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सुख-दुख...

शराबी और बदजुबान यशवंत की दो बुराइयां

यशवंत से मेरी पहली मुलाक़ात आज से लगभग तीन साल पहले हुई थी जब वे हमारी संस्था आई.आर.डी.एस. द्वारा दिए जाने वाले एस.पी.सिंह पुरस्कार के सिलसिले में लखनऊ आये थे. हमारी संस्था ने पत्रकारिता के क्षेत्र में दिए जाने वाले एस.पी.सिंह पुरस्कार के लिए उन्हें सर्वाधिक उपयुक्त समझा था, लेकिन इस मुलाक़ात के बहुत पहले से मैं उन्हें और उनके भड़ास के बारे में जानती थी. भड़ास से मेरा साबका कब और कैसे हुआ यह तो मुझे ठीक से याद नहीं लेकिन इतना मैं जरूर जानती हूँ कि जिस दिन मैंने पहली बार भड़ास को पढ़ा था उसी दिन से मैं इसकी प्रशंसक हो गई थी. इसका कारण भी बहुत साफ़ था, भड़ास में वे तमाम बातें बहुत ही साफगोई से लिखी गई थी जो किसी भी पत्रकारिता में कहीं भी दूर-दूर तक देखने कों नहीं मिलती है. 

यशवंत से मेरी पहली मुलाक़ात आज से लगभग तीन साल पहले हुई थी जब वे हमारी संस्था आई.आर.डी.एस. द्वारा दिए जाने वाले एस.पी.सिंह पुरस्कार के सिलसिले में लखनऊ आये थे. हमारी संस्था ने पत्रकारिता के क्षेत्र में दिए जाने वाले एस.पी.सिंह पुरस्कार के लिए उन्हें सर्वाधिक उपयुक्त समझा था, लेकिन इस मुलाक़ात के बहुत पहले से मैं उन्हें और उनके भड़ास के बारे में जानती थी. भड़ास से मेरा साबका कब और कैसे हुआ यह तो मुझे ठीक से याद नहीं लेकिन इतना मैं जरूर जानती हूँ कि जिस दिन मैंने पहली बार भड़ास को पढ़ा था उसी दिन से मैं इसकी प्रशंसक हो गई थी. इसका कारण भी बहुत साफ़ था, भड़ास में वे तमाम बातें बहुत ही साफगोई से लिखी गई थी जो किसी भी पत्रकारिता में कहीं भी दूर-दूर तक देखने कों नहीं मिलती है. 

यशवंत से मेरी लखनऊ में मुलाक़ात के बाद हम लोग कई बार मिले और आज मैं यह कह सकती हूँ कि वे मेरे अपने घर के प्रिय सदस्य की तरह हैं. कई ऎसी बाते हैं जो उन्हें तमाम दूसरे लोगों से अलग करती हैं. सबसे पहले तो मैं उनकी बेबाकी और सत्यप्रियता की कायल हूँ. इसके अलावा उनकी निर्भीकता भी अपने ढंग की निराली है. जिन संपादकों और अखबार मालिकों से अबतक सारे पत्रकार थर-थर कांपा करते थे यशवंत ने उन्हें पहली बार कांपने पर मजबूर कर दिया, यह कोई मामूली बात नहीं थी. क्योंकि जिन अखबार मालिकों और संपादकों के बारे में यशवंत अपने सीमित साधनों से लिख रहे थे वह बहुत ही हिम्मत चाहती थी. इसके अलावा मैं उनकी लेखनी की धार की भी कायल हूँ. मैंने यह अनुभव किया है कि जब वे किसी विषय पर लिखते हैं तो बस लिखते ही चले जाते हैं. जिस कुशलता से वे तमाम बिन्दुओं कों एकीकृत करते हुए एक बिंब विधान प्रस्तुत करते हैं और उसमें अपना एक आक्रामक तेवर प्रदान करते हैं, वह अपने-आप में अत्यंत ही प्रशंसनीय है.

यह सब तो यशवंत की वे बाते हैं जो मुझे काफी पसंद है और जिनकी मैं हमेशा प्रशंसा करती हूँ. लेकिन उनकी कुछ ऐसी बाते भी हैं जो मुझे पसंद नहीं, उन्हें भी मैं यहाँ लिख रही हूँ इस उम्मीद के साथ कि वे इन्हें प्रकाशित करेंगे चाहे वे बातें उन्हें अच्छी लगे या बुरी. सबसे पहली बात जो मैं उन्हें कहना चाहूंगी वह उनकी शराब पीने की आदत से ताल्लुक रखती है. वे यह जानते हैं कि सब जानते हैं कि वे शराब पीते हैं, कई बार जम कर पीते हैं, समय-असमय पीते हैं. वे यह भी जानते हैं कि कई लोग उन्हें शराबी कहते हैं और शराब की दशा में की गई उनकी बदजुबानी से भी डरते हैं. लेकिन मैं यह जानती हूँ कि वे शराबी नहीं हैं और बदजुबान तो कत्तई नहीं.

मैं यह बात दावे से इसलिए कह रही हूँ कि मैंने यह देखा है कि वे जब चाहें शराब पर नियंत्रण कर सकते हैं. मैंने उन्हें एक ऐसे व्यक्ति के रूप में पाया है जिनमे बहुत अधिक आत्मनियंत्रण है. लेकिन शायद अभी तक उन्हें यह बात ठीक से समझ में नहीं आई है कि शराब पीने के तमाम नुकसान हैं. और मैं यह जानती हूँ कि जिस दिन उन्हें स्वयं इस बात का अहसास हो जायेगा उस दिन के बाद किसी कों भी उन्हें यह बात कहने की जरुरत नहीं रहेगी. और जहाँ तक शराब पीने के बाद बदजुबानी करने की बात है तो मैंने उन्हें कभी भी मुझसे ऐसी बात करते हुए नहीं सुना जिसे किसी भी प्रकार से बदजुबानी कहा जाए. मेरी उनसे विभिन्न समयों पर बातचीत हुई लेकिन एक बार भी मैने ऐसा नहीं देखा कि उनकी भाषा में दूर-दूर तक कोई बदजुबानी हो. मैंने उन्हें हमेशा उतनी ही इज्जत के साथ भाभी कह कर बात करते हुए देखा. यह बात अपने-आप ही यह स्पष्ट कर देती है कि यशवंत यदि कोई बदजुबानी करते हैं तो वे ऐसा जानबूझ कर करते हैं और उन्ही जगहों पर करते हैं जहां वे ऐसा करना चाहते हैं.

इन दोनों बातों को देखते हुए मेरी उनसे गहरी नाराजगी इस बात से है कि जब वे बखूबी समझते हैं कि वे शराब पर नियंत्रण कर सकते हैं. इस बात को भी खूब जानते हैं कि वे बातचीत में स्वयं पर आसानी से नियंत्रण रख सकते हैं तब वे जानबूझ कर ऐसा कुछ क्यों करते हैं जिससे उन्हें और उनके इष्ट-मित्रों को किसी प्रकार से भी उनके लिए कोई भी ऐसे शब्द सुनने पड़े जो उनके व्यक्तित्व के लिए अच्छा नहीं लगता हो. इस बात की नाराजगी मुझे निश्चित रूप से है और मैं इस लेख के माध्यम से भी अपनी बात उन तक रखना चाहती हूँ कि अपने इष्ट-मित्रों के लिए ही सही यदि वे अपनी इन दो कथित कमजोरियों से ऊपर उठ पायेंगे तो वह वास्तव में बहुत अच्छा होगा और मुझे भी बहुत खुशी मिलेगी. वैसे मुझे यह विश्वास है कि समय के साथ उनमे स्वयं ही ये परिवर्तन हो जायेंगे.   

लेखिका डॉ. नूतन ठाकुर सोशल एक्टिविस्ट और जर्नलिस्ट हैं.

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