे मैंने कहा कि एक प्रस्तावक चाहिए। वह इसके लिए तैयार हो गया। लेकिन उस पर पूरा भरोसा करना संभव नहीं था। इसलिए विकल्प भी तैयार रखना जरूरी था।

माले नेता और उपप्रमुख मुनारिक राम ने कहा था कि उनका कोई उम्मीदवार खड़ा नहीं होगा। इसी पार्टी के रामलगन बिगहा के गांव के निवासी हैं दुखन राम। उनसे भी मेरा परिचय मुनारिक राम ने ही कराया था। मुझे भरोसा था कि दुखन राम को अपना प्रस्तावक बनाया जा सकता है। नामांकन के एक दिन पहले मैंने मुनारिक जी से कहा कि एक प्रस्तावक की जरूरत है। मेरा इतना कहना था कि उन्होंने सफाई देनी शुरू कर दी। उन्होंने कहा कि दुखन राम खुद ही चुनाव मैदान में उतर रहे हैं। इस सूचना के बाद चुनाव को लेकर बातचीत करने का कोई मतलब नहीं था। मेरी समस्या बढ़ती जा रही थी। तलाश का सिलसिला जारी था। जनसंपर्क के क्रम में ही एक वार्ड पार्षद शत्रुघ्न प्रजापति से मुलाकात हुई। वह लगातार तीन बार से वार्ड पार्षद थे। उनसे मैंने कहा कि हमें एक प्रस्तावक की जरूरत है। उन्होंने अपनी सहमति दे दी। मैंने थोड़ी राहत की सांस ली।

एक दिसंबर से नामांकन शुरू हो चुका था। उससे पहले मैंने दुकान से नामांकन फॉर्म लेकर एफिडेविड करा लिया था। एफिडेविड फॉर्म भरने वाले वकील हरेंद्र सिंह और नोटरी सुरेंद्र सिंह दोनों यादव थे। इस कारण बिना किसी खर्चे के एफिडेविड हो गया। अब नामांकन के लिए प्रस्तावक चाहिए था। गुड्डू तिवारी और शत्रुघ्न प्रजापति से दोनों से लगातार संपर्क में था। नामांकन के एक दिन पहले यानी दो दिसंबर को गुड्डू तिवारी ने कहा कि कल मैं नहीं रहूंगा। यानी प्रस्तावक का संकट। उसने बताया कि रामनिवास तिवारी जी प्रस्तावक बन जाएंगे। उनसे बात कर लीजिए। मैंने रामनिवास तिवारी से संपर्क किया और कहा कि सोमवार को नामांकन करना है। उन्होंने प्रस्तावक बनने पर सहमति जतायी। लेकिन उनको लेकर मैं आश्वस्त नहीं था। इस कारण शत्रुघ्न प्रजापति को ही प्रस्तावक बनाने का फैसला किया। तीन दिसंबर को करीब आठ बजे शत्रुघ्न प्रजापति के घर पहुंचा। वह खरांटी के रहने वाले थे। उनको अपनी मोटरसाइकिल पर बैठाया और समय से पहले प्रखंड कार्यालय पहुंच गया। उन्होंने अपना वोटर आइकार्ड भी ले लिया था। वहां एक दुकान से वार्ड नंबर सात का वोटर लिस्ट खरीदा, जिसमें उनका नाम था। मैं अपना वोटर आइकार्ड और वोटर लिस्ट की कॉपी ले लिया था।

प्रखंड कार्यालय पहुंचने के बाद साथी ब्रजेश द्विवेदी के घर पहुंचा। वहां कार्यालय में अधिकारियों के आने की प्रतीक्षा करता रहा। इस बात की भी आशंका थी कि शत्रुघ्न जी प्रस्तावक बनने से इंकार नहीं कर दें। ऐसी किसी भी आशंका को निराधार बनाने के लिए शुत्रघ्न प्रजापति को साथ ले लिया था। कार्यालय खुलने के बाद एनआर (नाजिर रसीद) कटवाया। नामांकन की प्रकिया शुरू हुई। इस दौरान बीडीओ देवेंद्र प्रभाकर, प्रखंड कल्याण पदाधिकारी संजय कुमार मौजूद थे। दोनों ने नामांकन पत्रों की जांच की और आवश्यक प्रक्रिया पूरी करवाई। इस दौरान प्रस्तावक की उपस्थिति और हस्ताक्षर दोनों जरूरी था। लगभग 20 मिनट में नामांकन की प्रक्रिया पूरी हुई। मैंने राहत की सांस ली। एक प्रस्तावक की तलाश और उनकी उपस्थिति दोनों का काम पूरा हो चुका था। बीडीओ के चैंबर से बाहर हम दोनों ने चुनाव की संभावना पर चर्चा करते हुए अपनी पंचायत की ओर प्रस्थान कर चुके थे।

(जारी)


इसके पहले के भाग को पढ़ने के लिए नीचे के शीर्षकों पर क्लिक करें –

वीरेंद्र यादव की चुनाव यात्रा (एक) : बभनडीहा की पहचान हैं जगतपति कुमार

वीरेंद्र यादव की चुनाव यात्रा (दो) : उपचुनाव की घोषणा की थी प्रतीक्षा

वीरेंद्र यादव की चुनाव यात्रा (तीन) : स्थानीय नेता और अधिकारियों से समझा समीकरण

वीरेंद्र यादव की चुनाव यात्रा (चार) : स्थानीय लोगों से मदद का भरोसा

वीरेंद्र यादव की चुनाव यात्रा (पांच) : भात से जोड़ता रहा वोट का नाता

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