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वेश्‍याओं से भी बदतर है पत्रकारों की जिंदगी… पीसीआई जांच कमेटी के सामने सुनाया दुखड़ा

मुंगेर।‘‘माई लार्ड, बिहार के मुंगेर मुख्यालय में एक वेश्यालय है। यह लालबत्ती क्षेत्र के नाम से जाना जाता है। वेश्याएं देह बेचकर अच्छी-अच्छी साड़ियां पहनती हैं, दरवाजे पर खड़ा होकर ग्राहकों को लुभाती हैं और अर्जित कमाई से अपने बच्चों को उंची शिक्षा दे रही हैं। ठीक विपरीत, बिहार में प्रायः सभी प्रिंट मीडिया, न्यूज एजेंसियों और न्यूज चैनलों के राज्य मुख्यालय, प्रमंडल मुख्यालय, जिला मुख्यालय, अनुमंडल मुख्यालय और प्रखंड मुख्यालय के संवाददाता/ स्ट्रिंगर (कुछ को छोड़कर) अपना ईमान बेचकर भी वेश्याओं से बद्तर जिन्दगी जी रहे हैं। इन स्ट्रिंगर/संवाददाताओं को न पहनने को अच्छा वस्त्र है, न भरपेट भोजन की व्यवस्था। बाल-बच्चों को अच्छी और उंची शिक्षा देने की बात महज सपना है। मीडिया जगत के नियोजकों ने आजादी के बाद से अबतक प्रजातंत्र के इस मजबूत और शक्तिशाली स्तंभ को‘भ्रष्ट‘और ‘बेहद कमजोर‘बना दिया है। उद्देश्य है राष्ट्र को कमजोर करना और अपनी पूंजी में वृद्धि करना।‘‘

मुंगेर।‘‘माई लार्ड, बिहार के मुंगेर मुख्यालय में एक वेश्यालय है। यह लालबत्ती क्षेत्र के नाम से जाना जाता है। वेश्याएं देह बेचकर अच्छी-अच्छी साड़ियां पहनती हैं, दरवाजे पर खड़ा होकर ग्राहकों को लुभाती हैं और अर्जित कमाई से अपने बच्चों को उंची शिक्षा दे रही हैं। ठीक विपरीत, बिहार में प्रायः सभी प्रिंट मीडिया, न्यूज एजेंसियों और न्यूज चैनलों के राज्य मुख्यालय, प्रमंडल मुख्यालय, जिला मुख्यालय, अनुमंडल मुख्यालय और प्रखंड मुख्यालय के संवाददाता/ स्ट्रिंगर (कुछ को छोड़कर) अपना ईमान बेचकर भी वेश्याओं से बद्तर जिन्दगी जी रहे हैं। इन स्ट्रिंगर/संवाददाताओं को न पहनने को अच्छा वस्त्र है, न भरपेट भोजन की व्यवस्था। बाल-बच्चों को अच्छी और उंची शिक्षा देने की बात महज सपना है। मीडिया जगत के नियोजकों ने आजादी के बाद से अबतक प्रजातंत्र के इस मजबूत और शक्तिशाली स्तंभ को‘भ्रष्ट‘और ‘बेहद कमजोर‘बना दिया है। उद्देश्य है राष्ट्र को कमजोर करना और अपनी पूंजी में वृद्धि करना।‘‘

 
‘‘माई लार्ड, आप जानकर अचंभित होंगे कि बिहार में दैनिक हिन्दुस्तान, दैनिक जागरण के साथ-साथ अन्य हिन्दी और अंग्रेजी दैनिकों के संपादकों से लगायत स्ट्रिंगरों तक को (कुछेक को छोड़कर) नियोजकों ने न कोई नियुक्ति-पत्र दिया है और न ही मीडिया का परिचय-पत्र। संपादकों से स्ट्रिंगरों तक से नियोजकों ने कोई एकरारनामा नहीं कराया है। श्रम कानून के तहत संपादक से स्ट्रिंगर तक सेवा-पुस्तिका का संधारण जरूरी है जो बिलकुल ही नहीं किया जा रहा है। श्रमजीवी और गैर-श्रमजीवी पत्रकारों के लिए देश भर में लागू वेज बोर्ड के वेतन और अन्य सुविधाओं से संबंधित सारी सुविधाएं कोरपोरेट मीडिया मालिकों के पैरों के नीचे कुचल दी गई हैं। बिहार में श्रम विभाग का संचालन सरकार न कर कोरपोरेट मीडिया के मालिक कर रहे हैं। श्रम विभाग सरकारी विज्ञापन में संगठित और असंगठित मजदूरों के वेतन और अधिकार की जानकारी छपती रहती है। परन्तु आज तक पत्रकारों और गैरपत्रकारों के वेतन और अन्य सुविधाओं से संबंधित श्रम कानूनों की जानकारी आज तक न तो बिहार सरकार और न ही केन्द्र सरकार ने विज्ञापन के जरिए प्रकाशित की है। बिहार का श्रम विभाग राज्य मुख्यालय से प्रखंड मुख्यालय तक पत्रकारों और गैर पत्रकारों को कानून के तहत वेतन और अन्य सुविधाएं दिलाने में पूरी तरह नाकाम रहा है।‘‘
 
‘‘माई लार्ड, कोरपोरेट मीडिया के हस्तक्षेप से बिहार का श्रम विभाग बेसहाय बना हुआ है। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि श्रम कानूनों के उल्लंघन पर श्रम विभाग छोटे-छोटे सैकड़ों-हजारों दुकानदारों के विरूद्ध बिहार में सात वर्षों में मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी के न्यायालय में मुकदमा दर्ज किया है। परन्तु, पत्रकारों और गैर पत्रकारों के आर्थिक शोषण और श्रम कानूनों के उल्लंघन के मामले में कारपोरेट मीडिया के विरूद्ध कानूनी कार्रवाई करने में श्रम विभाग के पदाधिकारी स्वयं बीमार हो जाते हैं।‘‘
 
‘‘माई लार्ड, सबसे घृणित कार्य बिहार में मीडिया में यह हो रहा है कि संपादक से लेकर स्ट्रिंगर तक सभी अपने नियोजकों के लिए विज्ञापन जुटाने और विज्ञापन से मिलने वाले कमीशन के लिए सुबह से शाम तक भटकते रहते हैं। इस परिस्थिति में, ‘बदलते बिहार‘और ‘बदलते राष्ट्र‘की तस्वीर किस अखबार या न्यूज चैनलों में छपेगी या दिखेगी? यह भारतीय प्रजातंत्र के लिए गंभीर समस्या है। पूरे राज्य में कुछेक को छोड़कर राज्य मुख्यालय, प्रमंडलीय मुख्यालय, जिला मुख्यालय, अनुमंडल मुख्यालय और प्रखंड मुख्यालयों में कार्यरत संवाददाता/ स्ट्रिंगरों को प्रतिमाह दो से तीन सौ रुपये तक की पारिश्रमिक मिलती है। प्रति समाचार दस रुपया के हिसाब से और प्रति फोटो बीस रूपया के हिसाब से छायाकार को नियोजक अखबार में भुगतान करते हैं।‘‘
 
उपर्युक्त तथ्यों को लिखित रूप में भारतीय प्रेस परिषद की जांच कमिटी के समक्ष मुंगेर के राज पैलेस होटल में 12 जून को मुंगेर के पत्रकारों और अधिवक्ताओं ने रखा। लिखित स्मारकपत्र पर हस्ताक्षर करनेवालों में थे के0 प्रसाद (अधिवक्ता), मीरा प्रसाद (स्वतंत्र छायाकार), बिपिन कुमार मंडल (अधिवक्ता), राजेश कुमार (स्वतंत्र छायाकार) आदि। जांच कमिटी वरीय पत्रकार राजीव रंजन नाग की अध्यक्षता में मुंगेर में बिहर में ‘सरकार के दवाब में मीडिया‘विषय पर सुनवाई कर रही थी। जांच कमिटी में पटना के वरीय पत्रकार अरूण कुमार (टाइम्स आफ इंडिया) भी सदस्य के रूप में शामिल थे।
 
जांच-कमिटी को बताया गया कि दैनिक हिन्दुस्तान, दैनिक जागरण और अन्य हिन्दी और अंग्रेजी दैनिकों ने श्रम कानूनों से बचने के लिए संपादक से स्ट्रिंगर तक सभी से सादे कागज पर हस्ताक्षर कथित रूप में करवा लिया है। नियोजक का उद्देश्य है कि भविष्य में कानून की मार से नियोजक बच निकले। ऐसी परिस्थिति में यह स्वाभाविक है कि बिहार में संपादक से स्ट्रिंगर तक स्वंय अपने द्वारा निर्मित दवाब में काम कर रहे हैं। मंत्री या सरकारी पदाधिकारी अब ऐसे फर्जी पत्रकारों को अपने दरवाजों के बाहर घंटों खड़ा कर देते हैं क्योंकि वे लोग अब जान गए हैं कि इन फर्जी पत्रकारों की औकात‍ क्या है?
 
जांच-कमिटी को सुपुर्द किया गया अदालती दस्तावेज : संवाददाताओं और छायाकारों के शोषण और सेवा-मुक्ति से जुड़ी समस्याओं से संबंधित न्यायिक दस्तावेज जांच कमिटी को सुपुर्द किया गया। भागलपुर स्थित श्रम न्यायालय में कामगार के0 प्रसाद (हिन्दुस्तान), मीराप्रसाद (हिन्दुस्तान टाइम्स), राजेश कुमार (हिन्दुस्तान), बिपिन कुमार मंडल (जागरण) के लंबित मुकदमों के दस्तावेजों की छायाप्रतियां जांच कमिटी को सुपुर्द की गईं। जांच कमिटी को बताया गया कि श्रम न्यायालय में कामगारों के लिखित वक्तव्य (रिटेन स्टेटमंट) में सारी सूचनाएं उपलब्ध हैं जो भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष न्यायमूर्ति मार्कण्डेय काटजू को कोरपोरेट मीडिया के भीतरी प्रशासन के आंतरिक आर्थिक शोषण और अत्याचार से रू-ब-रू कराएगा। न्यायमूर्ति श्रम न्यायालय के दस्तावेजों के आधार पर पत्रकारिता के सच (?) से पूरी तरह अवगत होंगे। न्यायालय के दस्तावेजों से यह भी बात सामने आई है कि अखबार में रहने और हटने के पीछे मात्र एक ही फैक्टर काम करता है। और वह फैक्टर बन गया है कि कौन व्यक्ति कितना अधिक राशि का विज्ञापन लूटकर नियोजक के लिए उपलब्ध कराता है। 
 
अखबार, न्यूज एजेंसी और न्यूज चैनलों के लिए भाषा और साहित्य का ज्ञान अब कोई खास अर्थ नहीं रखता है। पत्रकारों की योग्यता केवल विज्ञापन संग्रहण करने की क्षमता से आंकी जा रही है। और तो और अब बिहार में प्रायः सभी अखबारों ने अपने-अपने संवाददाताओं/ स्ट्रिंगरों को विज्ञापन संग्रह का ‘बुक‘थमा दिया है, जो लक्ष्य नहीं पूरा करता है, वह दूसरे माह मैदान के पिच से आउट हो जाता है। हिन्दी और अंग्रेजी भाषा के ज्ञान और लेखनी की ताकत और लेखनी की शैली से कोरपोरेट मीडिया हाउस को अब कोई लेना-देना नहीं रह गया है। कोरपोरेट मीडिया हाउस को अब केवल विज्ञापन बटोरने वाले नया और ताजा खून चाहिए। न्यायमूर्ति मार्कण्डेय काटजू से पूरे प्रकरण में उच्‍चस्तरीय जांच कराने और राष्ट्रीय स्तर पर कठोर कदम उठाने की अपील स्मरणपत्र में की गई है।
 
मुंगेर से श्रीकृष्ण प्रसाद की रिपोर्ट। इनसे संपर्क मोबाइल नम्बर-09470400813 के जरिए किया जा सकता है। 
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