: अफजल की फांसी में देरी होने के चलते सीकर के शहीद जेपी यादव के परिवार ने लौटा दिया था सम्मान : झुंझुनू। चेहरे पर पड़ी झुर्रियों के बीच जैसे ही शनिवार सुबह नीमकाथाना में रहने वाली 75 साल की बुजुर्ग महिला शिमली देवी को यह पता चला कि 13 दिंसबर 2001 पर देश की अस्मिता की प्रतीक संसद पर हमला करने के मुख्य रणनीतिकार अफजल गुरु को फांसी हो गई है, उसकी आंखें खुशी से चमक उठीं। उसके कदमों में तेजी आ गई और वह अपने बेटे जेपी यादव की फोटो के पास जा पहुंची। उसे हाथों में उठाया। माथे से लगाया। बेटे का माथा चूमा और कुछ बुदबुदायी, जिसका मजमून यही था कि आज मेरे बेटे की शहादत को सम्मान मिल गया।
शहीद जेपी यादव के पिता कन्हैयालाल का गला भी भर्रा गया। बोले, स्कूल में बच्चों को देशभक्ति के पाठ पढ़ाने के दौरान कभी नहीं सोचा था कि मेरा बेटा एक दिन देश सेवा में कुर्बान होकर परिवार का नाम रोशन करेगा। इसके बाद भी उसकी शहादत सरकार के सामने दम तोड़ती नजर आ रही थी। पिछले 11 वर्ष से परिवार के सभी लोग हमले के दोषी को फांसी की सजा की मांग कर रहे थे। आज के दिन उनकी मंशा को मानों मुकाम मिला हो।
संसद हमले में शहीद हुए नीमकाथाना (सीकर) निवासी जेपी यादव की पत्नी प्रेमदेवी को जैसे ही सूचना मिली कि आतंकी अफजल गुरु को फांसी दे दी गई है तो उनकी आंखों से खुशी के आंसू छलक गए। वे फिलहाल जयपुर में 16 साल के बेटे गौरव और 13 साल की बेटी गरिमा के साथ रह रही हैं। प्रेम देवी कहती है कि एक-एक दिन, एक-एक पल जिस बात का मुझे इंतजार था, वह आज पूरी हो गई। वो फांसी का ही हकदार था। एक शहीद के परिवार को इससे ज्यादा क्या चाहिए। अब मैं बहुत खुश हूं। शहादत को सम्मान दिलाने के लिए यादव के परिवार के सदस्य लगातार संघर्ष कर रहे थे। सरकार उसे फांसी के फंदे पर नहीं लटका रही थी। मांग अनसुनी होने पर विरोधस्वरूप शहीद जेपी यादव की पत्नी प्रेमदेवी ने दिल्ली जाकर सरकार मेडल व सम्मान तक वापस लौटा दिया था। उन्होंने कहा कि आज मुझे फक्र है। मुझे अब मेरे पति की बहादुरी की निशानी चाहिए। मैं इसे लेने दिल्ली जाऊंगी। बेटे गौरव को सेना में भेजूंगी। बड़ा अफसर बनाऊंगी।
प्रेम देवी ने कहा- संसद हमले के दिन मैं नीमकाथाना में अपने ससुराल में थी। हमले में मेरे पति शहीद हो गए थे। मुझे शाम तक किसी ने नहीं बताया। उस समय बेटा गौरव चलना सीख रहा था और बेटी गोद में थी। सास-ससुर बुजुर्ग थे। सरकार ने सहायता दी। 2002 में पति की बहादुरी के लिए अशोक चक्र दिया गया, लेकिन मैं और मेरा परिवार केवल यही चाहते थे कि गुनहगारों को जल्द से जल्द फांसी मिले, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। हर साल 13 दिसंबर को श्रद्धांजलि देने के लिए दिल्ली से बुलावा आता। हम श्रद्धांजलि देकर लौट आते। तीन साल ऐसे ही यही चलता रहा। आखिरकार अशोक चक्र लौटा दिया, ताकि सरकार व लोगों तक हमारा दर्द पहुंचे। मेरे पति के साथ संसद भवन पर हुये हमले में संसद की रक्षा करते हुये शहीद हुये 9 और परिवारों ने भी ऐसा ही किया था। देर से ही सही अब हमें सच्चा सम्मान मिल ही गया। देश के दुश्मनों को मिटाने के लिए ही तो सैनिक पैदा होते हैं और शहीद होते हैं। शहीद के परिजन ऐसा ही सम्मान चाहते हैं।
शहीद जेपी यादव संसद भवन के सहायक सुरक्षा सहायक थे। 13 दिसंबर 2001 को वे संसद के गेट नंबर 11 व 12 में उपराष्ट्रपति के प्रस्थान की व्यवस्था देख रहे थे। सुबह करीब 11. 40 बजे एक कार तेजी से गेट 11 की ओर बढ़ती दिखाई दी। यादव कार की ओर बढ़े तभी उसमें से आतंकियों ने अंधाधुंध गोलियां चला दीं। यादव निहत्थे थे। जान की परवाह नहीं करते हुए गेट नंबर 12 की ओर तेजी से दौड़े। लोगों को चौकन्ना किया। कई जिंदगियां बचाई, लेकिन खुद शहीद हो गए। संसद पर हमला करवाने के दोषी अफजल गुरू को फांसी देने से आंतकवादियो को सबक मिलेगा व उनके हौंसले पस्त होंगे। भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृति नहीं होगी। अपराधियों में भय व्याप्त होगा। डा. सपना गहलोत, शिक्षाविद संसद पर हमले के आरोपियों को तो बहुत पहले फांसी हो जानी चाहिये थी। हमारे देश की अखण्डता को चुनौती बर्दास्त नहीं की जायेगी।
झुंझुनू से पत्रकार रमेश सर्राफ की रिपोर्ट.