नामांकन पत्रों की जांच को लेकर मैं आश्वस्त था। मुझे लगता था कि यह एक सामान्य प्रक्रिया है। स्क्रूटनी के दिन धीरे-धीरे उम्मीदवार उपस्थित होने लगे थे। सबको फॉर्मों की जांच को लेकर उत्सुकता थी। जांच के लिए पहला नामांकन पत्र हमारा ही उठाया गया। सब कुछ सामान्य था। अब वोटर लिस्ट मिलाने की बात आई। बात यहीं आकर उलझ गयी। मैंने अपने आवेदन के साथ विधान सभा की वोटर लिस्ट की कॉपी लगायी थी, जबकि पंचायत चुनाव की वोटर लिस्ट की कॉपी लगानी थी। नामांकन के दिन इसको लेकर कोई विवाद नहीं था। इसलिए विवाद की कोई गुंजाईश नहीं थी।
एक अधिकारी ने वोटर लिस्ट को लेकर सवाल खड़ा किया था। डिहरा पंचायत के वोटर लिस्ट की कॉपी मेरे पास नहीं थी। लेकिन वह कॉपी प्रखंड कार्यालय में भी नहीं थी। इस कारण विधानसभा के वोटर लिस्ट की कॉपी को चुनौती देने की स्थिति में प्रशासन भी नहीं था। लेकिन समस्या तो थी। मेरे पास एक विकल्प था कि हम राज्य निर्वाचन आयोग के संयुक्त सचिव अहिभूषण पांडेय को फोन कर इस मामले में आयोग की राय लें। दूसरा विकल्प यह भी था कि हम वोटर लिस्ट की कॉपी जुगाड़ कर लें। करीब 11 बज रहे थे। चुनाव से जुड़े अधिकारी संजय कुमार ने कहा कि चार बजे तक वोटर लिस्ट की कॉपी जुगाड़ कर लीजिए। मैंने दूसरे विकल्प को पहली प्राथमिकता दी।
मेरे साथ मेरा साला संजय भी था। उसके साथ मैं मोटर साइकिल से घर से आया था। दिमाग में यह बात थी कि मोटर साइकिल की जरूरत पड़ सकती है। खैर। मैंने अपने भइया कृष्ण सिंह को फोन किया कि हम लोग किस वार्ड में वोटर हैं और वार्ड पार्षद कौन हैं। वह इस संबंध में कोई स्पष्ट जानकारी नहीं दे सके। हम ओबरा से करीब 12 किलो मीटर दूर डिहरा के लिए चल चुके थे। रास्ते भर यही सोचता रहा कि वोटर लिस्ट कहां मिलेगी। करीब 40 मिनट की दूरी तय करने के बाद हम डिहरा पहुंचे। पता किया कि वोटर लिस्ट कहां मिल सकता है। पहले तो वार्ड का ही पता नहीं था कि हम किस वार्ड के वोटर हैं। गांव में प्रवेश करते ही सत्येंद्र सिंह मिल गए। मैंने उनसे पूछा कि हमारा कौन सा वार्ड है और उसका वार्ड पार्षद कौन है। उन्होंने इस संबंध में कुछ नहीं बताया। लेकिन इतना जरूर बताया कि चितरंजन सिंह पंचायत समिति सदस्य है। उसके पास सभी वार्डों की वोटर लिस्ट है। मुझे एक उम्मीद जगी कि अब वोटर लिस्ट लिए जाएगी। चितरंजन सिंह राजपूत जाति का था। इस कारण भी ज्यादा आशा बंधा कि जरूर वह चीजों को व्यवस्थित कर के रखा होगा।
मैं प्रकाश की दुकान पर पहुंचा। प्रकाश चितरंजन का दोस्त था। उससे पूछा कि चितरंजन कहां है? उसने चितरंजन को फोन किया। चितरंजन ने बताया कि वह मंडप सजा रहा है। थोड़ी देर में आ रहे हैं। उसी दिन लालबहादुर सिंह के घर बारात आने वाली थी। बारात के दिन मंडवा सजाने का चलन है। मंडप को साड़ी से सजाया जाता है। चितरंजन यही काम में जुटा था। वह प्रकाश के घर से थोड़ी दूरी पर था। मैं लालबहादुर सिंह के घर पहुंचा। चितरंजन साड़ियों से मड़वा सजा रहा था। उसने काम को बीच में छोड़ कर मेरे साथ चला। वह अपने दालान पर ले गया। वहीं उसका कार्यालय था। उसने कमरे की साफ-सफाई कर अलमीरा खोला। उसमें से एक पॉलीथीन का झोला निकाला और उसके अंदर से पूरी पंचायत की वोटर लिस्ट निकाली। मैं बेसब्री में था। उसने बताया कि आपका नाम वार्ड नंबर 15 में है और लिस्ट मुझे थमा दिया। मैंने वोटर लिस्ट में अपनी तस्वीर और अपना नाम देखा। राहत की सांस ली। तब तक करीब सवा दो बज चुके थे। नामांकन रद्द होने की आशंका को खारिज कर देने का पुख्ता हथियार हाथ लग गया था। चुनाव अनुभाग की आपत्तियों का जवाब मिल चुका था।
मैंने प्रखंड कार्यालय में कल्याण पदाधिकारी संजय कुमार को फोन लगाया और बताया कि मेरा वार्ड 15 है और क्रम संख्या 30 है। उन्होंने कहा कि अब चिंता मत कीजिए, समाधान हो गया है। मैं वोटर लिस्ट लेकर प्रखंड कार्यालय पहुंचा।

वीरेंद्र कुमार यादव
(जारी)
लेखक वीरेंद्र कुमार यादव बिहार के वरिष्ठ पत्रकार हैं. प्रभात खबर समेत कई अखबारों को अपनी सेवा दे चुके हैं.
इसके पहले के भागों के बारे में पढ़ने के लिए क्लिक करें : वीरेंद्र यादव की चुनाव यात्रा






