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शिमला प्रेस क्‍लब के साधारण अधिवेशन का सदस्‍यों ने किया बहिष्‍कार

शिमला प्रेस क्लब का विवाद लगातार गहराता जा रहा है। क्लब के साधारण अधिवेशन का क्लब के सदस्यों ने बहिष्कार कर दिया। कुल 160 सदस्यों में से 140 सदस्य बैठक में नहीं आए। नतीजतन ‘कोरम’ पूरा न होने के कारण बैठक स्थगित कर दी गई। क्लब के लगातार पांच बार अध्यक्ष रह चुके वरिष्ठ पत्रकार कृष्णभानु ने इस साधारण अधिवेशन को पहले ही ‘गैरकानूनी’ घोषित कर दिया था। उनका आरोप था कि साधारण अधिवेशन बुलाने की प्रक्रिया को अनदेखा किया गया। रजिस्‍ट्रेशन एक्ट (अधिनियम) की धारा 20 (3) और उपविधि की धारा 32 (1) के अनुसार यह अधिवेशन पूरी तरह अवैध था।

शिमला प्रेस क्लब का विवाद लगातार गहराता जा रहा है। क्लब के साधारण अधिवेशन का क्लब के सदस्यों ने बहिष्कार कर दिया। कुल 160 सदस्यों में से 140 सदस्य बैठक में नहीं आए। नतीजतन ‘कोरम’ पूरा न होने के कारण बैठक स्थगित कर दी गई। क्लब के लगातार पांच बार अध्यक्ष रह चुके वरिष्ठ पत्रकार कृष्णभानु ने इस साधारण अधिवेशन को पहले ही ‘गैरकानूनी’ घोषित कर दिया था। उनका आरोप था कि साधारण अधिवेशन बुलाने की प्रक्रिया को अनदेखा किया गया। रजिस्‍ट्रेशन एक्ट (अधिनियम) की धारा 20 (3) और उपविधि की धारा 32 (1) के अनुसार यह अधिवेशन पूरी तरह अवैध था।

वास्तव में इस साधारण अधिवेशन की सूचना सदस्यों को नियमानुसार नहीं दी गई। कृष्णभानु द्वारा अधिवेशन को अवैध बताने के बाद सदस्यों ने किनारा कर लिया। नतीजतन मौजूदा अध्यक्ष धनंजय शर्मा को अहसास हो गया कि वे इस जंग में कहां खड़े हैं। अब 2 जुलाई को पुनः साधारण अधिवेशन बुलाया गया है, जबकि इसकी जरूरत ही नहीं है। यदि नीयत ठीक हो तो संचालन परिषद की बैठक बुलाकर नए चुनावों की तिथि घोषित की जा सकती है। इस सारे प्रकरण को लेकर वरिष्ठ पत्रकार कृष्णभानु ने क्लब के अध्यक्ष धनंजय शर्मा को एक बार फिर पत्र लिखा है, जो नीचे प्रस्तुत है –


दिनांकः 28.6.2012

श्री धनंजय शर्मा
अध्यक्ष (?)
प्रेस क्लब ऑफ शिमला
पं. पदम देव कॉम्पलेक्स (धरातल मंजिल)
दि रिज, शिमला (हि.प्र.)

प्रिय धनंजय,

साधारण अधिवेशन का ‘कोरम’ पूरा न होने पर बधाई। जिस ढंग से आपने क्लब का साधारण अधिवेशन बुलवाया, उससे पहले ही जाहिर हो गया था कि ‘कोरम’ नहीं होगा। यही आप चाहते थे, ताकि मामला टलता रहे और लगभग तीन साल बाद भी आप क्लब की कुर्सी पर चिपके रहें। आखिर क्लब में ऐसा रखा क्या है कि आप कुर्सी छोड़ना ही नहीं चाहते। शराब-बियर, बकरा-बकरी, मुर्गा-मुर्गी, लंच-डीनर या कुछ और…? एक साल के लिए चुनाव हुए थे। तीन साल होने जा रहे हैं और आप बिना फेविकोल कुर्सी पर चिपक गए हैं। क्यों? क्या फंडा है? क्या लालच है? क्या भूख है? आखिर वजह तो बताएं कि तमाम नियम कायदे ताक पर रखकर आप कैसे बिना कोलतार, बिना सिमेंट और बिना फेविकोल के चिपक लिए हैं। आखिर चुनाव क्यों नहीं कराना चाहते? क्या राज है? कुछ तो बताएं।

18 जून के पत्र में स्पष्ट कर चुका हूं कि आप तमाम नियम कायदों को ताक में रखकर क्लब से चिपके बैठे हैं। अधिनियम और उपविधि की कई धाराओं का उल्लंघन कर अपराधिक तरीके से क्लब को धकेल रहे हैं। क्लब का जो साधारण अधिवेशन आपने बुलावाया, वह पहले ही विवादों में घिर गया था। इसकी मुख्यतः दो वजहें थीं। एक- आपकी संचालन परिषद की एक वर्ष की अवधि समाप्त हो चुकी है, इसीलिए साधारण अधिवेशन बुलाने के लिए आप सक्षम ही नहीं हैं। दो- आपने साधारण अधिवेशन बुलाने की प्रक्रिया का उल्लंघन किया। अधिनियम की धारा 20 (3) और उपविधि की धारा 32 (1) को नजरअंदाज करके आपने इस साधारण अधिवेशन को बुलाया, जो कानूनी दृष्टि से ‘अवैध’ है। यही कारण है कि क्लब के करीब 160 सदस्यों में से डेढ़ दर्जन सदस्य भी साधारण अधिवेशन में उपस्थित नहीं हुए। यही आप चाहते थे। न चाहते तो सभी सदस्यों को नियमानुसार 21 दिन पहले डाक से सूचना भेजते। आपने तो मुझे भी चार दिन पहले यानी 23 जून 2012 को बैठक सम्बंधी सूचना भेजी। मैंने इस ‘अवैध’ साधारण अधिवेशन में नहीं आना था, सो नहीं आया। मेरा साथ क्लब के 160 में से लगभग 140 सदस्यों ने दिया और बैठक का बहिष्कार किया। अब सोचिए (यदि सोचने की क्षमता है तो) कि आप धर्म और अधर्म की इस जंग में कहां खड़े हैं।

सुना है अब आपने 2 जुलाई 2012 को स्थगित साधारण अधिवेशन आमंत्रित किया है। यह किसका निर्णय है और किस नियम के तहत बुलाया जा रहा है? क्या यह निर्णय संचालन परिषद का है या धनंजय शर्मा का? मैं एक बार फिर आपको बता दूं कि यदि लगातार तीन बार साधारण अधिवेशन का ‘कोरम’ पूरा न हो तो ‘स्थगित साधारण अधिवेशन’ बुलाया जा सकता है। यहां तो आप अपराधिक मनमानी करने पर उतर आए हैं। यह ‘गेंदामल खेमराज’ की दुकान नहीं है, बल्कि पंजीकृत संस्थान है। आखिर आपका सलाहकार है कौन? कौन है जो शुभचिन्तक के भेष में आपका सबसे बड़ा दुश्मन है? वास्तव में आप उस पद के काबिल ही नहीं है, जिसपर तीन साल पहले आपको लोगों ने बिठा दिया था। आपके हाथ में उस्तरा थमाने के पापी बहुत हैं, मैं भी हूं। आप सम्भल जाइए। आपकी तहजीब अपनी खंजर से आप ही खुदकुशी करने पर क्यों आमादा है?

बेहतर होगा यदि संचालन परिषद की बैठक बुलाकर चुनाव का फैसला ले लें। अन्यथा मैं अपने इरादों और आरोपों पर कायम हूं। कोई भी कानूनी कार्रवाई करने से पहले कहने का अवसर नहीं देना चाहता कि सावधान नहीं किया। यही कारण है कि बार-बार सावधान कर रहा हूं। अतः हे धनंजय शर्मा ! मूर्खों को त्यागो, अपनी सद्बुद्धि का इस्तेमाल करो और धर्म के पक्ष में खड़े होकर निर्णय लो। इस वक्त आपका धर्म जल्द से जल्द चुनाव कराना है, जो दो साल से लम्बित हैं।

आपका शुभाकांक्षी

( कृष्णभानु )

पूर्व अध्यक्ष
प्रेस क्लब ऑफ शिमला

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