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शतक पूरा करने में खबरों के हाथ-पांव, कान मरोड़े जा रहे हैं

न्यूजों चैनलों पर ज्यादा खबरें दिखाने की होड़ इस कदर बढ़ गई है कि इसके क्या कहने। ऐसा लगता है कि चैनलों पर खबरों का मैच चल रहा हो, टॉप-टेन खबरों से शुरू हुआ ये सफर 20-20 खबरों से होकर खबरों के शतक तक पहुंचा और अब तक शतक को पीछे छोड़कर दोहरे शतक यानी 200 खबरों तक पहुंच गया है। 10-20 मिनट में 200 खबरें। साथ ही "खबरों की आंधी और सच का तूफान" इस प्रकार के भयानक हेडर और फ्लैश भी चलाए जाते हैं।

न्यूजों चैनलों पर ज्यादा खबरें दिखाने की होड़ इस कदर बढ़ गई है कि इसके क्या कहने। ऐसा लगता है कि चैनलों पर खबरों का मैच चल रहा हो, टॉप-टेन खबरों से शुरू हुआ ये सफर 20-20 खबरों से होकर खबरों के शतक तक पहुंचा और अब तक शतक को पीछे छोड़कर दोहरे शतक यानी 200 खबरों तक पहुंच गया है। 10-20 मिनट में 200 खबरें। साथ ही "खबरों की आंधी और सच का तूफान" इस प्रकार के भयानक हेडर और फ्लैश भी चलाए जाते हैं।

खबरों की ये आंधी और तूफान दर्शकों के दिमाग में कैसा तूफान लाते हैं इसका अहसास शायद न्यूज चैनलों को नहीं है। इन्हें तो मतलब है सिर्फ टीआरपी से, टीआरपी की आड़ में आज सरे आम खबरों और दर्शकों की भावनाओं की बलि दी जा रही है। किसी चैनल ने 20-20 शुरू किया तो उसको पीछे छोड़ने के लिए दूसरे चैनल ने 10 मिनट में 100 खबरें दिखानी शुरू कर दीं और उससे भी मन नहीं भरा तो अब एक चैनल ने 200 खबरें दिखानी शुरू कर दिया है। पत्रकारिता का ऐसा बंटाधार शायद आज तक कभी नहीं हुआ है।

मुझे लगता है न्यूज चैनलों को छपास की बीमारी लग गई है। खबरें और कंसेप्ट चुराने में ये चैनल माहिर होते जा रहे हैं। लेकिन ये न्यूज चैनलों के ये सफर कितना सही है क्या किसी ने इसकी ओर गौर किया। खबरों की आंधी लाने के चक्कर में खबरों की खिचड़ी बन रही है और ऐसी खिचड़ी जिसे दर्शक ना देखना पसंद कर रहा है और ना ही खाना। इन खबरों के शतक और दोहरे शतक में खबरें दिखाने का तरीका भी बड़ा मजेदार है, उदाहरण के लिए मान लीजिए "अण्णा हजारे दिल्ली से रालेगण सिद्धि पहुंचे, घर पहुंच कर अण्णा से समर्थकों से मुलाकात की" खबरों के शतक में इस एक लाइन की खबर की 3-4 खबरें बना दी जाती है, जैसे अण्णा हाजरे दिल्ली से रालेगण के लिए रवाना हुए, यह एक खबर हो गई। वहीं दिल्ली से निकलने के बाद अण्णा रालेगण पहुंचे यह हो गई दूसरी खबर और रालेगण पहुंचते ही अण्णा हजारे ने अपने समर्थकों से मुलाकात की यह हो जाती है तीसरी खबर। खबरों की ऐसी दुर्दशा मैंने आजतक कभी नहीं देखी। खबरों के शतक को पूरा करने के लिए खबर के हाथ, पांव और कान मरोड़ दिए जा रहे हैं।

ऐसी खबरों के दर्शकों पर क्या असर पड़ता है न्यूज चैनलों को इसके बारे में सोचना चाहिए। मुझे न्यूज चैनलों की खबरों से कोई आपत्ति नहीं है लेकिन इन खबरों के परोसने के तरीके पर जरूर आपत्ति है। कोई आपके सामने एक कटोरी सब्जी की बजाय पूरा भगोना ला के रख दें और कहे इसे जल्दी से खाओ तो आप ना इसे खा पाएंगे और ना ही इसे हजम कर पाएंगे। भले ही फिर सब्जी कितनी ही स्वादिष्ट क्यों ना हो। न्यूजों चैनलों को समझाने के लिए यह उदाहरण काफी सटिक है, उन्हें समझना चाहिए एक साथ खबरों से भरा पतीला रख दोगे और कहोगे 10 मिनट में देखो, तो दर्शक ना तो ठीक से देख पाएगा और ना ही खबर को ठीक से समझ पाएगा।

वैसे भी यह बात सही साबित हो चुकी है कि न्यूज चैनल दर्शकों से खुद को पूरी तरह जोड़ पाने में नाकामयाब साबित हुए हैं। ऐसे में इस तरह के सेगमेंट और बुलेटिन दिखाकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया दर्शकों से और दूर होती जाएगी। ऐसे में बेहतर होगा की हम खबरों की नींव को इस तरह रखें की उसकी छाप दर्शक के दिल पर पड़े ना कि दिमाग पर। खबरों का विस्तारित रूप दिखाना वैसे ही न्यूज चैनल बंद करते जा रहे हैं। लगभग सभी चैनलों में पाबंदी होती है कि कोई भी पैकेज 45 या फिर 50 सेकंड के ऊपर ना जाने पाए। ऐसा करके खबर के शरीर को तो हमने वैसे ही मार दिया है और अब खबरों के शतक और दोहरे शतक से खबरों की आत्मा को मत मारो।

और अंत में केवल इतना ही……
"पत्रकारिता का कैसा हाल देख रहा हूं,
ऐसा लगता है जैसे कोई कमाल देखा रहा हूं,
कहां गई उसूलों और सिद्धांतों की वो सारी बातें,
अब तो हर दिन इसपर उठते सवाल देख रहा हूं"

लेखक विनोद यादव मुंबई में पत्रकार हैं.

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