श्रीमान अनुज पोद्दार जी, निदेशक, जनसंदेश टाइम्स हिंदी दैनिक, नमस्कार, आप पढ़े-लिखे मालूम पड़ते हैं लेकिन मुझे दुःख है कि मैं आप को अपनी बात समझा नहीं पाता हूँ. ये भी हो सकता है कि आप मेरी बात समझना ही न चाहते हों. एक बार फिर मैं आप को पत्र के जरिये अपना नजरिया बताना चाहता हूँ ताकि आप स्थिरचित्त होकर इसे पढ़ सकें और समझ सकें. जिन तीन लोगों को लेकर मैं यहाँ आया था, उन तीनों का ही जनसंदेश टाइम्स को एक प्रतिष्ठित अख़बार बनाने में बड़ा योगदान रहा है. उनमें से एक आनंद अग्निहोत्री यहाँ अपने बीच के लोगो द्वारा गढ़ी गयी अराजकता से परेशान होकर जा चुके हैं. हरे प्रकाश और सत्येन्द्र मिश्र अब भी हमारे साथ हैं. आप अनुमान नहीं लगा सकते कि इन दोनों ने कितनी मेहनत की इस अख़बार को बनाने में और इसे प्रतिष्ठा दिलाने में.
मैं अपने बारे में ज्यादा नहीं सोचता हूँ, लेकिन आप ने जब सबका वेतन १२.५ प्रतिशत बढाने का फैसला किया और मेरे रोकने के बाद भी उसे लागू भी कर दिया तो हरे प्रकाश और सत्येन्द्र का वेतन भी उसी अनुपात में बढ़ जाना चाहिए था. पर दुःख है कि ऐसा नहीं हुआ. मैंने कम से कम दो बार आप से आग्रह किया और हर बार आप ने कहा कि हो जायेगा, आदेश कर दिया गया है. इसमें दो माह निकाल चुके हैं. कोई भी मेहनत से काम करने वाला आदमी यह देखकर अपमानित महसूस करेगा कि उसके अगल-बगल बैठने वाले उसके समकक्ष या उससे कम योग्य लोगों को बढे वेतन का लाभ मिल रहा है और उसे नहीं मिल रहा है. आप पुराने संस्थान की पे-स्लिप मांग रहे हैं, जो मेरे हिसाब से ब्यर्थ की बात है. यह सब किसी आदमी की नियुक्ति के समय माँगा जाता है, साल भर बाद नहीं. मैं इससे सहमत नहीं हूँ.
किसी भी कर्मचारी का मूल्यांकन उसके काम से होता है न कि उसकी पुरानी सैलरी स्लिप से. हरे प्रकाश या सत्येन्द्र ने इस संस्थान के लिए क्या किया है, यह आप की समझ में नहीं आ सकता. इसे या तो मैं संपादक होने के नाते जानता हूँ या फिर जन सन्देश टाइम्स के पाठक जानते हैं. कौन पहले क्या वेतन पा रहा था, इसका कोई मतलब नहीं होता है. आप बार-बार मुझसे हरे प्रकाश के बारे में संकेत करते हैं कि उसे १५ हजार मिल रहा था, मैंने २८ हजार दिला दिया. मैंने किसी को गुमराह करके ऐसा नहीं किया. उसका पुराना नियुक्ति पत्र आप के एच आर में जमा है. मैं पे-स्लिप तो नहीं देने जा रहा हूँ, वो तो, जैसा आप कहते हैं, आप निकलवा ही लेंगे पर आप की जानकारी के लिए बता दूं कि हरे प्रकाश को एच टी २४.५ हजार दे रहा था. इसके अलावा सालाना १० हजार मेडिकल और इतना ही एल टी ए भी दे रहा था.
जनसंदेश टाइम्स एक बड़ा शून्य था, जब मैं लखनऊ आया था. हरे प्रकाश कादम्बिनी यानी एच टी ग्रुप में काम कर रहा था. वह एक बड़े ब्रांड में था, उसकी पक्की नौकरी थी, वह दिल्ली में था, वह सारे देश में लेखकों के बीच एक जाने-पहचाने नाम की तरह था, उसकी भारतीय ज्ञान पीठ से एक पुस्तक प्रकाशित हो चुकी थी, जिसकी देश भर में चर्चा हुई थी, वह इतना सब-कुछ छोड़कर आप के बड़े शून्य में क्यों आता? वह यहाँ आया तो मेरी वजह से, मेरे साथ अपने जुडाव की वजह से. जनसंदेश टाइम्स में आकर उसे क्या मिलना था? इसलिए मैंने उसे २८ हजार दिया और मैं अब एक साल पूरे होने पर जब मूल्यांकन करता हूँ तो मुझे लगता है कि मैंने उसे बहुत ज्यादा नहीं दिया. उसने मेरी और जनसंदेश टाइम्स, दोनों की प्रतिष्ठा बढ़ाई. २८ हजार तो उसके आगे बहुत कम है.
दूसरे रहे सत्येन्द्र मिश्र तो उनके बूते का ही था कि हम जिलों में अपनी बेहतर उपस्थिति बना सके. वह भी अगर दैनिक जागरण छोड़कर यहाँ आया तो इसलिए नहीं कि किसी बड़े बैनर में या ब्रांड में जा रहा है. मेरे लिए जन सन्देश टाइम्स एक चुनौती था और इस चुनौती में हाथ बंटाने मेरे कारण वह यहाँ आया. जो पैसा मैंने उसे दिया, वह उसे वहां भी मिल चुका होता. उसकी प्रोन्नति भी हो गयी होती. मैं खुश हूँ कि उसने पूरी मेहनत से उस चुनौती का मुकाबला किया और अख़बार को प्रतिष्ठा दिलाने में अपना सम्पूर्ण दिया.
मुझे आश्चर्य और क्षोभ दोनों है कि आप ने इन दोनों का पैसा नहीं बढाया और अब भी अपनी व्यर्थ की जिद पर अड़े हुए हैं. सम्पादकीय सहकर्मियों का मूल्यांकन प्रबंधन या एच आर नहीं किया करता है, संपादक करता है. उसे ही पता होता है कि कौन क्या और कितना कर रहा है, किसकी कितनी और कैसी निष्ठां है, कौन कितना महत्वपूर्ण है.
६-७ महीनों में जो हमने बनाया था, उसे आप जिस तरह बिना सोचे-समझे बिगाड़ने में लगे हैं, वह बहुत दुखी करने वाली बात है. दुःख इसलिए और भी ज्यादा है कि आप बिना मुझसे राय-मशवरा लिए कुछ भी फैसला कर लेते हैं और जब उसका विपरीत प्रभाव आना शुरू होता है तो उसे ठीक करने के लिए कुछ ऐसा कर डालते हैं, जो बाक़ी का चेहरा भी ख़राब कर देता है. इस अख़बार का कंटेंट, डिजाइन और सामग्री का निश्चय बहुत चिंतन-मनन और विचार-विमर्श के बाद तय किया गया था. यह एक ऐसा मिक्स था, जिसमें ह़र वर्ग, ह़र सोच, ह़र आयु के लोगों के लिए कुछ न कुछ था. पूरे अखबार का नियोजन सुचिंतित सरोकार के तहत किया गया था. साहित्य, कला, रचना उसका एक हिस्सा भर था. आप को जो लोग यह बताते रहे हैं कि इसमें केवल साहित्य है, वे मेरी समझ से अख़बार के जानकर लोग नहीं हैं, या जानबूझकर आप को गुमराह कर रहे हैं.
अब देखिये, आप ने मुझसे बिना परामर्श के जिलों में चार पन्ने घटा दिए. उसका मतलब यह कि नियोजित कंटेंट में से चार पन्ने निकल गये. जब हल्ला-गुल्ला मचा तो आप ने इस अख़बार के सबसे अच्छे हिस्से, यानी फीचर पन्नों में विज्ञापन घुसेड़ना शुरू किया. मेरे मना करने पर भी नहीं माने. इसका परिणाम ये हुआ कि चार पन्ने की सामग्री तो पाठकों के हाथ से निकली ही, फीचर पन्नों ने भी अपना प्रभाव खोना आरम्भ कर दिया. फिर आप ने इतवार के साहित्य परिशिष्ट पर धावा बोला. चार पन्नों की बाजारू सामग्री जुटायी और मुझसे उस पर मेरी राय मांगी. अच्छा लगा कि मेरी राय न लेने की पिछली गलती आप ने नहीं दुहराई. मैंने कहा कि इसमें से कुछ चीजें फीचर पन्नों में शामिल की जा सकती हैं पर इस पूरे चार पन्ने के कांसेप्ट से मैं सहमत नहीं हूँ क्यों कि यह अख़बार के मिजाज से मेल नहीं खाता है. फिर भी आप नहीं माने, उसे छापना शुरू कर दिया और उलटे लोगों से यहाँ कहा कि संपादक जी की सहमति से यह हो रहा है. मैंने बीच का रास्ता लेते हुए अपना परिशिष्ट दो पेज घटा दिया. बाद में एक दिन आप ने आदेश जारी किया कि अब साहित्य परिशिष्ट के दो पन्ने ही जायेंगे पर मेरे कड़े रुख के कारण आप ने अपना फैसला स्थगित कर बड़ी कृपा की.
मैं ह़र विषय पर बातचीत के लिए खुला दिमाग रखता हूँ पर कोई नासमझी जल्दी स्वीकार नहीं करता हूँ. मैं कोई धर्मादे का अख़बार नहीं निकाल रहा हूँ, यह मुझे पता है. अख़बार चलाने के लिए पैसा चाहिए, ये भी मुझे पता है, पर पैसा कैसे आये, इस पर ठीक से बात होनी चाहिए थी. क्या बिकता है, क्या नहीं बिकता है, इस पर बहुत सारी बातें प्रबंध पंडित करते रहते हैं पर सब यह बात अच्छी तरह जानते हैं कि पहले माल बनाना होता है, उसे लोगों के दिल में बिठाना होता है, उसकी ब्रैंडिंग करनी होती है, फिर वह बिकता है. ब्रैंडिंग एक तो झूठे प्रचार से होती है, दूसरे अच्छे माल को अच्छे लोगों द्वारा अच्छा कहे जाने से होती है. अख़बार कोई टूथपेस्ट, साबुन या बुशर्ट नहीं है कि आप झूठ बोलकर या इनाम देकर बेच लेंगे, न्यूजपेपर केवल न्यूजपेपर नहीं होता, यह पुरानी बात हो गयी है.
एक बेहतर अख़बार ह़र क्षेत्र की खबरों, विश्लेषणों, समकालीन घटनाक्रमों पर प्रतिष्ठित लेखकों, चिंतकों की टिप्पणियों, अपने स्पष्ट सरोकार और दृष्टि से बनता है. यह कोई हँसी-खेल नहीं है. यह सब कुछ जन सन्देश टाइम्स में था, धीरे-धीरे शहर से, जनपदों से इसके प्रति एक स्वीकार निर्मित हो रहा था, इसे प्रचारित-प्रसारित करने की हमारी न्यूनतम कोशिशों के बावजूद लोगों में इसकी लोकप्रियता बढ़ रही थी. इसमें प्रकाशित होने वाली रचनाओं के लेखकों के पास पहुँचने वाले फ़ोनों और मुझे मिलने वाली प्रतिक्रियाओं से यह साफ़ था. मुझे आश्चर्य होता है कि जो चीजें इस अखबार को खड़ा करने में सार्थक और सक्रिय भूमिका निभा रहीं थीं, वही आप को इस अख़बार की सबसे ख़राब चीजें लगती हैं. व्यवसाय और बाजार से मुझे इंकार नहीं है, मुझे मालूम है कि अब अख़बार निकालने वाले भी इसे एक धंधे की तरह लेते हैं. इस तथाकथित व्यावसायिक दुनिया में काम करते हुए सीमित अर्थों में मैं इसकी उपयोगिता मानता हूँ लेकिन सब कुछ बाजार है, बाजार ही सारे सरोकार तय करेगा, ऐसा मैं कतई नहीं मानता. इसीलिये मैं यह भी मानता हूँ कि माल अच्छा है तो वह अपना बाजार बना लेगा और माल वही अच्छा है, जिसे बिना गुमराह हुए लोग अच्छा कह सकें, स्वीकार कर सकें. अख़बार को माल कहना अच्छा नहीं लगता लेकिन लगता है कि यह भाषा आप को ठीक से आती है, इसलिए इस तरह आप को मेरी बात समझ में आ सकेगी.
मैं किसी भ्रम में नहीं हूँ कि लोग जन सन्देश टाइम्स को एक अच्छे, गंभीर और दृष्टिसंपन्न अख़बार की तरह स्वीकार करने लगे हैं. हो सकता है कि अभी हम संख्या में कम हों, लेकिन पहचान में किसी से कम नहीं हैं. इसका कुछ तो कारण है. और इसका कारण वही है, जो अन्य अख़बारों से इसमें अलग है. आप समझें या न समझें, लेकिन मैं इसे अच्छी तरह समझता हूँ. एच टी, जागरण और अमर उजाला को छोड़ दें तो जनसंदेश टाइम्स से पहले से कई और भी अख़बार इस राजधानी में हैं, कई उसके बाद भी आये लेकिन अगर उनमें जन सन्देश टाइम्स खड़ा दिखता है तो उसमें कुछ तो है. यह वही है, जो दूसरे अख़बारों से अलग है. और मुझे यह कहने में कतई संकोच नहीं है कि वह साहित्य, कला, चिंतन पर सामग्री और बड़े लोगों के नाम ही हैं. अगर इस अख़बार के लिए मुद्राराक्षस, रवीन्द्र वर्मा, शीला रोहेकर, विष्णु नागर, असगर वजाहत, अब्दुल बिस्मिल्लाह, अखिलेश, वीरेन्द्र यादव, गिरिराज किशोर, शिवमूर्ति, नरेश सक्सेना, रमेश दीक्षित, शकील सिद्दीकी, सुभाष गाताडे, राजकिशोर, जय प्रकाश कर्दम, प्रियंवद, श्योराज बेचैन, सुभाष कुशवाहा, कामतानाथ, प्रमोद जोशी, उमेश चतुर्वेदी, पंकज चतुर्वेदी, मदन कश्यप, सुशील सिद्धार्थ, रजनी गुप्त, उद्भ्रांत, रूपरेखा वर्मा, रहीस सिंह, देवेन्द्र, मुजम्मिल साहब, नदीम हसनैन, अजीत राय, अवधेश मिश्र, विनोद अनुपम, प्रभात रंजन, नसीम साकेती, बातिश साहब, जौक साहब, आनंद प्रधान, उर्मिल कुमार थपलियाल, आलोक पुराणिक, सुरेश नीरव, सूर्य कुमार पाण्डेय, प्रेम जनमेजय, प्रीती चौधरी, मैत्रेई पुष्पा, बद्री नारायण, सोम ठाकुर, ओम प्रकाश नदीम, प्रेम चंद गांधी, खगेन ठाकुर, काशीनाथ सिंह, निलय उपाध्याय, अमिताभ ठाकुर, चंद्रेश्वर, कौशल किशोर, प्रदीप सौरभ, प्रांजल धर, मनोज पाण्डेय, राम कठिन सिंह, योगेश प्रवीण, रमेश उपाध्याय, रमणिका गुप्ता, प्रमोद ताम्बट, अविनाश वाचस्पति, जय नारायण बुधवार, ज्ञानेंद्र शर्मा, रवीन्द्र सिंह, मनीषा कुलश्रेष्ठ, दिविक रंमेश या इसी तरह के देश के सैकड़ों लेखक, कवि, कलाकार, चिंतक, पत्रकार लिखते हैं तो इसलिए नहीं कि जनसंदेश टाइम्स में लिखने से उनकी प्रतिष्ठा बढ़ती है या आप उन्हें बड़ा भारी पारिश्रमिक देते हैं. ये लोग मेरे या हरे के प्रति स्नेह और हमारे निरंतर आग्रहों, निवेदनों का आदर करते हुए लिखते है. मुझे हैरत है कि आप को ये लिखने-पढ़ने वाले बेकार के लोग लगते हैं. उस दिन तो मुझे अत्यंत क्षोभ भी हुआ जब आप ने हरे प्रकाश से कहा कि इन लेखकों को कूपन भिजवा दो और कहो कि वे हमारे लिए कुछ विज्ञापन जुटाएं. मेरे तमाम आग्रहों के बावजूद अभी तक तमाम लेखकों को ६ माह तक का पारिश्रमिक नहीं भेजा गया है. वे हमारे गुलाम नहीं हैं कि बिना पारिश्रमिक के लिखते रहें. जब भी मैं आप से कहता हूँ आप कहते हैं, चला जाएगा लेकिन जाता नहीं है.
अब जनसंदेश टाइम्स का विस्तार हो रहा है. यह हम सब लोगों के लिए खुशी की बात है. अपना लगाया पौधा बढे, फले-फूले, यह कौन नहीं चाहता. मैं भी चाहता हूँ. पर यहाँ भी कुछ अयाचित परिस्थिति बनाई जा रही है. जिसको लेकर मेरे मन में संदेह और सवाल उठ रहे हैं. मुझे यहाँ लाने में सबसे प्रमुख भूमिका मेरे पहले से ही परिचित स्नेही देवराज जी की रही. उन्होंने ही सौरभ जी से मेरी बात कराई. तब बहुत सारी बातें हुई थीं. जिनमें से बहुत कम पर अमल हो सका. उनमें एक यह भी थी कि आगे अख़बार जहाँ भी जायेगा, मैं संपादक रहूँगा. जाहिर है जब मेरी निगरानी में पूरा अख़बार बनता है, और कोई भी नया संस्करण केवल शहर के अलावा वे सारे पन्ने इस्तेमाल करेगा, तो संपादक बने रहने का हक़ मेरा बनता है. मेरी आदत रही है कि जहाँ भी मैं काम करता हूँ, अपनी पूरी क्षमता और ताकत लगाकर काम करता हूँ. उसके बदले अगर आप बेहतर पैसा नहीं दे सकते तो कोई बात नहीं पर सम्मान तो देंगे. सम्मान कौन नहीं चाहता? मैं भी चाहता हूँ. यह मेरे लिए सम्मान का विषय है कि मेरी यह शर्त उस समय मान ली गयी थी कि अख़बार जहाँ भी जायेगा, संपादक मैं रहूँगा. बाकी स्टाफ के बारे में मेरा कोई रिजर्वेसन नहीं है. इसी सहमति के तहत जब कानपुर अलग किया गया तब मुझे उसका संपादक रखा गया. इस नए विस्तार की बात जब शुरू हुई थी, तभी मैंने आप की बातें सुनकर कि ये नहीं मानेगा, वो नहीं मानेगा, आगाह किया था कि कोई गलती नहीं होनी चाहिए. स्थानीय संपादक आप चाहे जिसे बना लें लेकिन संपादक के रूप में कोई दूसरा नहीं आना चाहिए. तब आप ने जोर देकर कहा भी कि नहीं, नहीं, हर जगह संपादक तो आप ही रहेंगे पर अब आप ने स्वर बदल लिया है. अब आप कह रहे हैं कि वो गोरखपुर वाले नहीं मानेंगे. मुझे कोई एतराज नहीं होगा, अगर वे सारे पन्ने बनवाएं, संपादक रहें, पर मैं यह कतई स्वीकार नहीं करूंगा कि मैं यहाँ से सारे पन्ने बनवा कर भेजूं और कोई शहर के ५-६ पन्ने बनवाकर संपादक बने. यह मेरे सम्मान के खिलाफ है.
माफ़ कीजियेगा अनुज जी, आप इतनी परस्पर विरोधी बातें करते रहते हैं कि मुझे कुछ मुद्दों पर आप से सवाल पूछना पड़ रहा है. वह इसलिए कि मैं अपने और अपने लोगों का सम्मान बचाए रख सकूं. नौकरी बेशक महत्वपूर्ण चीज है लेकिन सम्मान की कीमत पर नहीं. आप खबरों और कंटेंट के मामले में भी लगातार दखल देने की कोशिश करते रहते हैं, जैसे हम लोग ३५ सालों से भाड़ झोंकते रहे हों. सलाह मशवरा अलग चीज है, उसे हम स्वीकार करते हैं लेकिन किसी गैर-पत्रकार से संपादन, खबरों के चयन और उनकी जगह के बारे में निर्देश लेकर काम करना थोडा मुश्किल होगा. ऐसी परिस्थिति में मैं कुछ सवालों का उत्तर चाहता हूँ ताकि मैं आगे का अपना रास्ता निश्चित कर सकूं.
१. हरे प्रकाश, सत्येन्द्र और मेरे वेतन वृद्धि के मामले में आप क्या कर रहे हैं. क्या मुझे भी पुरानी पे-स्लिप देनी पड़ेगी? जब सबको एक वर्ष पूरे होने पर वेतन वृद्धि दी गयी है तो केवल तीन लोगों को उनके हक़ से वंचित क्यों किया जा रहा है? इन्हें भी क्यों नहीं एक वर्ष पूरा होने की तारीख से वृद्धि मिलनी चाहिए? आखिर सबके साथ समानता के व्यवहार की उम्मीद क्यों नहीं की जानी चाहिए?
२. क्या गोरखपुर संस्करण के सारे पेज गोरखपुर बनाएगा, अगर नहीं तो कितने पेज हमें यहाँ से देने होंगे?
३. अगर हमें यहाँ से १० पेज देने होंगे तो संपादक कोई दूसरा कैसे हो सकता है?
४. मेरा मनाना है कि प्रबंध तंत्र को अगर कुछ भी लिखवाना है तो उसे संपादक को उस सम्बन्ध में सुझाव देना चाहिए पर आप अक्सर लोगों को सीधे आदेश-निर्देश देते रहते हैं. क्या आप सम्पादकीय विभाग से केवल सलाह मशवरे तक ही अपने को सीमित नहीं रख सकते? किसी को भी खबरों के बारे में कोई भी आदेश, निर्देश देकर संपादक के अधिकार में दखल देना जारी रखेंगे या बंद करेंगे?
आप के व्यवहार से लगता है कि या तो आप अख़बार की कार्यप्रणाली से पूरी तरह अपरिचित हैं या अगर परिचित हैं तो तयशुदा ढंग से ऐसी परिस्थिति बना रहे हैं कि मैं अपनी जिम्मेदारियों के निर्वहन में असुविधा महसूस करूं. जो भी हो, मैं कोई पूर्वानुमान नहीं लगा रहा हूँ लेकिन आप को जनसंदेश टाइम्स के विस्तार और सफलता की शुभकामनाओं सहित. आशा करता हूँ कि आप जल्द से जल्द स्पष्ट रूप से अपने फैसले से मुझे अवगत कराएँगे, ताकि मैं अपने फैसले पर पहुँच सकूं. धन्यवाद.
सुभाष राय
संपादक
जनसंदेश टाइम्स हिंदी दैनिक
लखनऊ
11 जनवरी 2012
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