नाम के चक्कर में चुनाव से राम-राम की नौबत आ गई थी। नामांकन से जुड़े कागजों पर मैंने अपना नाम सही-सही भरा था। पर्चा से लेकर हस्ताक्षर तक एकदम सही जानकारी दी थी। लेकिन चुनाव अधिकारियों ने उसे सिरे से गलत करार दिया। ठंड के महीने में चेहरे पर पसीना आने लगा था। मैं बैचेन हो गया। क्योंकि फिर से पर्चा भरना व शपथ पत्र बनवाने के चक्कर में मेरी परेशानी बढ़ सकती थी। मेरी पेरशानी को अधिकारी समझ रहे थे। अधिकारियों ने मेरा नाम उस समय गलत करार दिया, जबकि नामांकन की प्रक्रिया पूरा हो चुकी थी।
चुनाव अधिकारी वोटर लिस्ट में छपे नाम की मात्रा और कागजों पर लिखे नाम की मात्रा में पेंच निकाल रहे थे। उनका कहना था कि वोटर लिस्ट में आपका नाम विरेंद्र यादव लिखा है, जबकि आपने कागजों पर आपने वीरेंद्र यादव लिखा है। इस आधार पर आपका नामांकन रद्द हो सकता है। हालांकि इससे समाधान का रास्ता भी उन लोगों ने निकाला। उन लोगों ने सुझाव दिया कि जहां-जहां आपने अपना नाम वीरेंद्र यादव लिखा है, उसे विरेंद्र यादव कर दीजिए। इसके बाद बड़ी सावधानी से मैंने वीरेंद्र यादव के नीचे विरेंद्र यादव लिखा। नामांकन पर्चा में नाम सुधार किया। शपथ पत्र को ठीक किया। यहां तक अपना हस्ताक्षर भी बदलना पड़ा।
इस दौरान यह बात समझ में आयी कि मां-बाप द्वारा सुपुत्र का धरा गया नाम, स्कूल में मास्टर द्वारा रजिस्टर में दर्ज नाम जीवन के हर क्षेत्र और हर जगह काम आ सकता है। लेकिन चुनाव लड़ना हो तो वोटर लिस्ट का नाम ही सर्वोपरि होगा। उसके आगे बिहार बोर्ड के सर्टिफिकेट और विश्वविद्यालयों की डिग्रियों में नामों का कोई मायने नहीं होता है। वोटर लिस्ट में दर्ज नाम की गलतियों को हम नजरअंदाज कर देते हैं और लेकिन यह लापरवाही मुझे भारी पड़ रही थी। मैंने अपने प्रस्तावक शत्रुघ्न प्रजापति का नाम भी वोटर लिस्ट से मिलवाया। वह पहले भी तीन बार चुनाव लड़ चुके थे। इस कारण इन बारिकियों की उन्हें जानकारी थी। यही वजह थी कि उन्होंने अपना नाम पहले ही वोटर लिस्ट के अनुसार भरा था।
नामांकन के संबंध में उन्होंने पहले बताया था कि वोटरलिस्ट वाला भी नाम लिखिएगा। लेकिन उनसे हमारी मुलाकात ही नामांकन फार्म के कॉलम भरने व शपथ पत्र बनवाने के बाद हुई थी। इस कारण उनके सुझाव को अनदेखा कर दिया। मुझे लगता था कि यह मामूली गलती है। नाम तो वही है, सिर्फ मात्रा का फेर है। लेकिन मात्रा का यही फेर मुझे फेरे में डाल दिया था। इसको लेकर ज्यादा परेशानी तो नहीं हुई, फिर भी बेचैनी जरूर हो गई थी। उस पंचायत में कम से कम तीन उम्मीदवार जरूर नाम के फेर में पड़े थे, हालांकि इसको लेकर किसी को कोई तकनीकी दिक्कतों का सामना नहीं करना पड़ा। जफर अंजूम जपर अंजूम बन चुके थे तो अनिल कुमार शर्मा अनील कुमार शर्मा बन चुके थे।
सबसे बड़ी विडंबना यह है कि चुनाव से जुड़े अधिकारी आपकी किसी दलील को मानने के लिए तैयार नहीं होते हैं। उनके लिए वोटर लिस्ट ही अंतिम सत्य है। शायद यह भी उनकी मजबूरी होगी। हालांकि इसको लेकर भविष्य में लोगों को समस्याओं का सामना भी करना पड़ता होगा। चुनाव में नाम के चक्कर में फंसे जीते लोगों को परेशानी का सामना कई स्तरों पर करना पड़ता होगा। पहला यह कि ना चाहते हुए भी आपको उर्फ का बोझ ढोना होगा। यानी विरेंद्र यादव उर्फ वीरेंद्र यादव। फिर आपको यह भी शपथ पत्र भर कर बैंक में देना होगा कि वीरेंद्र यादव एवं विरेंद्र यादव नाम के दोनों व्यक्ति एक ही है। इसके अलावा भी कई तकनीकी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।
ऐसी ही एक घटना 1952 में पहले विधान सभा चुनाव में हुई थी। ओबरा विधान सभा क्षेत्र के सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार थे पदारथ सिंह। वह दाउदनगर के अशोक हाईस्कूल में शिक्षक थे। उस हाई स्कूल के रिकार्ड में उनका नाम पदारथ राम था, जबकि वोटर लिस्ट में उनका नाम पदारथ सिंह था। उन्होंने परचा भी पदारथ सिंह के नाम से ही भरा। इस पर किसी उम्मीदवार उनके नाम को लेकर आपत्ति की। इसके बाद अशोक हाई स्कूल के तत्कालीन प्राचार्य को चुनाव अधिकारी के समक्ष बुलाया गया और उन्होंने कहा कि पदारथ सिंह और पदारथ राम दोनों एक ही व्यक्ति हैं। इसके बाद उनका नामांकन वैध हुआ और फिर वह चुनाव भी जीत गये। 1952 के बाद दूसरी बार वे एसएसपी के टिकट 1969 में चुनाव जीते थे।
(जारी)
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वीरेंद्र यादव की चुनाव यात्रा (एक) : बभनडीहा की पहचान हैं जगतपति कुमार
वीरेंद्र यादव की चुनाव यात्रा (दो) : उपचुनाव की घोषणा की थी प्रतीक्षा
वीरेंद्र यादव की चुनाव यात्रा (तीन) : स्थानीय नेता और अधिकारियों से समझा समीकरण
वीरेंद्र यादव की चुनाव यात्रा (चार) : स्थानीय लोगों से मदद का भरोसा
वीरेंद्र यादव की चुनाव यात्रा (पांच) : भात से जोड़ता रहा वोट का नाता
वीरेंद्र यादव की चुनाव यात्रा (छह) : एक प्रस्तावक की तलाश की मुश्किलें
वीरेंद्र यादव की चुनाव यात्रा (सात) : हजार रुपये के लिए हजार वादे






