मुजफ्फरनगर में 'शाह टाइम्स' के अखबार का दफ्तर था मगर वातावरण अखबार जैसा नहीं था। पत्रकार और गैर पत्रकार आपस में गाली गलौच की भाषा का प्रयोग खुल कर करते थे। अखबार के कार्यालय का माहौल सब्जी मंडी जैसा था। कोलाहल इतना कि कान पड़ी सुनाई नहीं देती थी। शुरू शुरू में बड़ा डर लगा। सोचा कहां आ कर फंस गया। मगर बाद में तय किया कि इस माहौल को तो बदलना ही होगा।
पहले दिन मालिक से बात हुई तो मालिक शाहनवाज राणा ने बताया कि वह अखबार निकाल कर बुरी तह फंस गए हैं अब इसे बंद भी नही कर सकते। न तो अखबार लोगों में जगह बना पाया है और न ही बाहर के केंद्रों पर सही समय पर जा पा रहा है। आप इसमें सुधार करें। आप को पूरी छूट है। आप जिसे चाहें हटा सकते हैं। अगर आप किसी को लाना चाहते हैं तो उस को भी ला सकते हैं। मैंने कहा कि तीन दिन में केवल देखूंगा। चौथे दिन नतीजा आपके सामने होगा।
मालिक से बात कर निश्चिंत हो कर कार्यालय में आया। पहली समस्या यह थी कि हर आपरेटर के पास एक रिपोर्टर या सब-एडीटर बैठ कर बोल बोल कर लिखा रहा था जिस के कारण बहुत शोर हो रहा था। मैंने पहला काम यह किया कि आपरेटर को बोल दिया कि यह इमला अब नहीं लिखना है तथा बाकी को भी कह दिया कि आपरेटर को जो भी देना है लिख कर दें। इससे आपरेटर बहुत खुश हुए। काम में थेाड़ा सुधार हुआ तो फिर अखबार देख रहे सज्जन पर नजर डाली। यह सज्जन पूरी कापी आपरेटर को कंपोज करने के लिए दे देते थे और बाद में स्क्रीन पर उसका संपादन करते थे। यह भी बंद कराया और बता दिया कि आपरेटर को अब के बाद संपादित कापी दी जाएगी। खबरें संपादित करने का बाकी काम अपने हाथ में लिया। तीसरे दिन मालिक को बुलाया और पूछा कि आप किस समय मशीन चालू देखना चाहेंगे। मालिक ने बताया कि अगर नौ बजे मशीन चालू हो जाए तो ठीक रहेगा। मशीन नौ बजे चालू हो गई।
एक सप्ताह के अध्ययन में पाया कि अखबार पर एक चौकड़ी हावी है। एक सज्जन थे जो पता नहीं किस तिकड़म से अखबार के मुद्रक प्रकाशक बने हुए थे, इस नाते वह पत्रकारों पर पूरा रौब रखते थे। एक सज्जन जो अपने आपको मालिक का चाचा बताते थे, करते कुछ नही थे, बस मटरगश्ती करते और चाचा होने का रौब डालते रहते। इन्होंने एक परंपरा यह डाल रखी थी कि अगर कोई पत्रकार या गैर पत्रकार गल्ती करता तो उसका बाउचर काट देते थे। यह एक प्रकार का जुर्माना था जो सम्बंधित कर्मचारी के वेतन से काट लिया जाता था। तीसरे सज्जन अखबार के इंचार्ज थे जो पूरे संघी थे और चौथे सज्जन जी. एम. थे जो मालिक के घरेलू काम भी करते थे।
पहले दौर में इंचार्ज को निपटाया। मालिक के सामने एक महीने के अखबारों की फाइल रख कर दिखाया कि पूरे महीने मुख पृष्ठ पर भाजपा नेताओं के अतिरिक्त किसी अन्य का चित्र नहीं छपा था। मालिक को समझ आ गया कि मुस्लिम स्वामित्व होने पर भी मुसलमान अखबार को क्यों पसंद नहीं करते। इंचार्ज के स्थान पर एक नए सबएडीटर को रखा तो वह डर गया। मैंने उसे कहा कि डरने की कोई बात नहीं मैं सब समझा दूंगा। उसके बाद चाचा को नम्बर पर लिया। चाचा ने एक सबएडीटर का पचास रुपए का बाउचर काट दिया था। सब एडीटर ने मुझे बताया तो मैंने चाचा को बुला कर कहा कि आप शाहनवाज राणा के चाचा होंगे मगर मेरे चाचा नहीं हैं। आज के बाद मेरे स्टाफ के किसी आदमी का बाउचर काटा तो मैं उसका दोगुना आपका बाउचर काट दूंगा। चाचा ने तर्क किया तो मैंने उसे डांट दिया।
इस पर चाचा बोला- डाक्टर साहब यह मुजफ्फर नगर है, दिल्ली नहीं। मुझे पता है, मैंने कहा और चाचा को चलता कर दिया। यह बात किसी ने शाहनवाज को बताई तो उन्होंने चाचा को तलब कर लिया और अपनी भाषा में कहा कि अगर भविष्य में डाक्टर साहब को कुछ कहा तो तेरी मूंछ उखाड़ कर तेरे………..में दे दूंगा। इस प्रकार चाचा भी निपट गया। अब बारी प्रिंटर पब्लिशर की थी यह काम थोड़ा जटिल था। एक दिन मैंने शाहनवाज राणा से पूछा कि इस आदमी को प्रिंटर पब्लिशर कैसे बना रखा है।
इस पर शाहनवाज ने बताया कि उन्हें पता नहीं, इन लोगों ने जो कहा मैं वह करता रहा हूं। दरअसल उन्हें बताया गया था कि संपादक ही सब कुछ होता है। मैंने उनसे कहा कि आज आपका नाम हटाया जा सकता है, मगर इसका नहीं। आज आपकी तूती बोलती है, खुदा न करे कि अगर कल खराब समय आ गया तो यह आदमी अखबार को अपने साथ ले जाएगा और कहीं से भी निकाल देगा। शाहनवाज ने इसे हटाने का उपाय पूछा तो मैंने बताया कि इसका प्रबंध एकाध सप्ताह में हो जाएगा। अगले सप्ताह मैंने नया घोषणा पत्र साइन करा कर उसे एक ए.डी.एम. से स्वीकृत करा लिया और अगले दिन अखबार की प्रिंट लाइन बदल दी। इसे देख कर चौकड़ी के चारों लोग एक दूसरे के गले लिपट कर रोए और मुझे बहुत गालियां दीं। मैनेजर को मैंने नहीं छेड़ा। वह समझ गया था कि अब निजाम बदल गया है इसलिए वह मुझ से पंगा लेने से बचता रहा।
चौकड़ी निपट गई थी। अखबार ठीक चलने लगा। इस बदलाव से तमाम पत्रकार और गैर पत्रकार प्रसन्न थे और राहत की सांस लेने लगे। मालिक भी प्रसन्न थे। उन्हें इस चंडाल चौकड़ी से छुटकारा जो मिल गया था। एक बार दिल्ली की यात्रा में शाहनवाज राणा ने बताया कि ये प्रिंटर पब्लिशर अब तक उन्हें 32 लाख रुपये का चूना लगा चुका है। अखबार चलते हुए चार साल हो गए हैं मगर अब तक डी. ए. वी. पी. से विज्ञापन की मान्यता नहीं मिली है। ये लोग दो लाख रुपये का रिश्वत का खर्च बताते हैं। मैंने कहा कि रिश्वत की आवश्यकता नहीं, मैं पता कर के बताउंगा कि फाइल कहां है। मैंने अपने सम्पर्कों से पता किया और लगभग एक मास में डी. ए. वी. पी. से मान्यता मिल गई तो संस्थान में उत्सव सा हो गया। चौकड़ी के मैनेजर ने मुझे ताना मारा कि आप तो निरे बेवकूफ हैं। ये तो पैसे के भैंसे हैं। आप न स्वयं खाते हैं न औरों को खाने देते हैं। अब मैं इस पर क्या कह सकता था। मैंने तीन लोगों को तैयार कर दिया था जो अखबार संभाल सकते थे। इस पर भी मैनेजर ने मुझे कहा कि आप तो अपना रास्ता बंद कर रहे हैं। इन लोगों को यह सब सिखाने की क्या जरूरत है।
एक एम. ए. पास युवक पत्रकार बनने आया था। उसे इन लोगों ने डिसपैच में डाल रखा था। मैं उसे संपादकीय में ले आया। एक अन्य अर्थशास्त्र में एम. ए.। उसे प्रूफ रीडर बना रखा था। मैंने उसे सबएडीटर बना दिया। कोई नई नियुक्ति मैंने नहीं की और न ही किसी को बाहर किया। अखबार खूब चल निकला और क्षेत्रीय अखबारों को टक्कर देने लगा तो उन्होंने कई स्कीम जारी कर दीं। इसके जवाब में शाह टाइम्स ने भी स्कीम जारी कर दी। इस सबका एक असर यह हुआ कि क्षेत्रीय अखबारों में जहां मुसलमान नहीं थे, वहां अब मुसलमानों को रिपोर्टर एवं सबएडीटर रखा जाने लगा ताकि उनकी खबरें दी जा सकें।
अखबार में लेखकों को पारिश्रमिक देने की परंपरा ही नहीं थी मैंने लेखकों को पारिश्रमिक दिलाना आरंभ किया तो अच्छे
लेखक अखबार से जुड़ने लगे और दिल्ली के प्रैस क्लब और कॉफी हाउस में अखबार की चर्चा होने लगी। इस सबके बीच चौकड़ी के लोग मेरी झूठी शिकायतें कराते रहे मगर मालिक ने इस बारे में मुझ से कभी नहीं पूछा। एक बार मैंने लंबी छुट्टी ले ली तो इस बीच कोई शिकायत नहीं आई। इस पर शाहनवाज ने मैनेजर से कहा कि लगता है लोगों ने अखबार पढना बंद कर दिया है जब से डाक्टर साहब छुट्टी पर गए हैं कोई शिकायत ही नहीं मिली। मैनेजर थोड़ा सकपकाया तो शाहनवाज ने अपनी भाषा में कहा मां के…………. यह सब तुम लोगों की करतूत है। मैं अब समझा कि अखबार की रोजाना शिकायत क्यों होती थी। यहां एक बात और। शाहनवाज अपने इलाके की परंपरा के अनुसार सब को गाली दे कर बात करते थे मगर न तो मेरे सामने किसी को गाली देते थे और न ही कभी मुझे गाली दी। इस बात पर चौकड़ी के लोग भी आश्चर्य व्यक्त करते थे।
लेखक डॉ. महर उद्दीन खां वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं. रिटायरमेंट के बाद इन दिनों दादरी (गौतमबुद्ध नगर) स्थित अपने घर पर रहकर आजाद पत्रकार के बतौर लेखन करते हैं. उनसे संपर्क 09312076949 या [email protected] के जरिए किया जा सकता है. डॉ. महर उद्दीन खां का एड्रेस है: सैफी हास्पिटल रेलवे रोड, दादरी जी.बी. नगर-203207
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