दांपत्य जीवन में पति भले कमाता हो, खर्च करने का अधिकार सिर्फ पत्नी को होता है। कम से कम मेरे लिए यह नियम पूरी तरह लागू होता है। मेरे एटीएम पर पत्नी संजू का ही एकाधिकार है। मुखिया के नामांकन के लिए एक हजार रुपये का नाजिर रसीद कटवाना पड़ता है। मैंने पत्नी के समक्ष अपना प्रस्ताव रखा। एक हजार एक सौ रुपये की मांग रखी। वह मेरे चुनाव लड़ने के खिलाफ थी। लेकिन मेरी जिद के आगे उसके पास सहमति देने के अलावा कोई विकल्प नहीं था।
हालांकि उसे मनाने के लिए कई वादे भी करने पड़े यानी हजार रुपये के लिए हजार वादे। अपने वादे पर मैं कायम रहूंगा या नहीं, यह मैं नहीं कह सकता। लेकिन इन वादों ने मेरा काम आसान कर दिया था। मैंने पत्नी कहा कि यदि मैं चुनाव हार गया तो दुबारा फिर कभी चुनाव नहीं लड़ूंगा। यह भी वादा किया इन ग्यारह सौ रुपये के अलावा मैं कोई चुनाव भर कोई पैसा नहीं मागूंगा।
मैंने सोच रखा था कि पूरा चुनाव जनता से चंदा लेकर लड़ूंगा। लेकिन चंदा मांगने के पीछे कई शंका-आशंका दिमाग में आती रहती थी। सबसे बड़ा सवाल यही रहता था कि जनता से चंदा इकट्ठा किया और किसी कारण से मैं चुनाव नहीं लड़ सका तो जनता को क्या जवाब देंगे? प्रस्तावक की तलाश से लेकर नामांकन फॉर्म की जांच तक कई प्रक्रिया थी। इसमें कई जगहों पर गच्चा खा जाने का डर दिमाग में घर कर गया था। इस कारण नामांकन पर्ची की जांच तक मैंने जनता इकट्ठा करने का ख्याल छोड़ दिया। लेकिन खर्चा पीछा नहीं छोड़ रहा था। न्यूनतम खर्च कर के ही काम चला रहा था। नामांकन के दिन एनआर रसीद के हजार रुपये लग गए। इसके अलावा कुछ कागजातों के फोटो कॉपी कराने भी खर्चे हुए। पेट्रोल का खर्चा अलग से।
मैंने नामांकन तीन दिसंबर, 12 को किया था। नामांकन पांच दिसंबर तक करना था और नामांकन पत्रों की जांच सात दिसंबर को थी और नाम वापसी की तिथि आठ दिसंबर थी। 12 दिसंबर को चुनाव चिह्न का आवंटन किया गया था। नामांकन के बाद पंचायत के वोटरों की संख्या को समझने के लिए वोटर लिस्ट का होना जरूरी था। मैं नामांकन के दिन ही वोटर लिस्ट खरीदना चाह रहा था। लेकिन पैसे के अभाव में उस दिन वोटर लिस्ट नहीं खरीद सका था। शाम को घर पहुंचा और पत्नी के सामने अपनी मांग रखी। उसने पहले तो भूमिका बांधी और फिर चार सौ रुपए देने को सहमत हो गयी। अगले दिन में ओबरा गया और सबसे पहले पूरा वोटर लिस्ट लिया। पंचायत में कुल 11 वार्ड थे। वोटरों की संख्या करीब चार हजार तीन सौ थी।
इस लिस्ट को ही मैंने अपने जनसंपर्क का मुख्य आधार बनाया। मैंने अपने प्रचार के लिए एक हाथ लिखा हुआ पर्चा बना लिया था। लोगों को बातचीत के बाद अपना पर्चा थमा देता था। उस पर्चा में मैंने तीन वादे किए थे। पहला वादा था कि यदि मुखिया बन गया तो कुराईपुर और ओबरा के बीच पुनपुन की धारा पर चचरी का पुल बनवा देंगे। ताकि स्कूल आने-जाने वाले छात्र-छात्राओं सुविधा होगी। दूसरा वादा किया था- ओबरा, बभनडीहा और रतनपुर पंचायत को मिलाकर नगरपंचायत बनाएंगे, ताकि शहरी विकास के लिए सरकारी योजनाओं का लाभ लोगों को मिल सके। और तीसरा वादा था कि मैं चुनाव वोटरों से प्राप्त चंदा से लड़ूंगा।
पुनपुन नदी में चचरी बनवाने की जरूरत वहां की स्थिति को देख महसूस की थी। चुनाव के लिए जनसंपर्क के सिलसिले में मैं पहली बार ओबरा से कुराईपुर नदी पार कर जा रहा था। उस समय स्कूल का समय था। नदी का दृश्य देखकर लगा कि यहां अस्थायी पुल होना बहुत जरूरी है। बच्चे अपना जूता उतार कर नदी पार कर रहे थे। कुछ बच्चों के अभिभावक उसे गोद में नदी की धार लांघ रहे थे। स्कूली छात्राएं अपनी सलवार को ठेहुना से ऊपर कर नदी पार कर रही थीं। कुराईपुर और खरांटी ओबरा से जुड़े हुए गांव हैं, जिसकी हर गतिविधि ओबरा से जुड़ी होती है। स्कूल, ट्यूशन, बाजार से लेकर चिकित्सा सब कुछ ओबरा में ही है। कुराईपुर, खरांटी और ओबरा की भौगोलिक व राजनीतिक सीमा भले अलग-अलग हो, जीवन की धड़कन की गति अभिन्न है। लेकिन हमारे लिए राजनीतिक सीमा सबसे महत्वपूर्ण थी और उस सीमा को लांघना असंभव था।
(जारी)
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वीरेंद्र यादव की चुनाव यात्रा (एक) : बभनडीहा की पहचान हैं जगतपति कुमार
वीरेंद्र यादव की चुनाव यात्रा (दो) : उपचुनाव की घोषणा की थी प्रतीक्षा
वीरेंद्र यादव की चुनाव यात्रा (तीन) : स्थानीय नेता और अधिकारियों से समझा समीकरण
वीरेंद्र यादव की चुनाव यात्रा (चार) : स्थानीय लोगों से मदद का भरोसा
वीरेंद्र यादव की चुनाव यात्रा (पांच) : भात से जोड़ता रहा वोट का नाता
वीरेंद्र यादव की चुनाव यात्रा (छह) : एक प्रस्तावक की तलाश की मुश्किलें






